June 30, 2022

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पति की लंबी आयु की कामना को सुहागिनों ने रखा करवाचौथ का व्रत, चांद के दीदार के साथ खोलेंगी व्रत

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पति की लंबी आयु की कामना को लेकर सुहागिनों ने आज करवाचौथ का व्रत रखा, यह व्रत शाम को चांद के दीदार के साथ खोला जाएगा। करवाचौथ को लेकर पिछले कुछ दिनों में बाजारों में भीड़ रही। खासकर मेहंदी लगाने वालों के स्टाल पर तो महिलाओं को घंटों इंतजार करना पड़ा।
बाजारों में रही भीड़
महिलाओं में सबसे ज्यादा क्रेज लोटस चेक, हाफ चेक, हाफ लोटस, एचडी डिजाइन की मेहंदी को लेकर रहा। पलटन बाजार में तो रात 12 बजे तक एलईडी की रोशनी में मेहंदी लगाई गई। बाजार में मेहंदी का स्टॉल लगाने वालों ने बताया कि 300 से 2000 रुपये तक के मेहंदी के डिजाइन उपलब्ध हैं। अधिकांश महिलाओं ने मेहंदी लगवाने के लिए 1000 से 1500 रुपये तक खर्च किए। वहीं बाजारों में खरीदादारों की भी अच्छी भीड़ रही।


सुहागिनों ने रखा व्रत
हिंदू धर्म में करवा चौथ के त्योहार का विशेष महत्व होता है। सुहागिनें पति की लंबी आयु की कामना के लिए व्रत रखती हैं। कई सुहागिन तो निर्जल व्रत रखती हैं। आज सुबह सुबह 03:24 मिनट से चतुर्थी तिथि आरंभ हो गई। साथ ही महिलाओं ने व्रत रखा। यहां देहरादून के डॉ. आचार्य सुशांत राज करवाचौथ के पूजन की विधि बता रहे हैं।
चतुर्थी तिथि- 4 नवंबर को सुबह 03:24 मिनट से प्रारंभ हो गई, जो 5 नवंबर को सुबह 05:14 मिनट तक है।
करवा चौथ पूजा मुहूर्त- शाम 5 बजकर 29 मिनट से शाम 6 बजकर 48 मिनट तक।
चंद्रोदय- रात 8 बजकर 16 मिनट पर।
चांद निकलने तक रखा जाता है व्रत
करवा चौथ का व्रत सूर्योदय से चांद निकलने तक रखा जाता है। चांद को अर्घ्य देने और दर्शन करने के बाद ही व्रत को खोलने का नियम है। चंद्रोदय से कुछ समय पहले शिव-पार्वती और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। चांद निकलने के बाद महिलाएं पति को छलनी में दीपक रखकर देखती हैं और पति के हाथों जल पीकर उपवास खोलती हैं।


करवा चौथ में चंद्रमा की पूजा का महत्व
शास्त्रों में चंद्रमा को आयु, सुख और शांति का कारक माना जाता है। मान्यता है कि चंद्रमा की पूजा से वैवाहिक जीवन सुखी होती है और पति की आयु लंबी होती है।
12 अथवा 16 वर्ष के बाद किया जा सकता है उद्यापन
यह व्रत 12 वर्ष तक अथवा 16 वर्ष तक लगातार हर वर्ष किया जाता है। अवधि पूरी होने के पश्चात इस व्रत का उद्यापन (उपसंहार) किया जाता है। जो सुहागिन स्त्रियां आजीवन रखना चाहें वे जीवनभर इस व्रत को कर सकती हैं। इस व्रत के समान सौभाग्यदायक व्रत अन्य कोई दूसरा नहीं है। अतः सुहागिन स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षार्थ इस व्रत का सतत पालन करें।
व्रत की विधि
कार्तिक कृष्ण पक्ष की चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी अर्थात उस चतुर्थी की रात्रि को जिसमें चंद्रमा दिखाई देने वाला है, उस दिन प्रातः स्नान करके अपने सुहाग (पति) की आयु, आरोग्य, सौभाग्य का संकल्प लेकर दिनभर निराहार रहें।
पूजन की तैयारी
उस दिन भगवान शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा का पूजन करें। पूजन करने के लिए बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी बनाकर उपरोक्त वर्णित सभी देवों को स्थापित करें।
नैवेद्य : शुद्ध घी में आटे को सेंककर उसमें शक्कर अथवा खांड मिलाकर मोदक (लड्डू) नैवेद्य हेतु बनाएँ।
करवाः काली मिट्टी में शक्कर की चासनी मिलाकर उस मिट्टी से तैयार किए गए मिट्टी के करवे अथवा तांबे के बने हुए करवे। 10 अथवा 13 करवे अपनी सामर्थ्य अनुसार रखें।


पूजन विधि
बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी पर शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा की स्थापना करें। मूर्ति के अभाव में सुपारी पर नाड़ा बाँधकर देवता की भावना करके स्थापित करें। पश्चात यथाशक्ति देवों का पूजन करें।
पूजन के लिए निम्न मंत्र
बोलें -‘ॐ शिवायै नमः’ से पार्वती का, ‘ॐ नमः शिवाय’ से शिव का, ‘ॐ षण्मुखाय नमः’ से स्वामी कार्तिकेय का, ‘ॐ गणेशाय नमः’ से गणेश का तथा ‘ॐ सोमाय नमः’ से चंद्रमा का पूजन करें।
ऐसे करें पूजन
करवों में लड्डू का नैवेद्य रखकर नैवेद्य अर्पित करें। एक लोटा, एक वस्त्र व एक विशेष करवा दक्षिणा के रूप में अर्पित कर पूजन समापन करें। करवा चौथ व्रत की कथा पढ़ें अथवा सुनें।
सायंकाल चंद्रमा के उदित हो जाने पर चंद्रमा का पूजन कर अर्घ्य प्रदान करें। इसके पश्चात ब्राह्मण, सुहागिन स्त्रियों व पति के माता-पिता को भोजन कराएँ। भोजन के पश्चात ब्राह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा दें।
पति की माता (अर्थात अपनी सासूजी) को उपरोक्त रूप से अर्पित एक लोटा, वस्त्र व विशेष करवा भेंट कर आशीर्वाद लें। यदि वे जीवित न हों तो उनके तुल्य किसी अन्य स्त्री को भेंट करें। इसके पश्चात स्वयं व परिवार के अन्य सदस्य भोजन करें।


आचार्य का परिचय
नाम डॉ. आचार्य सुशांत राज
इंद्रेश्वर शिव मंदिर व नवग्रह शिव मंदिर
डांडी गढ़ी कैंट, निकट पोस्ट आफिस, देहरादून, उत्तराखंड।

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