April 14, 2021

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दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’ की गढ़वाली गजल-ब्यो-काजा लग्न

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दीनदयाल बन्दूणी 'दीन' की गढ़वाली गजल-ब्यो-काजा लग्न।


ब्यो-काजा लग्न

गुम- सुम हुयूं सरग, न बरखणूं- अखरणूं च,
चौदिसौं बुजिना लग्यां, न सरकणूं-फरकणूं च..

दिनम चुड़ापटी घाम, ब्यखुनिदां बादळ घिरीं,
बादळ छीं-कि धुआं, न गड़कणूं- चमकणूं च..

मंथा का इना दंदोऴ-घंघतोऴ, पोरु बटी देखीं,
द्वी घड़ी चैन से-कबरि क्वी, न पोड़णूं-बैठणूं च..

ब्यो-काज ऐं नजीक, लोगों-जिकुड़ि लै झुऱणि,
उनि कोरोना- गिचु खोलि, नचणूं- खेलणूं च..

आजा दिन-चलि ग्याई, भोऴ कुजड़ि क्य होलू,
रोजा नीम-कानून से, जिकुड़ु हिलणूं-डुलणूं च..

कैथैं बरत्यूं-कैथैं घरत्यूं , अपड़ि डैर सभ्यूं लगीं,
क्वी बैंड- क्वी टैंट- हलवै, समझा़णूं-मनाणूं च.

‘दीन’ हे प्रभू बचै दे-निभै दे, सभ्यूंक ब्यो-काज,
बगत आजा देखि-देखि, सरैल डरणूं-कौपणूं च..

कवि का परिचय
नाम-दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’
गाँव-माला भैंसोड़ा, पट्टी सावली, जोगीमढ़ी, पौड़ी गढ़वाल।
वर्तमान निवास-शशिगार्डन, मयूर बिहार, दिल्ली।
दिल्ली सरकार की नौकरी से वर्ष 2016 में हुए सेवानिवृत।
साहित्य-सन् 1973 से कविता लेखन। कई कविता संग्रह प्रकाशित।

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