June 13, 2021

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कवि एवं कथाकार शैलेन्द्र प्रसाद बहुगुणा की कहानी- बडे़ बाबू

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वैसे तो उनका नाम राम स्‍वरूप सक्‍सेना था, परंतु उनके ओहदे और बुजुर्गियत को देखते हए सभी लोग उनको बड़े बाबू के नाम से संबोधित कर सम्‍मान देते थे।

बडे़ बाबू
वैसे तो उनका नाम राम स्‍वरूप सक्‍सेना था, परंतु उनके ओहदे और बुजुर्गियत को देखते हए सभी लोग उनको बड़े बाबू के नाम से संबोधित कर सम्‍मान देते थे। वे “यथा नाम, ततो गुण:” संपन्‍न थे। ऑफिस का कोई भी काम बड़े बाबू की मर्जी के खिलाफ नहीं हो सकता था। हलके के बड़े-बड़े सरकारी नुमाइंदे उन्‍हें जानते थे। इसकी वजह यह थी कि सूबे के मंत्री जी उनके करीबी रिश्‍तेदारों में से थे। बड़े बाबू की ऊपर तक की पहुंच के कारण ही कई शिकवा-शिकायतों के बावजूद वे पिछले 17 सालों से उसी शहर में एक ही सीट पर कार्यरत थे। उनके बाद आए कई लोगों के ट्रांसफर हो गए थे, लेकिन उनका ट्रांसफर नहीं होता था। विभाग के सर्वोच्‍च अधिकारी भी उनसे सलाह लेते थे और बिना बड़े बाबू की रजामंदी के कोई भी काम नहीं करते थे। थोड़े से शब्‍दों में कहें तो वे ही असली साहब थे।
इंसपेक्‍टर हो या विभागीय क्‍लर्क, सभी अपनी अपनी कमाई का कुछ हिस्‍सा श्रद्धापूर्वक बड़े बाबू को देते थे। बड़े बाबू की उदारता इतनी थी कि वे तयशुदा दर से कम दर पर श्रद्धा-सुमन स्‍वीकार नहीं करते थे। हां, वे ऐसे मामलों में कभी-कभी निशुल्‍क सेवा प्रदान कर देने का आश्‍वासन दे देते थे। वे दिन भर धूल भरी फाइलों से उलझे रहते थे और एक वफादार सरकारी नुमाइंदे का फर्ज अदा करते थे। आखिर वे अंग्रेजों के जमाने के जो थे। उर्दू और अंग्रेजी के ड्राफ्ट ऐसी मृदुभाषा में तैयार करते थे कि पढ़ने वाले के होश-फाख्‍ता हो जाएं। अपने दफ्तर के लोगों का उन्‍हें इतना खयाल रहता था कि गर्मियों के मौसम में लंच के वक्‍त अलका आइसक्रीम वाला छोकरा अपनी आइसक्रीम की ट्रॉली को ऑफिस के सामने रोक कर सब बाबू लोगों की टेबिल पर फ्री में एक-एक कप आइसक्रीम रख देता था। यह उसका दैनिक कार्य था। क्‍या मजाल कि कभी नागा हो जाए। बाबू लोगों के गले हमेशा तर रहने चाहिए। यह उसके लिए ध्‍येय वाक्‍य जैसा था। अत: पूरा स्‍टाफ बड़े बाबू से बहुत ही खुश रहता था। हां, जिस रोज बड़े बाबू किसी कारणवश दफ्तर नहीं आ पाते, उस दिन चपरासी रामलाल से लेकर बड़े साहब तक सब उदास रहते थे। उस दिन बड़े बड़े साहब का मूड जानना भी आसान नहीं होता था। बड़े बाबू बहुत कुछ कंट्रोल कर लेते थे। इंसपेक्‍टर लोगों की सिफारिशों को नकार देने का अधिकार उन्‍हें विरासत में मिला था। हलके के सभी छोटे-बडे़ उद्योग धंधों को कच्‍चा माल वगैरह भी सब उनकी ही सिफारिश पर मिलता था। अत: उद्योगपतियों में भी उनकी खासी पैंठ थी।
और एक रोज खदानों में कामगारों की अचानक हड़ताल हो गई। डिपो में कच्‍चे माल का स्‍टॉक तेजी से समाप्‍त होने लगा था। दूसरे कच्‍चे माल की स्थिति तो फिर भी ठीक थी, लेकिन बॉक्‍साइट जैसे मटीरियल की किल्‍लत महसूस होने लगी थी। कई कारखाने ऐसे थे जो कच्‍चे माल की कमी से बंद होने की कगार पर आ गए थे। उद्योग धंधों पर संकट के बादल गहराने लगे थे। अगर हड़ताल लंबी खिंची तो बहुत से कामगार भी बेगार हो जाएंगे। विभागीय निरीक्षक भी अपनी जेबें हल्‍की महसूस करने लगे थे। हल्‍की जेब का अहसास सबसे पहले बड़े बाबू को हुआ था। या यों कहिए कि वे इसे खासा पहले ताड़ गए थे। निदेशालय को पत्र लिखे जाने लगे कि बॉक्‍साइट का तुरंत इंतजाम किया जाए वरना वहां के उद्योग धंधे बंद हो जाएंगे और भारी संख्‍या में लोग बेरोजगार हो जायेंगे। इससे राष्‍ट्रीय आय को भी भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। जीडीपी नीचे चली जाएगी। वैसे ही मंदी का दौर चल रहा है। बड़े बाबू ने अपने पत्र में पूरी की पूरी देश भक्ति उड़ेल दी थी। निदेशालय भी क्‍या करता, लेकिन राष्‍ट्रीय हानि के अंदेशे वे वह भी अपनी ओर से कागजी कार्यवाही कर रहा था।
बड़े बाबू रोजाना की तरह डाक देख रहे थे। लिफाफा खोल कर पत्र निकालते, उन पर अपनी टिप्‍पणी लिखते और फिर ट्रे में डाल देते थे। अचानक एक लिफाफे ने उन्‍हें यकायक खुश कर दिया। उनकी आंखों में जानी-पहचानी चमक आ गई थी। बीड़ी का बंडल निकाल कर उन्‍होंने बीड़ी सुलगाई और एक लंबा कश लिया फिर चश्‍में को रूमाल से साफ करते हुए सोचने लगे। उन्‍होंने पत्र को एक बार फिर पढ़ा और उसे लेकर बड़े साहब के चैंबर में घुस गए। पंद्रह बीस मिनट बाद वे बाहर आए और बगल वाली केबिन में घुस गए जहां इंसपेक्‍टर भटनागर बैठते थे।
“भटनागर साहब, जी एस एंटरप्राइस के पार्टनर्स में डिस्‍प्‍यूट चल रहा है। उनके बॉक्‍साइट के कोटे के 22 रैक रेलवे की साइडिंग पर आ गए हैं, लेकिन फैक्‍टरी बंद होने की वजह से वे माल नहीं उठा रहे हैं और इसे सरेंडर करना चाहते हैं। मैंने बड़े साहब से डिस्‍कस कर लिया है और वे इसे दूसरी जरूरतमंद यूनिटों में डिस्ट्रिब्‍यूट करने के लिए कह रहे हैं।” अपनी बात पूरी करते हुए बड़े बाबू ने वह पत्र इंसपेक्‍टर भटनागर को सौंप दिया और कुर्सी खींच कर वहां बैठ गए। भटनागर ने पत्र और उस पर लिखी बड़े साहब की टिप्‍पणी पढ़ी। बड़े बाबू को पत्र वापस देते हुए कहा, “ठीक है, आप पेपर में इश्‍तहार भेज दीजिए, जिसे जरूरत होगी, अलॉट कर देंगे। कल सुबह के पेपर में इश्‍तहार छप जाए तो बेहतर होगा।”
इश्‍तहार पढ़ते ही कई छोटे बड़े उद्योगपति अपनी अपनी दरख्‍वास्‍तें लेकर बड़े साहब के पास पहुंचने लगे। बड़े साहब उन्‍हें थ्रू-प्रॉपर-चैनल बात करने को कहते। लिहाजा वे बड़े बाबू से मिलते। विशाल इंडस्‍ट्रीज के गुप्‍ता बड़े बाबू के पास गए तो बड़े बाबू ने बाकी लोगों को प्रतीक्षा करने के लिए कहा और गुप्‍ता को लेकर इंसपेक्‍टर भटनागर के केबिन में पहुंचे। उनके पत्र पर बातचीत होने लगी। तभी रामलाल चपरासी चिक उठा कर केबिन में घुसा।
“बड़े बाबू, आपने मुझे चाय लाने को कहा?” रामलाल ने बहुत मासूमियत से पूछा। बड़े बाबू ने भी स्‍नेहिल नेत्रों से रामलाल को निहारा और फिर गुप्‍ता की ओर मुखातिब हुए। गुप्‍ता दफ्तरी तौर-तरीकों से वाकिफ था। अत: उसने जेब से सौ रुपए का नोट निकाला और मुस्‍कराते हुए रामलाल के हाथ पर रख दिया। रामलाल जाने लगा तो बड़े बाबू ने उससे गोपी बाबू को अंदर भेजने के लिए कहा। रामलाल चला गया तो गोपी बाबू ने केबिन में प्रवेश किया।
छोटी कद-काठी का नया-नया भरती हुआ गोपी बाबू, लेकिन अपने काम में इतना माहिर कि पुराने घाघ भी दांतों तले उंगली दबाते थे। गोपीबाबू की विशेषता यह थी कि वह बड़े बाबू के हल्‍के से इशारे को भी ठीक-ठीक समझ लेता था, जिससे बड़े बाबू का काम आसान हो जाता था। यही वजह थी कि गोपी बाबू जल्‍दी ही बड़े बाबू का विश्‍वासपात्र बन गया। बड़े बाबू का विश्‍वासपात्र बनना अपने आप में अहमियत रखता था। बड़े बाबू ने गोपी बाबू को अलॉटमेंट फॉर्म देते हुए कहा, “जरा जल्‍दी से टाइप कर दो। बड़े साहब कल दौरे पर रहेंगे।” फिर गुप्‍ता की ओर मुखातिब होते हुए बोले, “पूरा एक वैगन दे रहे हैं, खुश हो जाइए।” गोपी बाबू फॉर्म लेकर गया और थोड़ी देर में वापस केबिन में पहुंचा। तब तक रामलाल चाय की ट्रे और समोसे लेकर पहुंच गया था। सब को चाय समोसे मिले। गुप्‍ता जानता था कि रामलाल से बाकी पैसे मांगना अभद्रता होगी, लिहाजा उसने भद्रता की सीमा नहीं लांघी।
चाय समोसे के बाद बड़े बाबू अलॉटमेंट लेटर लेकर बड़े साहब के चैम्‍बर में गए और अलॉटमेंट लेटर पर उनके दस्‍तखत करवा कर लौटे। जल्‍दी से डिस्‍पैच नंबर डलवाया और एक प्रति गुप्‍ता को थमा दी। गुप्‍ता ने लेटर लिया और सभी को शुक्रिया अदा किया। वह बाहर की ओर मुड़ने को हुआ ही था कि बड़े बाबू ने रोकते हुए कहा, “गुप्‍ता जी, बेचारे गोपी का तो ख्‍याल कीजिए। आखिर इसने आपका अलॉटमेंट का लेटर इतना जल्‍दी तैयार कर दे दिया।” गुप्‍ता दफ्तरी कार्यप्रणाली को जानता था खासकर जब से वह कंपनी का मटीरियल्‍स मैनेजर बना था। उसे ऐसे मौकों से बार-बार रूबरू होना पड़ता था। अंत: वह बड़े बाबू की शब्‍दावली से भलीभांति परिचित हो गया था। गुप्‍ता ने पांच सौ रुपए का नोट गोपी की जेब में डाला ही था कि बड़े बाबू यकायक नोट पर झपट पड़े। “गुप्‍ता साहब, क्‍यों बेचारे की तौहीन करते हो। हजार-पांच सौ तो कोर्ट कचहरी में टाइप करवाने में खर्च हो जाते हैं। फिर यह तो अलॉटमेंट लेटर है, वह भी पूरे एक वैगन का।” उन्‍होंने विशेष जोर देते हुए कहा था।
“बड़े बाबू, अभी तो कई बार आपके पास आना है। इंपोर्ट लाइसेंस की एप्‍लीकेशन भी तो आपके पास पड़ी है। फिलहाल ।।।।।।।।।।।।।। ” गुप्‍ता ने खिसियाते हुए कहा।
“अच्‍छा जाने दीजिए। हम आपसे कुछ नहीं लेते हैं। इसे भी ले लो। अपने बच्‍चों के लिए मिठाई लेते जाना।” बड़े बाबू ने गुप्‍ता को नोट लौटाते हुए कहा।
अनुभवी गुप्‍ता ने बड़े बाबू के वाक्‍य का अर्थ भविष्‍य के संदर्भ में लगाया। वह जानता था कि इंपोर्ट लाइसेंस का मामला इससे भी ज्‍यादा पेचीदा है। इसलिए वह फ़ुंसी को नासूर नहीं बनने देना चाहता था। उसने वह नोट वापस नहीं लिया, बल्कि बैग से नोटों की एक गड्डी निकाली और मुस्‍कराहते हुए बड़े बाबू के हाथ में रख दी। बड़े बाबू ने भी शालीनता से नोट स्‍वीकार किए। पांच सौ रुपए का वही नोट गोपी बाबू को देते हुए बाहर बैठे रामलाल को आवाज लगाई। “रामलाल, अग्रवाल साहब को अंदर भेजो।”
थोड़ी देर में एक और उद्योगपति इंसपेक्‍टर भटनागर के केबिन में घुसा। नियमानुसार, रामलाल अग्रवाल से भी सौ रुपये का नोट लेकर सबके लिए पान सुपारी का इंतजाम करने चला गया। अग्रवाल साहब के अलॉटमेंट लेटर विचार होने लगा। बाकी उद्योगपति बाहर बैठे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।
लेखक का परिचय
नाम-शैलेन्द्र प्रसाद बहुगुणा
लेखक उत्तराखंड राज्य के पौड़ी गढ़वाल जिले के मूल निवासी हैं। शिक्षा गांव की स्कूल से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय तक और बैंकिंग की शुरूआत मुम्बई में हुई है। वह कला के साथ साथ विज्ञान का छात्र भी रहे हैं। इसलिए वैज्ञानिक विषयों में भी काफी रुचि रहती है। रोजगार के लिए गांव से बाहर कदम रखा और उत्तर प्रदेश के उद्योग विभाग के अंतर्गत बरेली में, भारत सरकार के संचार मंत्रालय के अंतर्गत नई दिल्ली में और अंत में एक राष्ट्रीयकृत बैंक में मध्य प्रबंधन श्रेणी में राजभाषा अधिकारी के रूप में कार्य किया। इस दौरान उत्तर प्रदेश के बरेली, दिल्ली, मुम्बई, पटना, भोपाल, अहमदाबाद और बड़ौदा में तैनाती रही। अधिकांश समय पढ़ने लिखने, पर्यावरण संबंधी जानकारी, फोटोग्राफी/वीडियोग्राफी, कंप्यूटर पर वैज्ञानिक पहलुओं को समझना, संगीत सुनना और पर्यटन में रहा है। वर्तमान में बैंक से सेवानिवृत्त हो कर अहमदाबाद में निवास कर रहे हैं।

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