June 29, 2022

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उत्तराखंड में चारधामों में दो धाम हैं उत्तरकाशी में, जानिए गंगोत्री व यमुनोत्री मंदिर का इतिहास, धार्मिक मान्यताएं

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उत्तराखंड की पहचान धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से विश्वभर में है। यहां जहां हिंदुओं की आस्था के केंद्र चारधाम गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ हैं, वहीं सिखों का पवित्र तीर्थ हेमकुंड साहिब भी है। इन चार धाम में दो धाम उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में हैं। चारधाम की यात्रा की शुरूआत भी गंगोत्री व यमुनोत्री से होती है। आइए हम उत्तरकाशी जिले में इन दो धामों के संबंध में बताते हैं।
गंगोत्री धाम, जहां है माता गंगा का मंदिर
गोमुख, भोजवासा और चीड़वासा से लगभग 20 किलोमीटर की पावनयात्रा करती हुई
भगीरथी नदी गंगोत्री क्षेत्र को पावन करती है। गंगोत्री के समीप गौरीकुंड में केदार गंगा भगीरथी से मिलती है। गंगोत्री का वर्तमान मंदिर 20 फीट ऊँचाई पर वर्गाकार एक गोरखा सरदार अमरसिंह थापा की ओर से उन्नीसवीं सदी का बनवाया हुआ है। गंगोत्री समुद्रतट से 10,300 फीट ऊँचाई पर होने के कारण अत्यधिक ठंडा स्थान है।


भगीरथ ने यहां की थी तपस्या
मंदिर का निर्माण उसी शिलाखण्ड पर निर्मित है, जिस पर भागीरथ ने बैठकर तपस्या की थी। गंगा मंदिर के समीप ही इस स्थान के रक्षक देवता भैरव का एक छोटा सा मंदिर है। गंगा मंदिर में गंगा, भगीरथ तथा अन्य देवताओं की मूर्तियां है। मंदिर का प्रांगण चपटे पाषाणों से ढ़का हुआ है। वर्तमान में अमरसिंह थापा की ओर से बनाये गये मंदिर का अस्तित्व नहीं है। इस समय यहाँ एक भव्य और विशाल मंदिर है। इसका निर्माण जयपुर के राजा ने कराया था। गंगोत्री धाम मई मास से अक्टूबर या फिर नवंबर तक खुला रहता है। दीपावली के पश्चात् गोवर्धन पूजा के उपरान्त मंदिर के कपाट बन्द कर दिये जाते हैं। इसके बाद शीतकाल में श्रीगंगा की पूजा मुखवा धाम में की जाती है। पूजा अर्चना सेमवाल जाति के ब्राह्मण करते हैं । सन् 1810 से पहले धराली के बुढेरे किरात गंगोत्री के पुजारी थे। इस क्षेत्र का प्राकृतिक सौन्दर्य देखने योग्य है । यहाँ वन सम्पदा भरपूर है।
गौरी कुण्ड
गंगा मंदिर से नीचे की ओर लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर भगीरथी की धारा विशाल सीधी खड़ी चट्टानों के मध्य नीचे की ओर झरना बनकर गिरती है। नीचे विशाल आकार का प्राकृतिक शिवलिंग है, जिस पर यह धारा गिरती है। कहा जाता है कि शिव को प्राप्त करने के लिए पार्वती ने यहीं तपस्या की थी।


यमुनोत्री धाम, जहां यमुना की जलधारा पर्वत श्रृंखला को करती है पृथक
उत्तराखंड की चार धाम यात्राओं में से एक धाम यमुनोत्री है। वह तीर्थ हरिद्वार से 274 किलोमीटर की दूरी पर हिमालय में 10617 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ का
नवनिर्मित मंदिर हिममण्डित शिखर वाले भूतल पर सीधे खड़े विशाल पर्वत के मध्य भाग में अवस्थित है। यहाँ पर यमुना की पवित्र जलधारा एक पर्वत श्रृंखला कोदूसरे से पृथक करती है।
ऐसे पहुंचा जाता है यमुनोत्री
हरिद्वार से यमुनोत्री तक के 274 किलोमीटर के अन्तराल में मुख्य स्थल विश्राम स्थल नरेन्द्रनगर, चम्बा, दो बाटा धरासू, ब्रह्मखाल तथा बड़कोट है। वर्तमान समय में हनुमान चट्टी तक ही मोटर मार्ग की सुविधा उपलब्ध है। यहाँ से यमुनोत्री तक केवल 13.5 किलोमीटर की दूरी पैदल मार्ग से तय करनी होती है। हनुमान चट्टी से यमुनोत्री तक क्रमशः नारद चट्टी, फूलचट्टी, जानकी चट्टी और जंगल चट्टी के पड़ाव दो-दो, तीन-तीन किलोमीटर की दूरी पर है। इन चट्टियों में यात्रियों को भोजन तथा निवास की सुविधा मिल जाती है।


मार्ग का अंतिम गांव खरसाली
हनुमानचट्टी के पास यमुना तथा हनुमान गंगा का संगम है। हनुमान गंगा से मिलने पर जलस्तर पूर्व की अपेक्षा दुगुना हो जाता है। यमुनोत्री के मार्ग में अन्तिम गाँव खरसाली है, जहाँ से यमुनोत्री मंदिर 6 किलोमीटर रह जाता है। अन्य हिमालयी पवित्र तीर्थस्थलों की भाँति यमुनोत्री भी प्राचीन तीर्थ होने से यह प्राचीन काल से मुनियों, साधकों और सन्तों की साधनास्थली और तपस्थली रही है।
महाराजा प्रतापशाह ने कराया था निर्माण
यमुनोत्री मंदिर का निर्माण टिहरी नरेश महाराजा प्रतापशाह ने विक्रम सम्वत् 1919 में किया था। उन्होंने जयपुर में काले संगमरमर पत्थर की यमुना देवी की मूर्ति बनवायी और उसे यहाँ मंदिर में प्रतिष्ठित करवाया। मंदिर के कपाट प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल अक्षय तृतीया तिथि को खुलते हैं और दीपावली में यम द्वितीया तिथि को बन्द होते हैं।
तत्पश्चात् छ: मास के लिए पण्डे लोग यमुना के रजत वस्त्राभूषणों को खरसाली ग्राम में ले आते हैं। मंदिर में यमुना देवी की लगभग एक फुट ऊँची काले संगमरमर पर बनी मूर्ति है और बायीं ओर गंगा देवी की श्वेत संगमरमर पर बनी समान कद की मूर्ति है। यमुना की मूर्ति के नीचे यमराज तथा कृष्ण की मूर्तियां अवस्थित है। मंदिर के पार्श्व में पहाड़ की चट्टान के अन्दर से गरम जलधारा निकलती है। ऊपर की ओर एक जलकुण्ड है, जो सूर्यकुण्ड कहलाता है।
इसका तापक्रम 100 डिग्री सेन्टीग्रेड तक रहता है। इसमें यात्री लोग यमनोत्री के प्रसाद चावल आदि को एक कपड़े में बाँधकर पकाते हैं । सूर्यकुण्ड के समीप गरम जल की दो पतली धारायें ऊपर की ओर निरन्तर फव्वारे के रूप में उठती हैं। उन्हें मुखारबिन्द कहा जाता है। सूर्यकुण्ड के नीचे तप्तकुण्ड है, जिसमें यात्री स्नान करते हैं।
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लेखक का परिचय
लेखक देवकी नंदन पांडे जाने माने इतिहासकार हैं। वह देहरादून में टैगोर कालोनी में रहते हैं। उनकी इतिहास से संबंधित जानकारी की करीब 17 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। मूल रूप से कुमाऊं के निवासी पांडे लंबे समय से देहरादून में रह रहे हैं।

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