October 24, 2021

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एम्स ऋषिकेश को आयुष्मान सम्मान से नवाजा, नवजात शिशुओं की देखभाल को कार्यशाला शुरू

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बीते तीन वर्षों के दौरान आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत एम्स ऋषिकेश में अब तक 51120 मरीजों का निशुःल्क उपचार किया जा चुका है। यही नहीं योजना की शुरुआत से अभी तक एम्स में 10900 आयुष्मान कार्ड बनाए जा चुके हैं।

बीते तीन वर्षों के दौरान आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत एम्स ऋषिकेश में अब तक 51120 मरीजों का निशुःल्क उपचार किया जा चुका है। यही नहीं योजना की शुरुआत से अभी तक एम्स में 10900 आयुष्मान कार्ड बनाए जा चुके हैं। इस उपलब्धि के लिए हाल ही में राज्य सरकार द्वारा एम्स को आयुष्मान सम्मान से पुरस्कृत किया गया है। एम्स निदेशक ने आयुष्मान योजना को और अधिक प्रभावी बनाने की बात कही है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, एम्स ऋषिकेश में आयुष्मान योजना की शुरुआत सितम्बर- 2018 में हुई थी। इन स्वास्थ्य योजनाओं के तहत बीते तीन वर्षों में उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश सहित देश के करीब एक दर्जन राज्यों से आए 51 हजार से अधिक मरीजों को एम्स ऋषिकेश में निःशुल्क उपचार की सुविधा मिल चुकी है। योजना के सफलतम 3 वर्ष पूर्ण होने व इस योजना का बेहतर संचालन करने पर राज्य सरकार द्वारा हाल ही में एम्स संस्थान को आयुष्मान सम्मान पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया।
देहरादून में आयोजित कार्यक्रम आरोग्य मंथन 3 के दौरान एम्स में आयुष्मान योजना के प्रभारी डॉ. अरुण गोयल ने बताया कि कोविड-19 के संक्रमण के दौरान भी एम्स ऋषिकेश में मरीजों के आयुष्मान कार्ड बनाए गए। उन्होंने बताया कि पिछले तीन वर्षों के दौरान एम्स में उत्तराखंड के अलावा हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, केरल और जम्मू कश्मीर के मरीजों का आयुष्मान भारत योजना में इलाज किया गया है। उन्होंने बताया कि अभी तक कुल 51 हजार 120 मरीजों का इस योजना से निःशुल्क इलाज किया जा चुका है। इनमें से 39 हजार 580 मरीज उत्तराखंड राज्य के हैं। उन्होंने बताया कि कमजोर आर्थिक स्थिति वाले इस पहाड़ी राज्य के लिए यह योजना गरीब लोगों के उपचार के लिए बेहद लाभकारी है।

आयुष्मान योजना के सह प्रभारी डॉ. मधुर उनियाल ने बताया कि जिन लोगों के पास आयुष्मान भारत योजना का कार्ड नहीं है, वह लोग अपनी पहचान संबंधी संपूर्ण दस्तावेज दिखाकर एम्स ऋषिकेश में अपना आयुष्मान कार्ड बना सकते हैं। इसके लिए ओपीडी रजिस्ट्रेशन एरिया में अलग से आयुष्मान काउंटर स्थापित किया गया है। उन्होंने लोगों से अपील की है कि उन्हें इस योजना के तहत मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ लेना चाहिए।
कार्यक्रम में राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और स्वास्थ्य मंत्री धन सिंह रावत ने आयुष्मान योजना के सफल संचालन के लिए एम्स संस्थान को आयुष्मान सम्मान पुरस्कार से नवाजा। एम्स की ओर से यह पुरस्कार योजना के प्रभारी डॉ. अरुण गोयल और सह प्रभारी डॉ. मधुर उनियाल ने प्राप्त किया।
मुख्यमंत्री की ओर से इस योजना के सफल संचालन के लिए एम्स ऋषिकेश को पुरस्कृत किए जाने पर संस्थान के निदेशक प्रोफेसर अरविन्द राजवंशी ने अपने संदेश में कहा कि केंद्र व राज्य सरकार द्वारा संचालित इस योजना का उद्देश्य गरीब व जरुरतमंद लोगों को निशुल्क उपचार प्रदान कराना है। एम्स ऋषिकेश आयुष्मान योजना के तहत अधिकाधिक मरीजों को निशुल्क उपचार उपलब्ध कराने को प्रयासरत है।

बच्चों की देखभाल और शिशु मृत्युदर रोकने को कार्यशाला शुरू
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, एम्स ऋषिकेश में सीएफएम, नियोनेटोलॉजी विभाग व राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन उत्तराखंड के संयुक्त तत्वावधान में चार दिवसीय कार्यशाला विधिवत शुरू गई। कार्यशाला के माध्यम से प्रशिक्षणार्थियों को राज्य में नवजात शिशुओं की देखभाल के साथ ही शिशु मृत्यु दर रोकने के बाबत आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाएगा।
संस्थान में सामुदायिक एवं परिवार चिकित्सा विभाग, नवजात शिशु विभाग की ओर से एनएचएम के सहयोग से फेसिलिटी बेस्ड न्यूबौर्न केयर प्रशिक्षण कार्यशाला का मुख्यअतिथि डीन एकेडमिक प्रोफेसर मनोज गुप्ता ने विधिवत शुभारंभ किया। प्रशिक्षण कार्यशाला में प्रतिभागी स्वास्थ्य कर्मचारियों को नवजात शिशु के सही पुनर्जीवन रिससिटेशन को लेकर प्रशिक्षित किया जाएगा। इस अवसर पर बताया गया कि शिशु के जन्म के बाद शुरुआती एक घंटा शिशु के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। लगभग 10 प्रतिशत नवजात शिशुओं को रिससिटेशन की जरुरत होती है। प्रशिक्षणार्थियों को बताया गया कि जन्म के समय लगभग 25 फीसदी नवजात शिशुओं में सांस नहीं ले पाने की तकलीफ होती है।
डीन एकेडमिक प्रोफेसर मनोज गुप्ता ने बताया कि एम्स संस्थान में नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। साथ ही राज्य सरकार के अस्पतालों में कार्यरत नर्सिंग स्टाफ को भी संस्थान द्वारा नवजात की बेहतर देखभाल के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि भविष्य में संस्थान के स्तर पर इस ट्रेनिंग को और अधिक बेहतर बनाया जाएगा।
उन्होंने बताया ​कि इस तरह के उच्चस्तरीय प्रशिक्षण के माध्यम से हम स्वास्थ्यकर्मियों को दक्षता प्रदान करते हैं जिससे वह अपने कार्यक्षेत्र में इससे जुड़े मामलों में व्यवहारिक ज्ञान में बढ़ोत्तरी कर सकें। डीन एकेडमिक ने बताया कि संस्थान आगे भी स्वास्थ्यकर्मियों को दक्ष बनाने के लिए इस तरह की महत्वपूर्ण ट्रेनिंग्स को जारी रखेगा। जिससे अधिकाधिक गुणवत्तापरक प्रशिक्षण दिया जा सके।
इस अवसर पर सीएफएम विभागाध्यक्ष प्रो. वर्तिका सक्सैना ने बताया कि उत्तराखंड में हरिद्वार व देहरादून क्षेत्र में नवजात शिशुओं की सर्वाधिक मृत्युदर है, उन्होंने बताया कि छोटे अस्पतालों में नवजात के पैदा होने के समय किसी भी तरह की समस्या आने पर ऐसे शिशुओं को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में रेफर किया जाता है। जिसमें अनावश्यक समय व्यय हो जाता है, कईदफा नवजात को शिफ्ट करने के दौरान समय पर उचित उपचार नहीं मिलने से उनकी मृत्यु के मामले बढ़ जाते जाते हैं। इसकी एक अहम वजह उन्होंने नवजात को एक से दूसरे अस्पताल पहुंचाने में परिवहन संबंधी दिक्कतों को भी माना। लिहाजा प्रत्येक अस्पताल में डिलीवरी के समय आने वाली समस्याओं से निपटने के लिए दक्ष नर्सिंग स्टाफ होना चाहिए इस लिहाज से उन्होंने इस कार्यशाला को अत्यधिक महत्वपूर्ण बताया।
संस्थान के नियोनेटोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. श्रीपर्णा बासू ने बताया कि यह प्रशिक्षण हम लोग लंबे अरसे से राज्य के स्वास्थ्य कर्मचारियों को देते रहे हैं, महत्वपूर्ण ट्रेनिंग होने के कारण ही एम्स के पास प्रशिक्षणार्थियों की संख्या बढ़ती जा रही है। उन्होंने बताया कि इस प्रशिक्षण के उपरांत प्रशिक्षित नर्सिंग ऑफिसर्स अपने कार्यक्षेत्र में जाकर नवजात शिशुओं की और अधिक बेहतर देखभाल कर पाते हैं। जिससे वह नवजात शिशुओं को होने वाली परेशानियों जैसे निमोनिया, सेप्सिस, डायरिया आदि से बचाव किया जा सके। कार्यशाला के आयोजन में प्रोग्राम समन्वयक डा. मीनाक्षी खापरे, ट्रेनिंग को-ऑर्डिनेटर डा. सुमन चौरसिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस अवसर पर राजकीय चिकित्सालय ऋषिकेश, श्रीनगर, देहरादून, हरिद्वार, रुद्रपुर, गोपेश्वर आदि राजकीय चिकित्सालयों के नर्सिंग ऑफिसर्स शामिल हो रहे हैं।

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