January 19, 2022

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उत्तराखंड के सीएम ने भंग किया देवस्थानम बोर्ड, विपक्षी दलों ने बताया लोकतंत्र की जीत, भाजपा ने किया स्वागत

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उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड को लेकर तीर्थपुरोहितों की लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी हो गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की घोषणा कर दी है।

उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड को लेकर तीर्थपुरोहितों की लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी हो गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की घोषणा कर दी है। देवस्थानम बोर्ड पर गठित उच्च स्तरीय समिति एवं मंत्रिमंडलीय उप समिति की रिपोर्ट के बाद सरकार ने ये निर्णय लिया। गौरतलब है कि चार दिसंबर को पीएम मोदी देहरादून में रैली करेंगे। वहीं, इस मुद्दे पर तीर्थ पुरोहित आंदोलन कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा सरकार कोई रिस्क नहीं लेना चाहती कि रैली में किसी तरह का विरोध हो। इसी के मद्देनजर बोर्ड को भंग किया गया है। अब कैबिनेट की बैठक में इसे मंजूरी दे दी जाएगी। इसे लेकर सीएम ने ट्विट कर स्वयं जानकारी दी। सीएम के इस फैसले को विपक्षी दलों ने लोकतंत्र की जीत बताया, वहीं, भाजपा ने इसे स्वागत योग्य कदम बताया। कांग्रेसियों ने आतिशबाजी की और मिठाई बांटी। वहीं, तीर्थ पुरोहितों ने भी आंदोलन की जीत का जश्न मनाया।

देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम और बोर्ड को लेकर तीर्थ पुरोहितों के विरोध के मद्देनजर उनकी शंकाओं के समाधान के लिए सरकार ने राज्य सभा के पूर्व सदस्य मनोहरकांत ध्यानी की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति गठित की थी। 28 नवंबर को समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी थी। मुख्यमंत्री ने समिति की रिपोर्ट का अध्ययन करने के लिए धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय मंत्रिमंडलीय उपसमिति गठित की। इस समिति के अन्य सदस्यों में कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल व स्वामी यतीश्वरानंद शामिल किए गए। उपसमिति ने भी 29 नवंबर को सीएम को रिपोर्ट सौंप दी थी। इसके बाद मुख्यमंत्री ने बोर्ड को भग करने की आज घोषणा कर दी।
ये है मामला
बता दें कि वर्ष 2020 में सरकार ने देवस्थानम बोर्ड का गठन किया था। उस समय भी तीर्थ पुरोहित व हकहकूकधारियों ने सरकार के फैसले का कड़ा विरोध किया था। इसके बावजूद तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत अपने फैसले से पीछे नहीं हटे। वहीं, गंगोत्री में पिछले साल भी निरंतर धरना होता रहा। केदारनाथ और बदरीनाध धाम में तो बोर्ड ने कार्यालय खोल दिए, लेकिन गंगोत्री में तीर्थ पुरोहितों के विरोध के चलते कार्यालय तक नहीं खोला जा सका। गंगोत्री में तो कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज के दो बार पुतले भी जलाए गए। देवस्थानम बोर्ड भंग करने की मांग कर रहे चारधाम तीर्थ पुरोहित हक हकूकधारी महापंचायत ने 23 नवंबर को देहरादून में यमुना कालोनी स्थित कैबिनेट मंत्रियों के आवास का घेराव किया था। इस मौके पर धरना दिया गया था। आंदोलन के तहत 27 नवंबर को बोर्ड गठन के दो साल पूरे होने पर काला दिवस मनाया गया। इससे तहत देहरादून में सचिवालय कूच किया गया। अब आंदोलन को तेज करते हुए एक दिसंबर से चारों धामों के पूजा स्थल के साथ ही देहरादून में क्रमिक अनशन की चेतावनी दी थी।
उत्तराखंड में नेतृत्व परिवर्तन होने के बाद सत्ता संभालते ही पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने देवस्थानम बोर्ड के फैसले पर पुनर्विचार करने की बात कही थी। तीरथ सिंह रावत के बाद पुष्कर धामी सीएम बने और उन्होंने इस मामले में उच्चस्तरीय समिति गठित की। इसके अध्यक्ष भाजपा के वरिष्ठ नेता मनोहर कांत ध्यानी को बनाया गया। मनोहर कांत ध्यानी ने हाल ही में समिति की रिपोर्ट सीएम पुष्कर सिंह धामी को रिपोर्ट सौंपी है। इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है। पांच नवंबर को पीएम नरेंद्र मोदी का केदारनाथ में दौरे से ऐन पहले नौ सदस्यों को नामित कर चारों धामों से तीर्थ पुरोहितों को खुश करने का प्रयास किया गया है। वहीं, समिति ने 28 नवंबर को अपनी दूसरी रिपोर्ट भी सीएम को सौंप दी। इसके बाद अगले दिन 29 नवंबर को मंत्रिमंडलीय उप समिति ने भी अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। जहां ‘कुछ’ किसानों के विरोध के बावजूद केंद्र सरकार ने तीन तीन कृषि कानूनों को वापस लिया, वहीं, ‘कुछ’ पुरोहितों के विरोध के चलते उत्तराखंड में राज्य सरकार ने देवस्थानम बोर्ड को भंग करने का फैसला लिया।
फैसले पलटने में राज्य से लेकर केंद्र तक एक ही चाल
पहले फैसले लो। फिर लागू करो। फिर विरोध। फिर फैसले वापसी। ये राज्य से लेकर केंद्र तक चल रहा है। उत्तराखंड में देवस्थानम बोर्ड में भी यही हुआ और कृषि कानून को लेकर पूरे देश भर में भी यही हुआ। यहां देवस्थानम बोर्ड का गठन कर दिया गया। तीर्थ पुरोहितों और हक हकूकधारियों, संत समाज से बात नहीं की गई। ऐसे में इस फैसले का विरोध हुआ। एक साल से आंदोलन चलता रहा। अब जब विधानसभा चुनाव निकट आए तो सरकार को बोर्ड भंग करने का निर्णय लेना पड़ा। इसी तरह केंद्र सरकार ने तीन कृषि कानून बनाए। इसे लेकर भी किसानों से बातचीत नहीं की। ऐसे में इसे लेकर भी पूरे देशभर में किसानों का आंदोलन एक साल से चल रहा है। अब जब यूपी सहित पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, तब तीनों कृषि कानूनों की वापसी का बिल लोकसक्षा में पारित किया गया। अब ऐसे लेकर सरकारें खुद को महिमामंडित करेंगी। उत्तराखंड में ऐसे पहले फैसले नहीं हैं, वो वापस लिए गए हों। पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत ने तो उनसे पूर्व के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के कई फैसले पलट दिए थे। पहले समस्या पैदा करो, फिर निदान करो। फिर वोट मांगने जनता के बीच जाओ और कहो कि ये हमने लोगों की भावनाओं को देखते हुए कर दिया है।
आखिर सरकार का अहंकार टूटा, देवस्थानम बोर्ड के भंग होने से लोकतंत्र की जीत
उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना ने कहा कि भाजपा सरकार के देवस्थानम कानून व बोर्ड के निर्णय के खिलाफ पिछले दो वर्षों से चले आ रहे आन्दोलन का सुखद नतीजा निकला और प्रचंड बहुमत के अहंकार में डूबी भाजपा सरकार को अन्तोगत्वा आंदोलन के समक्ष झुकना पड़ा। आज दो वर्ष बाद इस कानून को बनाने वाली भाजपा सरकार को रोल बैक करते हुए देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की घोषणा करनी पड़ी। यह लोकतंत्र व जनता की जीत है और इसके लिए सभी हक हकूकधारी और विशेष तौर पर पंडा पुरोहित समाज है। इनके संघर्ष के कारण सरकार घुटनों के बल आ गयी। इसके लिए कांग्रेस की ओर से मैं सभी राज्यवासियों को व पंडा पुरोहित समाज को बधाई देता हूँ।
धस्माना ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार द्वारा जिस प्रकार से किसान विरोधी तीन काले कानूनों को किसानों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन के बाद वापस लेना पड़ा, उसी प्रकार उत्तराखंड की भाजपा द्वारा आदि गुरु शंकराचार्य की परंपराओं को ध्वस्त करने वाले सनातन विरोधी देवस्थानम बोर्ड को भी भंग करना पड़ा जो जनतंत्र की बड़ी जीत है। धस्माना ने कहा कि कांग्रेस का राज्य नेतृत्व नेता प्रतीपक्ष व सभी कार्यकर्ता भी बधाई के पात्र हैं जो इस पूरे संघर्ष में शुरू से लेकर अंत तक पंडा पुरोहित समाज के साथ डट कर खड़े रहे।
कांग्रेस उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना का बयान वीडियो में देखें-

देवस्थानम बोर्ड भंग किया जाना सरकार के मुंह पर तमाचाः धीरेंद्र प्रताप
उत्तराखंड कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता एवं उपाध्यक्ष धीरेंद्र प्रताप ने देवस्थानम बोर्ड को भंग किए जाने को उत्तराखंड की भाजपा सरकार के मुंह पर करारा तमाचा बताया। उन्होंने कहा कि जिस तरह से राज्य सरकार ने इस मसले को झूठी शान का मुद्दा बनाया हुआ था, उससे स्पष्ट हो गया कि यह इस सरकार की बेवकूफी थी और तीर्थ पुरोहितों की मांग को किनारे रखकर जिस तरह सरकार अपनी तानाशाही दिखाने में लगी थी। वह उसका मूर्खतापूर्ण कदम था। धीरेंद्र प्रताप ने कहा कि चुनाव को देखते हुए सरकार अपने फैसले बदल रही है और सरकार को यदि “रोलबैक सरकार” कहा जाए तो कोई शक नहीं होगा। उन्होंने कहा अब राज्य में चुनाव में मात्र 3 महीने रह गए हैं और कोई शक नहीं जिस दिन भी राज्य में चुनाव होंगे भारतीय जनता पार्टी कि राज्य में करारी हार होगी। जो नीतियां इस सरकार ने पिछले साल में 55- 56 महीनों में बनाई, उन सब जनविरोधी नीतियों को वापस लेना होगा। उन्होंने कांग्रेस के भी हजारों कार्यकर्ताओं को देवस्थानम बोर्ड भंग किए जाने की बधाई दी है। जिन्होंने देवस्थानम बोर्ड के भंग किए जाने को लेकर राज्य भर में पार्टी के आह्वान पर अनेकों अनेक जन प्रदर्शनों में शिरकत की और अपना समय लगाया।
कर्नल कोठियाल ने बताया तीर्थ पुरोहितों के संघर्ष की जीत
उत्तराखंड में आप पार्टी के सीएम पद के उम्मीदवार कर्नल (से.नि.) कोठियाल ने देवस्थानम बोर्ड का भंग होना तीर्थ पुरोहितों और हक हकूक धारियों की बडी जीत बताया है। उन्होंने सभी तीर्थ पुरोहितों को बोर्ड भंग होने की बधाई देते हुए बताया कि देवस्थानम बोर्ड जबरन बनाया गया बोर्ड था जो सरकार की मंशा पर लगातार प्रश्न चिन्ह लगा रहा था। उन्होंने बताया कि यह लोकतंत्र की जीत है। अहंकार पर सत्य की जीत है। जिसके लिए सभी तीर्थ पुरोहितों को बधाई।
उन्होंने टवीट करते हुए लिखा है कि- सभी तीर्थ पुरोहितों को बधाई। आपका संघर्ष रंग लाया,आपने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति को अपने खून से जो चिटठी लिखी थी आज उसका हिसाब हो गया है। देवस्थानम बोर्ड को भंग कर पुष्कर धामी सरकार ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। ये लोकतंत्र की जीत है,ये अहंकार के ऊपर सत्य की जीत है।

आप प्रभारी ने कहा- तीर्थ पुरोहितों के आगे झुकी अहंकारी सरकार
वहीं देवस्थानम बोर्ड भंग होने पर आप प्रभारी दिनेश मोहनिया ने भी ट्वीट कर तीर्थ पुरोहितों को बधाई दी। उन्होंने कहा, तीर्थ पुरोहितों का संघर्ष आखिरकार रंग लाया, तीर्थ पुरोहितों की मांग के आगे अहंकारी सरकार को अपना फैसला वापिस लेना पड़ा। उन्होंने कहा, लंबे समय से तीर्थ पुरोहित संघर्ष कर रहे थे ,आम आदमी पार्टी शुरू से उनके संघर्ष में कंधे से कंधा मिला कर हमेशा साथ खड़ी रही। आज मेहनत रंग लाई।

आप प्रभारी ने कहा कि बीजेपी ने चुनाव को देखते और हार सामने देखते हुए ये फैसला लिया। उन्होंने कहा चुनाव को देखते हुए बीजेपी ने ये फैसला लिया। कल इनकी सरकार बनती है तो ये फिर देवस्थानम बोर्ड को तीर्थ पुरोहितों पर थोप सकते हैं इसलिए इस जनविरोधी सरकार को हराना जरूरी है। इसके अलावा उन्होंने कहा,बोर्ड बनाने की वजह से लंबे समय से तीर्थ पुरोहितों को जो परेशानी हुई,उसके लिए बीजेपी सरकार और मुख्यमंत्री धामी को तीर्थ पुरोहितों के बीच जाकर माफी मांगनी चाहिए।
जनभावनाओं के अनुरूप मुख्यमंत्री का निर्णय स्वागत योग्यः महाराज
उधर, भाजपा नेता एवं उत्तराखंड के पर्यटन, लोक निर्माण, धर्मस्व, सिंचाई एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज ने कहा है कि उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट के पश्चात जनभावनाओं का सम्मान करते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की जो घोषणा की है वह स्वागत योग्य कदम है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड चारधाम देवस्थानम प्रबंधन बोर्ड पर मंत्री गणों की उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट के बाद पंडा, पुरोहितों, पुजारियों और जन भावनाओं का सम्मान करते हुए मुख्य मंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देवस्थानम बोर्ड को भंग करने का जो निर्णय लिया है, वह एक स्वागत योग्य कदम है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की इस घोषणा के बाद रिपोर्ट को कैबिनेट में रखा जाएगा उसके पश्चात विधानसभा में भी इसे प्रस्तुत किया जाएगा।
उन्होने कहा कि उत्तराखंड चार धाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम के प्रावधानों के परिपेक्ष में चारों धामों के हितधारकों पंडा, पुरोहितों और पुजारियों द्वारा समय-समय पर विरोध, आंदोलन के मध्येनजर वर्तमान परिस्थितियों के दृष्टिगत हमने जो रिर्पोट मुख्यमंत्री जी को सौंपी उसके आधार पर जनभावनाओं का सम्मान करते हुए जो निर्णय उन्होने लिया है वह उचित और स्वागत योग्य है।
मंदिरों की संपदा को बड़े पूंजीपतियों के हवाले करने की थी साजिश
भाकपा (माले) के गढ़वाल सचिव इंद्रेश मैखुरी के मुताबिक, देवस्थानम एक्ट, उत्तराखंड के मंदिरों की संपदा को बड़े पूँजीपतियों के हवाले करने के लिए लाया गया कानून था। इस अधिनियम के प्रावधानों में यह निहित था।
उत्तराखंड की भाजपा सरकार द्वारा यह कानून भी उसी नजरिए से वापस लिया गया है, जिसके चलते केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानून वापस लिए गए हैं और वह नजरिया है- चुनावी हार का डर। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि सामने चुनाव न हों तो भाजपा जनता पर कुछ भी ऐसा थोप देगी जो जनहितों पर कुठाराघात करेगा। यदि चुनाव में हार का खतरा नजर आएगा तो वह किसी भी ऐसे कानून को वापस लेने के लिए तैयार हो जाएगी, जिसके लाभ गिनाते वह नहीं थकती थी। लोकतंत्र की यह चुनाव समर्पित- चुनाव का, चुनाव के लिए- वाली नयी परिभाषा भाजपा गढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि सत्ता में बैठे लोगों का समग्र चिंतन केवल चुनाव केन्द्रित होना, देश और लोकतंत्र के लिए बेहद घातक है। इस संकीर्ण दृष्टिकोण से देश और प्रदेश को उबारने की जरूरत है। इन दो फैसलों को अपनी मांगों के लिए संघर्ष करने वालों के लिए यही सबक है कि वह चाहे रोजगार का प्रश्न हो या नियमितीकरण का, इन आंदोलनकारियों को सरकार में यह भय उत्पन्न करना होगा कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गयी तो चुनावी कीमत सरकार को चुकानी पड़ेगी। तमाम वाजिब मांगों के लिए चलने वाले आंदोलनों को अपनी ताकत को इस दृष्टि से एकजुट करना चाहिए।

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