July 2, 2022

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जानिए देहरादून जिले के जौनसार बाबर का इतिहास, यहां के त्योहार और पर्यटक स्थल

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जौनसार-बाबर देहरादून जिले की चकराता एवं त्यूनी तहसील से संबद्ध प्राकृतिक सीमाओं से घिरा हुआ एक छोटा भौगोलिक क्षेत्र है। क्षेत्र का नाम जौनसार-बाबर होने के पीछे क्षेत्रवासी बतलाते हैं कि गढ़वाल से जमना (यमुना नदी) पार होने के कारण यह क्षेत्र जमना पार कहलाया जाने लगा, जो कालान्तर में जौनसार हो गया। सुदूर उत्तर दिशा में पावर नदी के कारण यह क्षेत्र बावर कहलाया।
भौगोलिक स्थिति
इसके पूर्व में यमुना नदी, उत्तर में उत्तरकाशी जिला व हिमाचल प्रदेश का कुछ क्षेत्र, पश्चिम में
टौंस नदी व दक्षिण में विकासनगर तहसील है। जौनसार-बावर का कुल क्षेत्रफल 1155 वर्ग किलोमीटर है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई हरिपुर कालसी में लगभग 1500 फुट, देवबन व
खड़म्बा में 10,000 फुट तथा तहसील मुख्यालय चकराता में 7000 फुट है। यह एक अनुसूचित जनजाति क्षेत्र है।


धर्मपरायण लोग
यहाँ के निवासी ईमानदार, परिश्रमी व धर्मपरायण होते हैं, वे सादा जीवन व्यतीत करना पसन्द करते हैं। यहाँ के पुरूषों की पोशाक चूड़ीदार पायजामा, खुला कोट व सिर पर ऊनी टोपी होती है। स्त्रियों की पोशाक में लहंगा, घाघरा कुर्ती व सिर पर ढाँटू (एक बड़ा रूमाल) बंधा होता है।


सिरमौर रियासत का अंग था जौनसार
गोरखों के आक्रमण (1803-1815) तक जौनसार बाबर, सिरमौर रियासत का अंग था, परन्तु जब सिरमौर रियासत को गोरखों के विरूद्ध अंग्रेजों की सहायता लेनी पड़ी और मेजर जनरल मार्टिन्डेल व मेजर लूडलों के नेतृत्व में अंग्रेजों ने नाहन को गोरखों से मुक्त कराया तो युद्ध के खर्चे के रूप में नाहन की तत्कालीन महारानी गुलेरी ने जौनसार-बाबर को तब तक अंग्रेजों के पास गिरवी रख दिया। जब तक कि हर्जाने की धनराशि अंग्रेजों को लौटा न दी जाये। सन 1841-42 में जब महाराजा नाहन ने हर्जाने की धनराशि अंग्रेजों को लौटानी चाही तो उन्होंने लेने से इन्कार कर दिया, क्योंकि अंग्रेज 1829 में इस क्षेत्र को देहरादून जिले से मिला चुके थे।
पहला अंग्रेस शासक था कैप्टन ब्रिंच
अंग्रेजों ने 1815 से 1947 तक इस क्षेत्र में सदर सयाणों के माध्यम से शासन किया। इसके अतिरिक्त यहां चार चौंतरू भी थे। कैप्टन ब्रिंच यहां का पहला अंग्रेज शासक था। शासन प्रशासन के दो मुख्य आधार (दस्तूर उल-अमल) व (वाजिब उल अर्ज) थे। दस्तूर उल अमल का संचालन रॉंस अंग्रेज अधिकारी ने 1851 में स्थानीय प्रचलित रीति रिवाजों व प्रथाओं के आधार पर किया। जिसमें राबर्टसन ने कुछ परिवर्तन कर वाजिब उल अर्ज में अलग अलग खतों के हक हकूक का वर्णन किया।
जौनसार बाबर में स्याणाचारी व्यवस्था सन 1953 के प्रारंभ तक चलती रही। सन 1953 में उत्तर प्रदेश पंचायत राज एक्ट 1947, इस क्षेत्र में भी लागू हुआ। साथ ही माल गुजारी वसूल करने का कार्य भी सदर सयाणों के स्थान पर अमीन व पटवारियों को दे दिया गया। जौनसार बाबर में इस समय कुल 39 खत व 358 राजस्व गांव हैं। सन 1829 में जब इस क्षेत्र को जनपद देहरादून में सम्मिलित किया गया था उस समय इसकी जनसंख्या लगभग 28000 थी। अब यह एक लाख से अधिक है।
परंपरागत त्योहार
इस क्षेत्र के मुख्य त्यौहारों में सर्वप्रथम दिवाली का त्योहार होता है। यह देश की मनायी
जाने वाली दीपावली के ठीक एक माह पश्चात होती है। अमावस्या की रात्रि को गाँव के समस्त
निवासी पंचायती आँगन में एकत्रित होकर अग्नि के चारों ओर देवता महासू एवं चालदा के
साथ-साथ पाण्डवों की बहादुरी के गीत गाते हैं। रात्रि का पहर समाप्त होते ही स्थानीय बाजगी
प्रभात होने के उद्देश्य से ‘नोमती’ बाजा बजाता है। इसकी आवाज पर समस्त गाँववासी भीमल
वृक्ष की सूखी लकड़ी को जलाये हुए पंचायती आँगन से गीत गाते हुए कुछ दूर तक जाकर वापिस आते हैं। ऐसा करने के पीछे एक ही उद्देश्य होता है कि ग्रामीणों ने अमावस्या की काली रात को भगा दिया है।


अगले दिन गाँव के बाजगी, अपने घर में गेहूँ-जी बोकर उगाई गई हरियाली लेकर आँगन में उतरते हैं तथा सर्वप्रथम उसे कुलदेवता के मंदिर में चढ़ाकर बाद में हर नर-नारी को बाँट देते हैं। प्रत्येक नर-नारी इस हरियाली को कान के ऊपर रखकर गीत गाते हैं। दिन के आरम्भ होते ही घी में पकाई गयी रोटी व चिऊड़ा एक दूसरे को खिलाते हैं। इस तरह का यह त्यौहार एक सप्ताह तक चलता है।
बिस्सू
बैसाखी से चार दिन तक बिस्सू का त्योहार व मेला होता है। इस त्योहार पर प्रत्येक ग्रामवासी घर की लिपाई-पुताई कर मौसम के फूल विशेषकर बुरांस से घर-आँगन को सजाता है। इस अवसर पर चावल को पीस, पापड़ की तरह थाली पर फैलाकर एक स्वादिष्ट व्यंजन बनाते हैं। जिसे जौनसार में “लाडू” तथा बाबर में “शाकूरिया कहते हैं। मीठे व नमकीन स्वाद लिये हुए तथा तेल में तले हुए यह लाडू सभी आगन्तुकों को दिए जाते हैं। त्योहार के अन्तिम दिन थाना डाँडा, चौली, चौरानी, गिरटीथात, लाखामंडल, कोटि व क्वानू आदि में मेले लगते हैं। लोकनृत्य व
गीतों के अतिरिक्त इन मेलों में “टोकड़” (धनुषवाण) का प्रदर्शन विशेष आकर्षण का केन्द्र रहता है।
नुणाई
यह त्यौहार श्रावण मास में मेले के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भेड़-बकरियों को ऊँची घाटियों से लाकर उनकी ऊन उतारी जाती है तथा लोक नृत्य व गीतों के साथ-साथ चरवाहों का भी सम्मान किया जाता है। इस त्योहार में आटे की मीठी रोटी बनाई जाती है,वह इस प्रकार बनाई जाती है कि महीनों तक खराब नहीं होती।
जागड़ा
यह उत्सव भादो मास में मुख्य रूप से हनोल, बिसोई, गवेला, थैना आदि गाँव में होता है। इस उत्सव में देवता की मूर्ति को स्नान कराया जाता है और बकरे की बलि देकर माँस व भोजन मेहमानों को परोसा जाता है। फिर रात्रि जागरण में महासू देवता की स्तुति के लोकगीत गाये जाते हैं। यह उत्सव महासू देवता के आगमन दिवस के रूप में मनाया जाता है।
पाँचों
यह त्यौहार दशहरे से पूर्व सप्तमी के दिन होता है। अष्टमी को घर का मुखिया उपवास रखता है तथा स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर आगन्तुक की मेहमान नवाजी करता है।
माघ
यह त्यौहार आपसी सौहार्द व मिलन का प्रतीक है। पूरे एक माह तक अपने गाँव व घरों में ही इसे मनाया जाता है। पौष-माघ की संक्रान्ति से दो दिन पूर्व गाँववासी अपने पाले हुए बकरे को पंचायती आंगन में लाकर काटते हैं तथा एक-दूसरे को बकरे के कटे हुए भागों के टुकड़े बनाकर उसे घर के अन्दर रस्सियों में टाँग देते हैं। फिर आरम्भ होता है एक-दूसरे को अपने घर बुलाकर बकरे के माँस के साथ भोजन खिलाने का सिलसिला। भोजन के पश्चात्रात को घर में ही नृत्य होता है। इस त्यौहार में अगर कोई गाँववासी भाग नहीं लेता तो रिश्तेदारी तक समाप्त कर दी जाती है। काटे गये बकरे का मांस, मौसम ठंडा होने के कारण खराब नहीं होता, अत: कई महीनों तक उसे भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
पर्यटक स्थल चकराता
यह देहरादून से 96 किलोमीटर की दूरी पर 7000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। चकराता के पास बावड़ी नामक स्थान पर शैव एवं शाक्तों का चक्र, पूजा का स्थान था। ऋगवेद आराध्य चक्रम्मा देवी का यह स्थान चक्रथान कहलाता था, जो अंग्रेजों के समय में चक्रथा के नाम से प्रचलित हुआ। अंग्रेजों द्वारा चकराता में छावनी के निर्माण के दौरान यह स्थान मलवे से भर गया था।

1966-67 में श्यामसुन्दर नामक स्थानीय व्यक्ति ने इसका जीर्णोद्वार किया, तब से इस क्षेत्र का विकास आरम्भ हुआ। आज यहाँ गृह मंत्रालय के अधीनस्थ ‘एस्टाब्लिसमेंट 22’ कार्यरत है। इस अर्धसैनिक संस्था के कार्यरत रहने से यह विदेशी पर्यटकों के लिए पूर्णतया निषिद्ध स्थान हैं। पर्यटकों की आवाजाही को देखते हुए नये चकराता से मात्र चार किलोमीटर की दूरी पर नये चकराता निर्माण की प्रक्रिया स्वरूप लेने लगी है।
देवबन
यह चकराता से 11 किलोमीटर की दूरी पर तथा समुद्र तट से 10000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहाँ से हिमालय की हिमाच्छादित चोटियाँ दृष्टिगोचर होती है।
हनोल
यह जौनसार-बाबर के अन्तिम छोर में चकराता से 110 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित धार्मिक स्थल है। समूचे जौनसार-बावर व हिमाचल प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों का यहाँ आराध्य देव महासू देवता का मन्दिर है।
मुंडाली
चकराता से बीस किलोमीटर दूर समुद्र तल से 9000 फीट की ऊँचाई पर प्रकृति के मनोरम दृश्यों से भरपूर स्थली है। यहाँ भी औली की भाँति स्कीइंग की प्रबल सम्भवनायें हैं।
मत्स्य राज्य की राजधानी था वैराटगढ़
यह समुद्री सतह से 6000 फीट की ऊँचाई तथा चकराता से लगभग बीस किलोमीटर की दूरी पर है। यहाँ किलेनुमा खण्डहर तथा कुंए के अवशेष आज भी दिखते हैं। कुआँ पुराने प्रकार की बारीक ईंटों और सुरखी का बना है। पहाड़ी चट्टान पर निर्मित यह कुआँ किस विधि से खोदा गया होगा, खोज का विषय है। बताया गया है कि यह कुऑं यमुना नदी को सतह तक अर्थात एक हजार फीट गहरा खुदा था। जब वैराटगढ़ खंडहर में परिवर्तित गया तो इस कुएं को स्थानीय लोगों ने पशुओं के गिरने के भय से पत्थर आदि से भर दिया। वैराट गड़ मत्स्य राज्य की राजधानी था।
गढ़ की रक्षा के लिए थी गहरी खाइयां
इस गढ़ की रक्षा के लिए गहरी खाइयां चारों ओर खोदी गयीं थीं। खाइयों के चिह्न आज भी विद्यमान हैं। किले के दोनों ओर सुरंग के रूप में रास्ता कुछ वर्ष पूर्व तक था। जो सड़क बनने से बंद हो गया। मुगलकाल में यहां कुछ समय तक शामुशाह का भी राज्य रहा, जो जनता को पीड़ित रखता था। गोरखों के आक्रमण के समय गोरखा सेना ने भी यहाँ कुछ दिनों तक अपना अस्थायी शिविर बनाया। यहाँ की जनता ने संगठित रूप से गुरिल्ला आक्रमण कर उन्हें यहाँ से भगा दिया था।


टाइगर फाल
चकराता से 17 किलोमीटर दूर लाखामंडल मार्ग पर स्थित इस झरने की ऊँचाई लगभग सौ मीटर मानी जाती है। इसको गिरने की आवाज शेर की दहाड़ की तरह प्रतिध्वनित होती है, इसलिए इसका नाम टाइगर फाल रखा गया। झरने को दूर से नहीं देखा जा सकता, इसलिए इसे देखने के लिए निकट ही जाना पड़ता है, तभी इसकी आलौकिकता के दर्शन होते हैं।
कोटीकनासर
चकराता से 31 किलोमीटर दूर समुद्र तट मे 8500 फीट को अचाई पर स्थित कोटी कनासर प्रकृति की अनुपम छटा लिये हुए एक दर्शनीय स्थल है। आकाश से बातें करते देवदार
के वृक्षों का यह प्रांगण इतना रमणीक है कि पर्यटक इनको देखकर कल्पना लोक में खो जाता
है।


लाखामंडल
जौनसार बावर के उत्तरी-पूर्वी कोने में, यमुना की पर्वतीय उपत्यका में यमुना और मोरदगाड़ के संगम पर लाखामंडल गाँव है, जो प्राचीन लाखेश्वर मन्दिर और अपनी मूर्ति वैभव के लिए प्रसिद्ध है। लाखामंडल चकराता में 40 किलोमीटर और मसूरी से 80 किलोमीटर की दूरी पर लगभग 3500 फीट को ऊँचाई पर स्थित एक गाँव है। लाखामंडल की प्राचीनता को स्थानीय लोग कौरव-पाण्डव संवाद से जोड़ते हुए, यहाँ कौरवों द्वारा पांडवों को समाप्त करने के लिए लाक्षागृह निर्माण की कथा से संबंधित बतलाते हैं।
लाखामंडल के नाम की यह है वास्तविकता
वास्तविकता यह है कि छागलेश प्रशस्ति के अनुसार आठवीं शताब्दी के लगभग यहाँ सैहपुर के यादव राजवंश की राजकुमारी ईश्वरा ने कई वर्ष तक शासन किया। ईश्वरा ने अपने पति, जालंधर नरेश के पुत्र चन्द्रगुप्त के हाथी से गिरकर स्वर्ग सिधारने पर उसकी स्मृति में लाखेश्वर मंदिर निर्माण कराया। लाखेश्वर शब्द से लाखा लिया गया तथा कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार वह प्रांत जो कर आदायगी किया करते थे, उन्हें उस काल में मंडल की संज्ञा से मंडित किया जाता था। अत: इस तरह क्षेत्र का नाम लाखामंडल पड़ा।


छत्र शैली में निर्मित है लाखेस्वर मंदिर
प्राचीन लाखेश्वर मंदिर छत्र शैली में निर्मित है, इसका वाह्य भाग 18, अंतभांग पांच फुट वर्गाकार है। बाहर भित्ति भाग में रथिकाओं में गंगा, यमुना, महिषासुर मर्दिनी, कुबेर इत्यादि की
आकृतियाँ उकेरित हैं। हथिकाओं के सुन्दर तोरण अलंकरण में कार्तिकेय, गणेश और कुबेर की मूर्तियाँ है। मंदिर के आमलक को ढकने के लिए चौकोर, स्कन्द के ऊपर काष्ठ की त्रिछत्र शिरोवष्ठिनी है, जो उत्तराखण्ड के अन्य प्रसिद्ध मंदिरों की कत्यूरी वैष्ठिनी से मिलती-जुलती है। मंदिर के प्रागंण में एक विशाल चबूतरे पर वेदी के मध्य एक विशालकाय शिवलिंग खुले आकाश के नीचे स्थापित है। चबूतरे के पृष्ठभाग में दो आदमकद (5’10”) श्याम प्रस्तर में निर्मित मानव मूर्तियाँ द्वारपाल की मुद्रा में सैकड़ों वर्ष से खड़ी है।
चमकदार शिवलिंग में पानी डालने पर दिखता है अपना प्रतिबिंब
इस मन्दिर से थोड़ी दूर पर एक और विशाल काले पत्थर का चमकदार शिवलिंग है। ऐसा सुन्दर विलक्षण शिवलिंग समूचे उत्तराखंड में देखने को नहीं मिलता है। यह काले पत्थर का शिवलिंग इतना चिकना है कि थोड़ा-सा पानी डालने पर पर्यटक स्वयं अपना प्रतिबिंब देख सकते हैं। मंदिर के पुजारी इस शिवलिंग पर जल डालकर प्रत्येक पर्यटक को दिखाते हैं।


लेखक का परिचय
लेखक देवकी नंदन पांडे जाने माने इतिहासकार हैं। वह देहरादून में टैगोर कालोनी में रहते हैं। उनकी इतिहास से संबंधित जानकारी की करीब 17 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। मूल रूप से कुमाऊं के निवासी पांडे लंबे समय से देहरादून में रह रहे हैं।

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