August 5, 2021

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स्कॉटलैंड की स्वच्छता, अपने शहर में करें प्रयास तो हो सकता है बहुत कुछः सोमवारी लाल सकलानी

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बच्चों से हम ज्यादा सीखते हैं। आवश्कता संस्कार की है। स्वच्छता संस्कार की है। स्वच्छता, स्वस्थता, सुंदरता और संस्कारिकता के साथ आगे बढ़ें। यही मेरी शुभकामनाएं हैं।

पढ़नाऔर समझना
सम पढना और पढाना मेरी संस्कार और सौभाग्य रहा है। यदि मैं प्रतिदिन चार छह घंटे पढ़ूं या लिखूं नहीं तो बीमार पड़ जाऊंगा। स्वस्थ रहने के लिए लिखना- पढ़ना और समझना बहुत जरूरी है।
पुरानी किताबों का महत्व
फुर्सत के समय पुरानी पत्रिकाओं, पुस्तकों, मैगजींस यहां तक की पुस्तकों के बाहर लगी हुई अखबार की जिल्दों को भी पढ़ लेता हूं। बहुत सुकून मिलता है सात रुपए के अखबार पढ़ने का वह आनंद नहीं आता, जो किसी पुरानी किताब, किसी फटी हुई किताब की जिल्द, जो पीले पड़े हुए अखबार के टुकड़े को पढ़ने में आता है ।
पुरानी मैगजीन
विगत दोपहर एक पुरानी मैगजीन निकाली। जो कि कभी मुझे भेंट की गई थी। इसे पढ़ा तो नहीं, लेकिन देखा जरूर था। मैगजीन पुरानी पड़ गई है। पृष्ठ पीले हो गए हैं। पोती जिद करने लगी तो उसको पकड़ा दिया।
उमा जोशी का लेख पढ़ा
कुछ देर बाद खेलते खेलते मैगजीन के पन्नों का वह पोस्टमार्टम करने लगी। पहले ही पन्ने पर मेरी दृष्टि पड़ी तो उमा जोशी जी का स्कॉटलैंड के बारे में लिखा हुआ लेख था। उठा और मैगजीन के पन्नों को व्यवस्थित किया। फिर उन पन्नों को पढ़ने लग गया। डा. मुनीराम सकलानी द्वारा संपादित “नवाभिव्यक्ति” नामक मैगजीन पर उमा जोशी का यह लेख आज से 8 वर्ष पुराना था। मुझे ऐसा लगा कि उन्होंने यह अद्यतन मैगजीन मुझे भेंट की, जिसे मैं उसको पढ़ रहा हूं।
अपने शहर से तुलना
पुस्तक को पढ़ने के बाद अनेक विचार मेरे मन में आए। काश ! अगर अपना चंबा जो कि एक उभरता हुआ हिल स्टेशन है। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में है और प्राकृतिक सुषमा से अनुरंजित है, एक पहाड़ी ढलान पर बसा हुआ है। जहां की जलवायु और दिशा – दशा उपयुक्त है, भले ही यहां सागर, नदी तालाब नहीं है। हम क्यों नहीं इसे प्रकृति और संस्कृति का एक सुंदर घर बना सकते हैं। हम कैसे इसे स्वच्छ, समग्र, अतिक्रमण से दूर ,पर्यावरण के मानकों को स्थापित करते हुए विकसित शहर का दर्जा दें ?
स्कॉटलैंड की स्वच्छता
जब मैं उमा जोशी जी का लेख पढ़ रहा था तो उन्होंने ग्लासगो शहर के बारे में काफी कुछ लिखा स्कॉटलैंड की राजधानी एडनबरा ,संपूर्ण इंग्लैंड और उसके विद्यमान चारों स्टेट वेल्स, लंदन, आयरलैंड, स्कॉटलैंड के बारे में बखूबी लिखा है। यह पत्रिका में पढ़ा हुआ ज्ञान नहीं है, बल्कि अपनी यात्रा का विवरण संस्मरण उन्होंने इसमें प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपनी प्रथम यूरोप यात्रा 2007 का लेख में जिक्र किया है।
एक नैतिक जिम्मेदारी
लेख में उन्होंने अन्य बातों के अलावा जो एक विकसित शहर की पहचान होती है, स्वच्छता पर अपना ध्यान केंद्रित किया। मैं वर्तमान में चंबा नगर पालिका परिषद का स्वच्छता एंबेसडर मनोनीत हूं, इसलिए मेरा नैतिक दायित्व है कि कुछ अंश उन्हीं के शब्दों में पाठकों, नागरिकों, निवासियों आदि के लिए प्रेरणा स्वरूप यहां प्रस्तुत करूं ताकि पाठकों मे स्वच्छता के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न हो और नई सोच न जाने किस व्यक्ति के मन में उत्पन्न हो जाए और उसी के अनुरूप वह कोई ऐसा प्रयोग कर ले, जो कि उसे अनुकरणीय भी बना ले।
उन्ही के शब्दों में
उमा जोशी लिखती हैं- पिरामिड के समान घरों की छतें सब कुछ व्यवस्थित। कहीं कोई अतिक्रमण गंदगी नहीं। कूड़ा करकट का तो नामोनिशान नहीं था। यहां की जनता स्वत: अनुशासित है। ऐसा मुझे लगा, सभी लोग समय पर यह ईमानदारी के साथ अपने अपने कार्य करते हैं। गंदगी तो लेश मात्र भी नहीं फैलाते और बड़े छोटे डस्टबिन व्यवस्थित तरीके से रखे हैं। हर प्रकार का कूड़ा कचरा कूड़ेदान के रंगों के आधार पर रखा जाता है। हर एक काली, भूरी, नीले, सफेद डस्टबिन, प्लास्टिक, कांच, कागज, घास डिब्बे अलग रखे जाते हैं। प्रातः एक बड़ी गाड़ी आकर डस्टविनों को पलट कर ले जाती है।
कमोबेश हमारा भी प्रयास जारी हैं
कमोबेश यह कार्य भारत के हर एक नगर निगम या नगर पालिका परिषद क्षेत्रों या छोटे-बड़े कस्बों में भी गतिमान है, लेकिन सबसे बड़ी कमी हमारी यह है कि हम अनुशासन पर इतना ध्यान नहीं देते। दूसरी बात है हम स्वच्छ तो रहना चाहते हैं, लेकिन अन्य को स्वच्छ नहीं रखना चाहते हैं। तीसरी बात यह है कि अतिक्रमण का तो हमें बुखार चढ़ा है और कुछ पाने की इच्छा में हम नैतिक- अनैतिक का ध्यान नहीं रखते हैं। पर्यावरण का नुकसान करते हैं और क्षणिक लाभ के लिए, क्षणिक सुविधाओं के लिए, शहर को व्यवस्थित करने के बजाय अव्यवस्थितता की ओर ले जाते हैं।
कुछ और संस्मरण
उमा जोशी आगे लिखती हैं- यहां शांति, ईमानदारी और अनुशासन वरदान में मिले हैं। सड़क पर जाम कि कहीं कोई चिंता नहीं है। गाड़ी का हॉर्न कभी नहीं सुनाई देता है और सबसे बड़ी बात यह है कि अगर कोई सड़क पार कर रहा है तो ड्राइवर स्वयं गाड़ी रोक लेता है और फिर हाथ हिला कर उसे आगे बढ़ने की ओर इशारा करता है। पर्यावरण प्रदूषण नहीं है। स्वच्छ नीला आकाश, सूर्य, चंद्रमा, सितारे अपने प्रभाव मे खेलते हैं। यहां की सुंदरता को चार चांद लगाते हैं। छोटे-छोटे पार्क हैं जो कि रंगीन कारपेट की तरह हैं और बच्चे इन पर खूब उछल कूद करते हैं। ताकि कहीं चोट ना लगे, इसलिए सुरक्षा की भी व्यवस्था है। लगता है धरती ने विभिन्न रंगों की जैसे चादर ओढ़ रखी हो।
आलोचना की जगह अनुकरण करें
श्रीमती उमा जोशी एक और प्रसंग लिखती हैं कि पाश्चात्य संस्कृति तथा वहां के भोलेपन कि हम जितने भी चर्चा करें या उसे दीन हीन भावना से देखें, उसे कोई कितना भी बुरा भला कहे, किंतु ऐसा नहीं है हमें बहुत कुछ सीखने के लिए न मिलता हो।
वहां के नियम और अनुपालन
वहां की स्वच्छता और विकास में भी कई एक नए नियम है। कोई किसी को नुकसान नहीं पहुंचाता। बलात्कार, चोरी, भ्रष्टाचार, हेराफेरी, निंदा, ईर्ष्या द्वेष की विभीषिका नगण्य है। कोई किसी पर कुदृष्टि आंख उठा कर नहीं देखता। यह बातें अक्सर हमारे पर्वतीय शहरों या पर्वतीय क्षेत्रों में भी प्रसांगिक हैं।
उमा जोशी आगे बढ़ते हुए कहती हैं कि सामना होने पर किसी भी व्यक्ति का गुड मॉर्निंग, हेलो, हाय, हाउ आर यू, बस इतना ही होता है। नवंबर में शीतलहर, वर्षा, दोपहर 3:00 बजे से अंधेरा शुरू हो जाता है।
अपने शहर को भी ऐसा बना सकते हैं
हम अपने चंबा के बारे में कहते हैं कि यह क्षेत्र जलवायु की दृष्टि से रहने लायक नहीं है। बहुत ठंडा है, जबकि यह क्षेत्र समशीतोष्ण क्षेत्र है। यहां पश्चिमी देशों के तरफ शीत ऋतु में 3:00 बजे सूर्यास्त नहीं होता। अट्ठारह घंटे की रात नहीं होती है। फिर क्यों हम चंबा में रहना नहीं चाहते ? देखा देखी देहरादून की तरफ भागने का मन करता है। पलायन बढ़ रहा है। गांव के लोग चंबा में बस रहे हैं। फिर चंबा छोड़कर देहरादून, दिल्ली जैसे महानगरों को जा रहे हैं, जिससे क्षेत्र का कोई भला नहीं कर सकते हैं।
कुछ और उदाहरण
उमा जोशी जी ने एक बात और लिखी है कि स्कॉटलैंड में लोग कुत्तों को घुमाते हैं तो साथ में एक डस्टबिन रखते हैं। कुत्ते का मल एक थैली में उठा कर के उस डस्टबिन में रखा जाता है। कोई भी सड़क या मार्ग किनारे या दूसरी जगह कुत्ते का मल विसर्जित नहीं करवाता है। दूसरी बात है कि यह शहर ध्वनि प्रदूषण से भी मुक्त है। अनावश्यक कोई हॉर्न नही बजाता है।
अंत में उमा जोशी ने कहा कि भले ही अंग्रेजों ने हमें गुलाम बना करके रखा हो, लेकिन उनकी ईमानदारी, राष्ट्र के प्रति त्याग, प्रेम, अनुशासन और स्वच्छता के बारे में यह देश अनुकरणीय है। स्काटलैंड देश में कानून का पालन किया जाता है। समय के महत्व को समझा जाता है।
चंबा में स्वच्छता प्रयास
इस प्रकार जब मैंने उमा जोशी जी का यह पुराना लेख पढ़ा तो मुझे अपने शहर चंबा के बारे में भी चिंतित होना आवश्यक है। सौभाग्य की बात है कि चंबा शहर में इस समय एक योग्य अधिशासी अधिकारी के रूप में शांति प्रसाद जोशी कार्यरत हैं। उनको एक अनुभव है और एक चिंतनशील व्यक्ति हैं। सरकारी नौकरी किसी की बपौती नहीं होती है। अभी ट्रांसफर हो जाए तो फिर दूसरे कोई आएंगे। मेरा मानना है कि जोशी जी ने स्वच्छता के मामले में जो पहल चंबा नगर पालिका परिषद में की है वह एक मिसाल रहेगी। मैं आशा करता हूं कि वर्तमान अध्यक्ष सुमन रमोला जी और अधिशासी अधिकारी तथा समस्त सम्मानित सभासद, गणमान्य व्यक्ति, चंबा में रहने वाले नागरिक और हमारे स्वच्छक भाई यह शहर को भी स्वच्छ और साफ बनाने में अपना अनुकरणीय योगदान देंगे। अतिक्रमण से नगर को बचाएंगे। पहाड़ के वक्षस्थल को काट काट कर छलनी नहीं करेंगे। पर्यावरण का संरक्षण करेंगे। अतिक्रमण जो एक बीमारी का रूप लेता जा रहा है। उससे बचेंगे और किसी भी प्रकार के जातीय और क्षेत्रीय भिन्नता से दूर रहकर के चंबा के समग्र विकास की ओर आगे बढ़ेंगे। यह मेरा मानना है।
स्कॉटलैंड न सही मसूरी की तर्ज पर हो सकता है प्रयास
जितना ध्यान हम नकारात्मक बातों पर देते हैं, अगर उतना हम चंबा के विकास के बारे में सोचें तो यह भी स्कॉटलैंड या स्विट्जरलैंड या पहाड़ों की रानी मसूरी जैसा बन सहता है। यहां सीवर लाइन का किस प्रकार से निर्माण और प्रबंधन हो, पेयजल की कैसे सुव्यवस्था हो, किस प्रकार से प्रबंधन हो, स्वच्छ पानी, स्वच्छ हवा और स्वच्छ जीवन शैली हम किस प्रकार से अपनाएं। इसके प्रति जागरूक होना भी हमारा यह कर्तव्य है। कमोबेश आज सभी क्षेत्र आगे बढ़ रहे हैं और जनमानस इस ओर ध्यान दे रहे हैं। शिक्षा का स्तर बढ़ जाने के कारण आज चंबा शहर क्षेत्रीय शिक्षा का केंद्र बन गया है। अनेक व्यक्तिगत और संस्थागत संस्थान यहां पर हैं, जो कि अपने बच्चों के अंदर इस प्रकार की नई सोच डालने का प्रयास करते हैं ।चाहे वह मिशनरी के विद्यालय हों, चाहे विद्या भारती के विद्यालय हों, चाहे व्यक्तिगत विद्यालय हों चाहे सरकारी विद्यालय हों। सभी एक योगदान है। बच्चा मनुष्य का पिता है। बच्चों से हम ज्यादा सीखते हैं। आवश्कता संस्कार की है। स्वच्छता संस्कार की है। स्वच्छता, स्वस्थता, सुंदरता और संस्कारिकता के साथ आगे बढ़ें। यही मेरी शुभकामनाएं हैं।
लेखक का परिचय
कवि एवं साहित्यकार सोमवारी लाल सकलानी, निशांत सेवानिवृत शिक्षक हैं। वह नगर पालिका परिषद चंबा के स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर हैं। वर्तमान में वह सुमन कॉलोनी चंबा टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड में रहते हैं। वह वर्तमान के ज्वलंत विषयों पर कविता, लेख आदि के जरिये लोगों को जागरूक करते रहते हैं।

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