October 23, 2021

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कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली गजल-न ईं धार-न वीं धार

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कवि एवं साहित्यकार दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली गजल-न ईं धार-न वीं धार।

न ईं धार-न वीं धार

सचम छैं- छौ कबि, खटकदार मीं.
सचम छैं- छौ कबि, झटकदार मीं..

अपण मुलका,लौ-बॉण रै जबतक,
अब त रैग्यूं, दिन-रातै घुटकदार मीं..

कोरि बकबास ह्वेगे, सोच तेरी-मेरी,
ह्वेग्युऊं अब त, निरा लटंगदार मीं..

न ताऴ-खुटि टेकड़ि, न ऐंच रखणीं,
बीच-बटम हुयूं छूं, अब-लम्पसार मीं..

घार बि अब, क्वी नि- मुख लगांदा,
इनम-ह्वेग्यूं, अब त-हिकमतहार मीं..

खेति-बाड़ी सारु, अब-कख कैकु रैगे,
मिल़ण लगीं, ध्याड़ि-धंदा पगार मीं..

‘दीन’ इनु बग्त बि, देखणु छौ-दिखेगे,
अब नि रैग्यो, ईं धार- न वीं धार मीं..

कवि का परिचय
नाम-दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’
गाँव-माला भैंसोड़ा, पट्टी सावली, जोगीमढ़ी, पौड़ी गढ़वाल।
वर्तमान निवास-शशिगार्डन, मयूर बिहार, दिल्ली।
दिल्ली सरकार की नौकरी से वर्ष 2016 में हुए सेवानिवृत।
साहित्य-सन् 1973 से कविता लेखन। कई कविता संग्रह प्रकाशित।

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