June 30, 2022

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उत्तराखंड की सांस्कृतिक गतिविधियों को समृद्ध किया था राज्य आंदोलन ने, जानिए संस्कृतिकर्मियों का योगदान

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उत्तराखंड राज्य आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पहलू सांस्कृतिक आंदोलन भी है। इस दौरान आंदोलन ने संस्कृतिकर्मियों को सक्रिय करने के साथ ही उन्हें एकजुट करने में भी विशेष योगदान दिया। इस आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है कि तब उत्तराखंड में मृतप्राय हो चली सांस्कृतिक गतिविधियों में इसने नए प्राण फूंक दिए। साथ ही नए लेखकों और कलाकारों का उत्तराखंड की जनता से परिचय भी कराया।
ऐसे हुई आंदोलन की शुरूआत
यूं तो उत्तराखंड की मांग वर्षों से चली आ रही थी। फिर भी हम कह सकते हैं कि इस मांग ने वर्ष 1994 से जोर पकड़ा और बड़े आंदोलन का रूप लिया। तब उत्तराखंड क्रांति दल के संरक्षक इंद्रमणि बडोनी (अब दिवंगत) दो अगस्त 1994 में पौड़ी मुख्यालय में विभिन्न मांगों को लेकर आमरण अनशन पर बैठे। इसके बाद आठ अगस्त को पुलिस ने उन्हें जबरन उठा दिया। इसके बाद पर्वतीय क्षेत्र के इस ऐतिहासिक आंदोलन की शुरुआत हुई। जगह जगह टैंट लग गए और धरने प्रदर्शन शुरू हो गए। इस आंदोलन के दौरान उत्तराखंड के कई लोगों ने बलिदान दिए। उन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता है।
आंदोलन ने जगाया लोगों का स्वाभिमान
आंदोलन के दौरान जहां पर्वतीय क्षेत्र की जनता, व्यापारियों को आर्थिक हानि उठानी पड़ी, वहीं, विद्यार्थियों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ा। समूचे पर्वतीय क्षेत्र के साथ ही उत्तराखंड के मैदानी भागों में विकास अवरुद्ध हो गए। इन तमाम नुकसानों के बावजूद उत्तराखंड आंदोलन ने यहां के लोगों का स्वाभिमान को जगाया। आंदोलन की सबसे बड़ी देन उत्तराखंड की सांस्कृतिक पूंजी का समृद्ध होना भी है। इस दौरान कई नए कलाकारों, लेखकों कवियों को अपनी पहचान बनाने के लिए नई जमीन मिली। सांस्कृतिक गतिविधियों को पुनर्जीवित करने वाले इस आंदोलन में आम आदमी के अस्तित्व की लड़ाई को लड़ने के लिए समूचे उत्तराखंड के संस्कृतिकर्मी एकजुट हुए।
हथियार बने जनगीत
उत्तराखंड में सांस्कृतिक गतिविधियां तेज होने परिणाम यह हुआ कि उत्तराखंड के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में आंदोलनकारियों की जुबां पर जनगीत हथियार की तरह इस्तेमाल होने लगे। आंदोलन से प्रेरणा लेकर चर्चित और प्रतिष्ठित रचनाकार सड़कों पर उतरे। साथ ही नए रचनाकारों को अपनी प्रतिभा उभारने का मौका मिला। इस दौरान रचनाकारों ने जो लिखा वह उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में दर्ज हो गया।
पहाड़ के दुख दर्दों से उदय हुए जनगीत
पहाड़ के दुख दर्दों की लड़ाई में बहुत से जनगीतों का उदय हुआ। इसके चलते कई रचनाकारों के गीत पर्वतीय क्षेत्र में स्थापित होकर सुदूर ग्रामीण अंचल में आंदोलन को गति देते रहे। इनमें निरंजन सुयाल का जनगीत-लड़ना है भाई ये तो लंबी लड़ाई है, हर आंदोलनकारी की जुबां पर रहता था। जनकवि डॉ. अतुल शर्मा का गीत-लड़के लेंगे भिड़के लेंगे, छीन लेंगे उत्तराखंड, बल्ली सिंह चीमा का-ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के, गिरीश तिवारी गिर्दा का चर्चित कुमाऊंनी गीत- ततुक नी लगा उदेख, नरेंद्र सिंह नेगी का गढ़वाली गीत-जय भारत जय उत्तराखंड, नैनीताल के जहूर आलम का गीत-ये सन्नाटा तोड़ के आ, के साथ ही प्रमोद पांडे का गीत पूरे उत्तराखंड में आंदोलनकारियों की जुबां पर थे।
आंदोलन के दौरान विभिन्न संस्थाओं की ओर से निकाली गई प्रभातफेरी हो या फिर नुक्कड़ नाटक, सांस्कृतिक जुलूस व रैलियों में जनगीतों का खूब प्रयोग हुआ। पहाड़ की सड़कों पर उतरने वाली महिलाओं, नौजवानों, बूढ़े, बच्चे, सेवानिवृत फौजी आदि ने आंदोलन को गति दी और इस जनआंदोलन को किसी भी राजनीतिक दल की कठपुतली नहीं बनने दिया। ऐसे में राजनीतिक दलों के लोगों को पार्टी के झंडे छोड़कर उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले आना पड़ा।
उत्तराखंड सांस्कृतिक मोर्चा का गठन
पहाड़ की धड़कनों को महसूस करते हुए कुछ प्रतिबद्ध जनपक्षीय कवि, लेखक, चित्रकार, नाट्यकर्मी उद्वेलित हुए। जगह-जगह बैठकें होने लगीं। टिहरी में युवा रंगकर्मी महिपाल सिंह नेगी, दुमोगा आदि के नेतृत्व में जगह जगह नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन होने लगे। साथ ही जनगीत गाए जाने लगे। इसी बीच समूचे गढ़वाल व कुमाऊं मंडल को नुक्कड़ नाटकों से परिचय कराने वाली नाट्य संस्था दृष्टि की पहल पर देहरादून में सांस्कृतिक कर्मियों को एकमंच पर खड़ा करके उत्तराखंड सांस्कृतिक मोर्चा का गठन किया गया। इसके संयोजक नुक्कड़ नाटकों के जाने माने निर्देशक दादा अशोक चक्रवर्ती (अब दिवंगत) को बनाया गया।
देहरादून में यहीं से प्रभातफेरियों का सिलसिला शुरू हुआ। देहरादून की तमाम नाट्य संस्थाओं के सदस्यों ने सांस्कृतिक मोर्चे के तत्वावधान में-केंद्र से छुड़ाना है, नुक्कड़ नाटकों का मंचन कर ये संदेश दिया कि अलग राज्य का आंदोलन प्रदेश सरकार के खिलाफ नहीं, केंद्र के खिलाफ करना चाहिए।


फोटो साभारः अजय गुलाटी

कर्फ्यू में भी जारी रही प्रभातफेरी
इसी सांस्कृतिक मोर्चा ने उत्तराखंड के रणगीत पुस्तक प्रकाशित करके इसे समूचे उत्तराखंड के आंदोलनकारियों तक पहुंचाने का प्रयास किया। आंदोलन में संस्कृतिकर्मियों की भागीदारी के उस दौर में नैनीताल के संस्कृति कर्मी भी पीछे नहीं रहे। युगमंच नैनीताल और जन संस्कृति मंच के कलाकारों ने प्रभातफेरियों का सिलसिला शुरू किया। मुजफ्फरनगर गोलीकांड के बाद लगे कर्फ्यू के दौरान में भी नैनीताल में प्रभातफेरियों का सिलसिला जारी रहा।
जनगीतों के जारी किए गए कैसेट
नैनीताल के संस्कृतिकर्मियों ने अपने जनगीतों को समूचे उत्तराखंड के लोगों तक पहुंचाने के लिए जनगीतों का एक कैसेट भी जारी किया। दिल्ली के प्रसिद्ध साहित्य्कार एवं जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष त्रिलोचन शास्त्री ने इसका विमोचन किया। इन कैसेट को उत्तराखंड के दूर दराज के आंदोलनकारियों को बंटवाया गया। कैसेट में बल्ली सिंह चीमा, निरंजन सुयाल, डॉ. अतुल शर्मा, बृजमोहन माहेश्वर, जहूर आलम के गीतों को जगमोहन जोशी, संगीता मधवाल (अब ढौंडियाल) ने आवाज दी।
चलो की मंजिल दूर नहीं
नैनीताल के रचनाकारों ने उत्तराखंड आंदोलन से उपजी कविताएं -चलो कि मंजिल दूर नहीं, प्रकाशित की। जन संस्कृति मंच द्वारा प्रकाशित इस पुस्तिका को भी गढ़वाल व कुमाऊं के आंदोलनकारियों के बीच एक हथियार की तरह वितरित किया जाने लगा। इस पुस्तिका में तारा दत्त पांडेय, गिर्दा, जसीराम आर्य, भुवन चंद शर्मा, मोहन कुमांऊनी, कुटज भारती, मदन मोहन ढुकलान, भगवती, सुनील कैन्थौला, गिरीश सुंदरियाल, नागेंद्र जगूड़ी, अवधेश, हरजीत, वीणा पाणी जोशी, चंद्र सिंह नेगी, विपिन उनियाल, दिनेश उपाध्याय, भुवन तिवारी, रविंद्र गड़िया, भूपेश पंत, प्रीतम बिष्ट, देवेंद्र मैथानी, राजेन टोडरिया, डा. हरिमोहन, डा. भूपेंद्र, गुणानंद पथिक, महेश पाठक, गोविंद पंत, राजू, रीता उप्रेती, नीरज पंत, कमल जोशी, पीतांबर देवरानी, विश्वनाथ, नरेंद्र सिंह नेगी सहित युगमंच और जसम द्वारा बनाई गई कैसिट ‘कदम मिला के चल’ में संग्रहित गीतों को प्रकाशित किया गया।


कला दर्पण ने तोड़ा पहाड़ के सन्नाटे को
उधर 100 दिनों तक उत्तरकाशी की भी कड़कती ठंड में प्रभातफेरियां निकालने वाली सांस्कृतिक संस्था कला दर्पण की पहल भी सार्थक साबित हुई। संस्था ने जनगीतों के माध्यम से पहाड़ के सन्नाटे को तोड़ा। प्रभातफेरियों के संयोजक सुरक्षा रावत, सुभाष रावत, दिनेश भट्ट, नागेंद्र जगूडी, पुष्पा चौहान, गणेश, सुधा, प्रकाश पुरोहित व राजीव आदि ने आंदोलन में प्रभातफेरी व नुक्कड़ नाटकों में सक्रिय रूप से भाग लिया।
एक महत्वपूर्ण कवि सम्मेलन उत्तरकाशी में उत्तराखंड शोध संस्थान द्वारा आयोजित किया
गया। इसमें उन जनकवियों को आमंत्रित किया गया, जिनके गीत आंदोलनों में गाए जा रहे थे। इसी अवसर पर उत्तराखंड के करीब डेढ़ दर्जन से अधिक प्रमुख कवि लेखकों व संस्कृति कर्मियों ने आंदोलन में सार्थक व स्वतंत्र हस्तक्षेप का निर्णय लेने के लिए उत्तराखंड स्तर पर संस्कृति कर्मियों के एक संयुक्तमोर्चे का निर्माण करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
जगह जगह चला नाटकों और गीतों का दौर
उत्तरकाशी में ही लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने उत्तराखंड आंदोलन को गर्माए रखने के लिए
जनगीतों की कई आडियो कैसिट भी प्रसारित की। इसी समय नई टिहरी में प्रयास संस्था ने नुक्कड़ नाटक व प्रभात फेरी का सिलसिला आरंभ किया। मसूरी की इफ्टा संस्था ने भी नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किए। विकास नगर में प्रभातफेरियों का आयोजन भी शुरू हो गया। सांस्कृतिक आंदोलन के तेज होने पर इस आंदोलन में ऋषिकेश के संस्कृतिकर्मी भी पीछे नहीं रहे। ऋषिकेश महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं की टोली जगह-जगह नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन करने लगी, तो वहीं पर्वतीय जन कल्याण समिति की घटक जीवन जागृति निकेतन के छोटे-छोटे स्कूली बच्चों को लेकर अनिता बहुगुणा ने नया प्रयोग करके नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से स्कूली बच्चों को आंदोलन में उतारा।

ऋषिकेश के गुमानीवाला में युवा छात्र समिति के तहत जितेंद्र भट्ट, नरेंद्र रयाल, ब्रिजेश, आशा नौटियाल, प्रभा नौटियाल, विनिता आदि ने जन गीत का सिलसिला शुरू किया। जेल भरो
अभियान के दौरान इन छात्र-छात्राओं ने ‘तय करो किस ओर हो तुम’ सहित कई जन गीतों को जेल में गाकर आंदोलन से जुड़े लोगों को इस बात के लिए भी सचेत किया कि आंदोलन के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों से सावधान रहें। इस संस्था ने लगातार चल रहे उत्तराखंड आंदोलन के दौरान पोस्टर प्रदर्शनियों का भी आयोजन किया।
ऋषिकेश में आयोजित किए गए कवि सम्मेलन
ऋषिकेश व मुनि की रेती क्षेत्र में क्रेजी फेडरेशन के तहत कवि सम्मेलनों का आयोजन किया गया। उत्तराखंड के संस्कृति की सड़क पर आए। वहीं श्रीनगर में ब्रिजेश भट्ट आदि ने जनगीतों की रचना कर वहीं से प्रकाशित साहित्यिक पुस्तक संभावना में उत्तराखंड से संबंधित जनगीतों को संग्रहित कराया। गोपेश्वर में गढ़वाली नाटक, तथा पौड़ी में प्रभातफेरियां, चमोली व कोटद्वार में सांस्कृतिक कार्यक्रम चलाए गए।
अल्मोड़ा की संस्था जागर सहित पिथौरागढ़, हल्द्वानी, बरेली आदि क्षेत्रों में भी कई सांस्कृतिक संस्थाओं ने जन्म लिया और इन संस्थाओं ने सांस्कृतिक आंदोलन के माध्यम से राज्य आंदोलन में बढ़-चढ़कर भागीदारी निभानी शुरू कर दी। सांस्कृतिक जुलूसों से लोगों का परिचय कराया।


फोटो साभारः अजय गुलाटी

दिल्ली तक पहुंची आंदोलन की लपटें
खटीमा, मसूरी व मुजफ्फरनगर के गोलीकांडों के बाद समुचित उत्तराखंड में तेज हो रहे सांस्कृतिक आंदोलन की लपटें दिल्ली तक पहुंचने लगी। दिल्ली की निशांत नुक्कड़ नाट्य संस्था के कलाकारों ने शमशुल इस्लाम के नेतृत्व में रंगकर्मियों ने दिल्ली सहित उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों में नुक्कड़ नाटक व जनगीत प्रस्तुत करके सांस्कृतिक आंदोलन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की। साथ ही पर्वतीय व मैदानी क्षेत्र को उत्तराखंड के मुद्दे पर एक करने का प्रयास किया।
धाद संस्था ने चलाया लोकतंत्र अभियान
इसके अलावा धाद संस्था ने लोकतंत्र अभियान चलाकर, चिट्ठी संस्था ने अपने चिट्ठी फोल्डर के माध्यम से गढ़वाल और कुमाऊं की जनता को एकजुट करने के संदेश देने शुरू किए। इन संस्थाओं ने अपने अपने मंचों के माध्यम से पोस्टर प्रदर्शनी आयोजित करके महत्वपूर्ण संकलन प्रदर्शित किया।
तल्तीताल चौक पर कविताओं का सिलसिला, लाउडस्पीकर पर बुलेटिन
आंदोलन के दौरान नैनीताल के तत्लीताल चौक पर दिन भर कविताओं का सिलसिला शुरू होने के साथ ही लाउडस्पीकर से समाचार बुलेटिन प्रसारित किए जाने लगे। इस कार्य में राजीव लोचन, शेखर पाठक, गिर्दा आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही। देहरादून की संस्था नंदादेवी कला संगम ने भी आंदोलन के दौरान सांस्कृतिक पहलुओं के माध्यम से आंदोलन को गरमाए रखा। इस संस्था का निर्माण करने वालों में पहली सुपरहिट गढ़वाली फिल्म घरजवैं के नायक बलराज सिंह नेगी भी शामिल थे।
उत्तराखंड आंदोलन में बहुत से रचनाकार ऐसे जुड़े जिनके जनगीत राज्य आंदोलन से पहले भी फैक्ट्री गेटों, धरना प्रदर्शनों में गाए जाते रहे। इनके साथ ही उत्तराखंड में एक नई संस्कृति कर्मियों की जमात भी खड़ी हो गई। इन सभी के आंदोलन में दिए गए योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है।
-भानु बंगाल

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