June 16, 2021

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टिहरी की रक्तहीन क्रांति के सूत्रधार थे अमर शहीद श्रीदेव सुमन (जन्मदिवस पर विशेष)

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टिहरी राज्य की जन संघर्ष की गाथा मात्र एक गाथा नहीं, वरन यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। जो श्रीदेव सुमन की महाशहादत से लेकर न जाने ऐसे कितने भुक्तभोगियों के संघर्षों से जुडी हुई हैं।


यह सर्वविदित है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में मध्य हिमालय के गढवाल एवं कुमायूं मंडलों की अग्रणी भूमिका रही है। देश में दोहरी गुलामी के विरूद्ध संघर्ष में देश की 584 देसी रियासतों में रियासत टिहरी गढवाल की जनता का गौरवपूर्ण स्थान रहा है। यह इतिहास के पन्नों पर अंकित हैं, किन्तु वर्तमान पीढी में कितने लोगों को ज्ञात है कि टिहरी की रक्तहीन क्रांति के सूत्रधार अमर शहीद श्रीदेव सुमन थे। वे कवि थी थे, पत्रकार भी थे और शिक्षक भी। उनसे आज के लोगों को सीख लेनी चाहिए।
जन्मस्थान
टिहरी राज्य की जन संघर्ष की गाथा मात्र एक गाथा नहीं, वरन यह एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। जो श्रीदेव सुमन की महाशहादत से लेकर न जाने ऐसे कितने भुक्तभोगियों के संघर्षों से जुडी हुई हैं। महान स्वतंत्रता सेनानी एवं क्रातिकारी श्रीदेव सुमन का जन्म 25 मई 1916 को तत्कालिन टिहरी रियासत के जौल गांव में हुआ था। उनके पिता पं. हरिराम बडोनी वैद्य का कार्य करते थे। सुमन जी के पिता के आकस्मिक निधन से परिवार का पालन पोषण का सम्पूर्ण भार उनकी माता तारा देवी पर आ पडा। सुमन उस समय मात्र तीन वर्ष के थे। दो बडे भाई कमलनयन सात वर्ष और परसुराम पांच वर्ष के तथा छोटी बहिन गायत्री मात्र एक वर्ष की थी।
शिक्षा
सुमन जी ने टिहरी मिडिल स्कूल से मिडिल परीक्षा उतीर्ण करने के बाद देहरादून सनातन धर्म स्कूल में अध्यापकी कीं। इसी बीच उन्होंने ‘हिन्दी पत्र बोध’ नामक पुस्तिका प्रकाशित की। कई समाचार पत्रों का भी सम्पादन भी किया। सुमन जी के विचार वचपन से ही क्रान्तिकारी थे। वे तत्कालिन टिहरी राजा के अत्याचारों से दुखी थे और तब वे टिहरी रियासत की सामन्तशाही और दमनकारी नीतियों का विरोध करने लगे।
सामंतशाही के खिलाफ लड़ाई
सन 1930 में उन्होंने देहरादून में टिहरी प्रजामंडल की स्थापना की और टिहरी की सामन्तशाही के विरूद लडाई छेड़ दी और उस खद्दरधारी युवक ने टिहरी नरेश की दमनकारी नीतियों के विरोध में अपना जनसम्पर्क और अभियान तेज कर दिया। सन 1930 में सुमन नमक सत्याग्रह आन्दोलनकारियों के साथ सम्मिलित हुये और पकड़े जाने पर 14 दिन जेल में रखे गये। जेल से छुटने के बाद वे पढ़ने लाहौर चले गये और पंजाब विश्विद्यालय की हिन्दी परीक्षाओं की तैयारी करने लगे।
साहित्य का सेवन
उन्हीं दिनों वे श्री मनुदेव शास्त्री के सम्पर्क में आये और उनके सहयोग से दिल्ली में देवनागरी विश्वविद्यालय की नींव डाली। दिल्ली में अध्ययन और अध्यापन के साथ- साथ वे साहित्यिक सेवा में भी लगे रहते थे। उन्होंने वर्ष 1937 में ‘सुमन सौरभ’ नाम से अपनी कविताओं का संग्रह भी प्रकाशित किया। इसमें देशभक्तिपूर्ण और समाज सुधार से संबंधित कवितायें हैं।
कुछ महिनों उन्होंने भाई परमानन्द द्धारा संचालित हिन्दु महासभा के मुख्य पत्र ‘हिन्दु’ में भी कार्य किया और उसके बाद कुछ महिनें तक जगतगुरू शकराचार्य द्वारा संचालित साप्ताहिक पत्र ‘धर्म राज्य’ के कार्यालय में कार्य किया। उसी दौरान वे प्रसिद्ध साहित्यकार कालेलकर के सम्पर्क में आये और कालेलकर उनसे बहुत प्रभावित हुये। वह उन्हें अपने साथ वर्धा ले गये तथा उन्हें राष्ट्रभाषा प्रचार-प्रसार समिति के कार्यालय में नियुक्त किया। जहां सुमन जी ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
पंडित नेहरू की अध्यक्षता में हुए अधिवेशन में लिया भाग
इसके बाद वर्ष 1939 में अखिल भारतीय देशी राज्य परिषद का अधिवेशन पंडित जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में लुधियाना में सम्पन्न हुआ। श्रीदेव सुमन ने टिहरी राज्य प्रजामण्डल के प्रतिनिधि के रूप में इस अधिवेशन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। अप्रैल 1940 में श्रीदेव सुमन जी रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के पश्चात देहरादून पहुंचे। इसके बाद टिहरी रियासत में प्रवेश किया और पुनः रियायत की जनविरोधी नीतियों के विरोध में जनता को जागृत किया।
भारत छोड़ो आंदोलन में हुए गिरफ्तार
टिहरी में आम सभाओं के आयोजन पर लगे प्रतिबन्ध के कारण वे वापस देहरादून लौट आये। अगस्त 1942 में देशव्यापी भारत छोडो आन्दोलन के कारण टिहरी रियासत से बाहर प्रजामण्डल के सभी प्रमुख कार्यकर्ता सुमन जी के साथ गिरफ्तार हो गये और उन्हें सुमन जी के साथ आगरा जेल भेज दिये गये।
फिर टिहरी में तेज किया आंदोलन
11 नवम्बर 1943 को आगरा जेल से रिहा होने के बाद वे अपनी कार्यस्थली टिहरी जाने लगे। कई लोगों ने उन्हें टिहरी रियासत में प्रवेश न करने की सलाह दी, क्योंकि वहां से वे किसी भी समय पकडे़ जा सकते थे। लेसुमन ने कहा-मेरा कार्य क्षेत्र टिहरी है और जनता के अधिकारों के लिये टिहरी के सामन्तवाद के विरोध में लड़ना मेरा पुनीत कर्तव्य है। टिहरी नरेश ने इस बीच सूमन जी को कई प्रलोभन दिये, लेकिन वे राजा के समक्ष नहीं झुके और टिहरी रियासत की जन विरोधी राज-सत्ता को उखाड़ने के लिये उन्होंने अपना आन्दोलन और तेज कर दिया।
अपनी पैरवी की खुद
आन्दोलन भरे जीवन के मध्यान्त में उन्हें 30 दिसम्बर 1943 को चम्बा में पकड़ कर टिहरी जेल भेज दिया गया। रियासत की जेल में दर्दनाक यातनायें यातनायें दी गई। उन पर राजद्रोह का झूठा मुकदमा चलाया गया। सुमन जी ने अपने मुकदमे की खुद पैरवी की और कहा- मेरे विरूद्ध जो गवाह पेश किये गये वे कतई बनावटी और बदले की भावना से प्रेरित हैं। मैं इस बात को स्वीकारता हूं कि मैं जहां अपने देश की पूर्ण स्वाधीनता के घेरे में विश्वास करता हूं। वहीं टिहरी रियासत में मेरा प्रजामण्डल का उददेश्य वैध व शान्तिपूर्ण तरीके से श्री महाराज की छत्रछाया में उत्तरदाई शासन प्राप्त करना है। सेवा के माध्यम से राज्य की सामाजिक, आर्थिक और सब तरह की उन्नति करना है। मैं प्राण रहते हुये इस राज्य के सार्वजनिक जाीवन का अन्त नहीं होने दूंगा।
जेल में दी गईं दर्दनाक यातनाएं
उस समय टिहरी रियासत में न्याय और निष्पक्ष निर्णय का थोड़ा भी अंश होता तो सुमन जी को रिहा कर दिया जाता, लेकिन उल्टा उन्हें दो वर्ष की कठोर कारावास व 200 रुपये जुर्माने की सजा दी गई। अब वे सजा प्राप्त बन्दी हो गये और वहां दर्दनाक यातनायें दी गई।
जेल में किया अनशन और दिया बलिदान
उन्होंने टिहरी रियासत के सामने अपनी तीन मांगें रखी, जो मानी नहीं गयी। अन्त में जेल में उनके साथ हुये दुर्व्यवहार और उनकी सही मांगें न माने जाने के विरोध में उन्होंने 3 मई 1944 को अपना ऐतिहासिक अनशन शुरू कर दिया। उसी दिन से उन पर अवर्णनीय अत्याचार शुरू कर दिये गए। ऐसी हालत में वे घंटो बेहोश रहे। 84 दिन की इस ऐतिहासिक भूख हडताल के बाद 25 जुलाई 1944 को वह क्रान्तिकारी अपने देश, सिद्धान्तों, आदर्श और अपनी रियासत के लिये सदा-सदा के लिये भगवान की गोदी में सो गया।
मौत की परिवार को भी नहीं दी सूचना
टिहरी रियासत के राज्य कर्मचारियों ने जनाक्रोश के भय से 25 जुलाई 1944 की रात्रि को अमर शहीद श्रीदेव सुमन के पार्थिव शरीर को बिना उनके परिवार को सूचित किये टिहरी की भिलंगना नदी में बलपूर्वक जल-मग्न कर दिया। सुमन जी की शहादत से टिहरी रियासत में खलबली मच गई और उनके बलिदान की परिणति स्वरूप टिहरी रियासत के सामन्तवाद का अन्त होने लगा। श्रीदेव सुमन का यह ऐतिहासिक बलिदान विश्व के अन्य बलिदानों से विलक्षण है। परन्तु जो सम्मान और स्थान ऐसे शहीद को मिलना चाहिये था, वह उन्हें नहीं मिला।
सम्मान में ये बोले थे नेहरू
स्वयं पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 31 दिसंबर 1945 को कहा था-हमारे स्वतंत्रता संग्राम में जो अनेक शहीद हुये उनमें से टिहरी के श्रीदेव सुमन के नाम का मैं विशेष रुप से उल्लेख करना चाहता हूं। हम में से अनेक इस वीर, लगनषील युवक को याद करते रहेंगे। जिन्होंने उस राज्य की जनता की आजादी के लिये कार्य किया। वे एक स्वतंत्रता सेनानी के साथ ही एक कवि, लेखक, शिक्षक, पत्रकार व समाजसेवी भी थे। अमर षहीद श्रीदेव सुमन की देशभक्ति और क्रान्ति की भावना स्वयं उनके द्वारा लिखित कविता की इन पक्तियों से भी स्पष्ट होती है-
सत्य के सिद्धान्त पर ही सत्य आग्रह ये हमारा
देशहित बलिदान होवें, हिसां रहित पथ है हमारा
आज आंचल में सुमन बस, एक लघु उपहार मांजी
यह चरण रज में मिलें या कश्ट का हार मांजी।
सामंतशाही के खिलाफ दांव पर लगाया जीवन
अमर शहीद श्रीदेव सुमन जैसे क्रान्तिकारी बहुत कम हुए, जिन्होंने एक ओर विदेशी शासन से भारत मां को मुक्ति दिलाने के लिए संघर्ष किया और दूसरी ओर सामन्तशाही व राजशाही के अत्याचारों से पीड़ित और शोषित प्रजा को सामन्तवाद से छुटकारा दिलाने के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया। समाज के अधिकारों की रक्षा और मानवता की अस्मिता बचाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिया।
अमर शहीद श्रीदेव सुमन जैसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व क्रान्तिकारी को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व से कुछ शिक्षा ग्रहण करें और उन्हें अपने देष के अन्य स्वतंत्रता स्रंगाम सेनानियों एवं शहीदों में उचित स्थान दिलायें।

लेखक का परिचय
डॉ. मुनिराम सकलानी, मुनींद्र। पूर्व निदेशक राजभाषा विभाग (आयकर)। पूर्व सचिव डा. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल हिंदी अकादमी,उत्तराखंड। अध्यक्ष उत्तराखंड शोध संस्थान। लेखक, पत्रकार,कवि एवम भाषाविद। निवास : किशननगर, देहरादून, उत्तराखंड।

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