June 30, 2022

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संविधान दिवस पर युवा कवि नेमीचंद मावरी की एक व्यंग्य रचना

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संविधान की रग-रग में 26/11 का खून बहता दिखता है,
राष्ट्र की संप्रभुता और एकता पर प्रश्नचिन्ह लगता दिखता है,
सहज में ही भेद जाती है अन्याय की सुई मानो तलवार सी,
“हम भारत के लोग” वाक्य पर अब कहाँ हर कोई टिकता है ।

कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं
राजनीति के गलियारों में भी आततायियों का शोर है,
अखंडता भी खंडित हो चुकी है शनै-शनै,
नीति नियमों में भी अब तो लक्ष्मीपतियों का जोर है।

धर्म के पलड़ों पर अब तुल रहा संविधान है,
आलमारियों में दब चुके यहाँ गीता और कुरान है,
रोटी पाने को भी फुटपाथों पर झगड़े होते हैं,
अल्लाह भी बेखबर है जैसे और बेखबर राम है।

हर वर्ष बस एक दिन का संविधान दिवस मन जाता है,
मगर एक बच्ची की लाज बचाने आखिर कौन पहुँच पाता है,
धाराओं की धज्जियां उड़ाकर जाते बहुत से दिखते हैं,
मगर बेबसों की आवाज को कोई नहीं सुन पाता है।

हमें संविधान की रक्षा का जिम्मा खुद को लेना होगा,
हर अन्याय और शोषण का जवाब खुद को देना होगा,
फिर विधि में लिखित हर वक्तव्य हम फख्र् से बोल सकेंगे,
फिर हर कदम पर कदम मिला हमको भी बढ़ना होगा।

कवि का परिचय

नेमीचंद मावरी “निमय”
हिंदी साहित्य समिति सदस्य,
बूंदी, राजस्थान
नेमीचंद मावरी “निमय” युवा कवि, लेखक व रसायनज्ञ हैं। उन्होंने “काव्य के फूल-2013”, “अनुरागिनी-एक प्रेमकाव्य-2020” को लेखनबद्ध किया है। स्वप्नमंजरी- 2020 साझा काव्य संग्रह का कुशल संपादन भी किया है। लेखक ने बूंदी व जयपुर में रहकर निरंतर साहित्य में योगदान दिया है। पत्रिका स्तंभ, लेख, हाइकु, ग़ज़ल, मुक्त छंद, छंद बद्ध, मुक्तक, शायरी , उपन्यास व कहानी विधा में अपनी लेखनी का परिचय दिया है।

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