July 3, 2022

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गढ़वाल महर्षि तारादत्त गैरोला की पुण्य तिथि आज, जानिए गढ़वाली और कुमाऊनी के लिए उनका योगदानः देवकी नंदन पांडे

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गढ़वाल महर्षि तारादत्त गैरोला जी की आज पुण्य तिथि है। उन्हें एक वकील, लेखक, संपादक के रूप में जाना जाता है।

गढ़वाल महर्षि तारादत्त गैरोला जी की आज पुण्य तिथि है। उन्हें एक वकील, लेखक, संपादक के रूप में जाना जाता है। वह ‘गढ़वाली’ पत्रिका के संपादक भी थे। अपने खाली समय में, उन्होंने उत्तराखंड के स्थानीय बार्डों ‘हुर्किया’ द्वारा प्रस्तुत वीर गाथागीत और भक्ति गीतों को एकत्र किया। उन्होंने हिमालयन लोकगीत के तहत सह-लेखक के रूप में अपना योगदान दिया। तारा दत्त गैरोला ने पहले गढ़वाली कविता संग्रह ‘गढ़वाली कवितावली’ का संपादन किया जिसमें विभिन्न आधुनिक गढ़वाली कवियों द्वारा कविताओं का संग्रह शामिल था। गैरोला स्वयं एक गढ़वाली कवि थे और उन्होंने गढ़वाली कविता की अपनी पुस्तक ‘सदेई’ (सदेई) प्रकाशित की जो गढ़वाली लोककथाओं पर आधारित थी। उत्तराखंड के इतिहासकार देवकी नंदन पांडे जी उनके जीवन और समाज के लिए दिए गए योगदान के बारे में यहां विस्तार से जानकारी दे रहे हैं।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
गढ़वाल महर्षि तारादत्त गैरोला का जन्म 6जून सन 1875 को टिहरी गढ़वाल राज्य की बडियारगढ़ पट्टी
ढालढुंग गाँव में हुआ था। इनके पिता ज्वालाराम गैरोला थे। स्थानीय स्वकूलों में प्रारम्भक शिक्षा पाने के बाद इन्होंने बरेली कालेज में अध्ययन किया। वहाँ से सन1897 में बी.ए. परीक्षा उत्तीर्ण की और कालेज भर में सर्वप्रथम रहने के कारण टेम्पलटन स्वर्ण पदक प्राप्त किया। तदुपरान्त वह म्योर सेण्ट्रल कालेज इलाहाबाद चले गये और वहाँ से एमए तथा कानून की परीक्षायें उत्तीर्ण की । इस प्रकार शिक्षा और डिग्रियों से सुसज्जित होकर सन 1901 में उन्होंने देहरादून से वकालत आरम्भ की। परिश्रमी और अध्यवसायी होने के कारण इनकी गणना देहरादून के प्रतिष्टित वकीलों में जाती थी। देहरादन में ही इन्होंने अपने सार्वजनिक व साहित्यिक जीवन का प्रारम्भ किया।
गढ़वाल यूनियन की स्थापना
इन्होंने उत्साही युवकों के साथ मिलकर ‘गढ़वाल यूनियन’ की स्थापना की और उसके मंत्री नियुक्त हुए। उसी यूनियन की ओर से सन 1905 के मई माह में मासिक ‘गढ़वाली’ का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया। वह विभिन्न समस्याओं पर गवेषणापूर्ण लेख लिखा करते थे। इन्हीं की योग्यता के कारण उन दिनों ‘गढ़वाली’ एक प्रथम श्रेणी का पत्र समझा जाने लगा था और उस समय के हिन्दी समाचार पत्रों ने उसकी उत्साहपूर्वक प्रशंसा की थी।
पौड़ी में शुरू की वकालत
15 मई 1906 को उनकी माता का देहान्त हो जाने के कारण वह देहरादून से विदाई लेकर पौड़ी चले गये। जहां उन्होंने वकालत शुरू कर दी। कानून के विद्वान होने के कारण इन्होंने कुमाऊ क्षेत्र के कानूनों व नियमों का संशोधन कराने तथा उनको लिपिवद्ध कराने के लिये प्रयास किये। जिन दिनों वह प्रांतीय कॉंसिल के सदस्य थे, उन दिनों कुमाऊं क्षेत्र के स्थानीय कानूनों को लिपिबद्ध करने के लिए ‘स्टौवल कमेटी ‘ की नियुक्ति की गयी। उस समिति के सदस्य की हैसियत से तारादत्त गैलोला ने महत्त्पूर्ण कार्य किया। कांग्रेसी मंत्रिमंडल द्वारा सन् 1938 में एक ‘कुमाऊँ लॉज कमेटी’ नियुक्त की गयी थी। वह एक विशेषज्ञ के रूप में इसमें शामिल किये गये।
सार्वजनिक जीवन में बनाया सर्वोच्च स्थान
गैरोला जी गढ़वाल के सार्वजनकि जीवन में सर्वोच्च स्थान बनाये हुए थे। मिण्टो मोर्ले सुधारों के अन्तर्गत
प्रान्तीय कौंसिल के लिए समस्त कुमाऊँ क्षेत्र से एक ही सदस्य नामित किया जाता था। उस पद पर सन् 1906 से 1913 तक महाराज कीर्तिशाह रह चुके थे। उनकी मृत्यु के बाद सरकार ने इन्हें नामजद किया। पौड़ी रहते हुए भी वह गढ़वाल यूनियन को सहयोग देते रहे। बाद में जब गढ़वाल की सब संस्थायें मिलाकर ‘गढ़वाल सभा’ की स्थापना की गयी। तब वह उसके भी सहायक और स्तम्भ बन गये। उन्हीं दिनों कुमाऊँ के जिलों के समान हितों की रक्षा के लिए कमाऊ परिपद का जन्म हुआ। उसका प्रथम अधिवेशन दिसम्बर सन 1917 में कोटद्वार में हुआ था। तब वह उसके स्वागताध्यक्ष बने। अगले वर्ष उसका अधिवेशन हल्द्वानी में आयोजित किया गया और वह उसके सभापति चुने गये।
प्रथम विश्वयुद्ध में अधिकांश भारतीय नेताओं की तरह ब्रिटिश सरकार को सहयोग देने में ही इन्हें भारत की
मुक्ति की आशा हुई। अतः उहोंने सहर्ष सहयोग दिया। वह ‘जिला युद्ध सहायक समिति’ के मंत्री और ‘जिला फौजी पत्रिका’ के सम्पादक नियक्त हुए। उसी उपलक्ष्य में उन्हें सन 1917 में राय बहादर की उपाधि प्रदान की गयी।
महानतर रहा साहित्यिक जीवन
गैरोला जी का साहित्यिक जीवन, सार्वजनिक जीवन से महानतर रहा। इनकी प्रकाशित पुस्तकों में से ‘सदई’
गढ़वाली भाषा का एक उच्च कोटि का करूणा रस प्रधान काव्य है। इनकी दसरी प्रकाशित पुस्तक ‘गढ़वाली
कवितावली’ है। अंग्रेजी में इनकी प्रकाशित पुस्तकों में से ‘दि सम्स ऑफ दादू’ अधिक प्रभावशाली है। इस पुस्तक में उन्होंने हिंदी के भक्त कवि दादू दयाल की वाणियों का सरल मुहावरेदार अग्रेजी में अनुवाद किया है। सुप्रसिद्ध भारत सेविका डॉ. एनी बेसन्ट ने उसकी प्रस्तावना लिखी है, तथा हॉलेण्ड की डच भाषा में भी उसका अनुवाद हो चुका है। अंग्रेजी भाषा की दूसरी पुस्तक हिमालय फौकलोर है। सामाजिक एवं साहित्यिक जीवन के इस गढ़ुवाल महर्षि ने 28 मई सन 1940 को अन्तिम श्वास लेकर इस संसार से विदा ली।


लेखक का परिचय
लेखक देवकी नंदन पांडे जाने माने इतिहासकार हैं। वह देहरादून में टैगोर कालोनी में रहते हैं। उनकी इतिहास से संबंधित जानकारी की करीब 17 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। मूल रूप से कुमाऊं के निवासी पांडे लंबे समय से देहरादून में रह रहे हैं।

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