June 29, 2022

Lok Saakshya

Jan Jan Ki Awaj

देहरादून आएं तो इन पर्यटन स्थलों और मंदिरों को देखना न भूलें, जानिए क्या है यहां का इतिहास

1 min read

देहरादून में पर्यटक स्थलों की कमी नहीं है। ज्यादातर पर्यटक स्थल नदियों के किनारे स्थापित हैं। यहां हर लाखों में लोग पहुंचते हैं। साथ ही यहां प्राचीन मंदिर भी हैं। इतिहासकार इन पर्यटक स्थलों के संबंध में विस्तार से बता रहे हैं। यदि आप देहरादून आएं तो इन स्थानों का दीदार करना न भूलना। नहीं तो आप कुदरत के अद्भुत नजारों को देखने से वंचित रह जाओगे।


राबर्स केव
नगर से आठ किलोमीटर दूर छावनी क्षेत्र में अनारवाला के समीप यह एक मनोरम एवं वातावरण की उष्णता से राहत दिलाने वाला स्थल है। एक संकरी गुफा जो कि ऊपर से खुली हुई है। उसमें स्त्रोत का पानी बहकर आता है। कहा जाता है कि गढ़वाल शासक के काल में मैदानी क्षेत्रों से आये डाकू, लूटपाट के पश्चात् यहीं छिप जाया करते थे। इसलिए इसका नाम अंग्रेजों के काल में राबर्स केव पड़ गया। दो पहाड़ी के बीच के संकरे स्थान पर जब कुछ आगे जाते हैं तो खुली पहाड़ी व चट्टान आते हैं। वहां झरने के रूप में निर्मल पानी बहता रहता है। यहां लोग जल क्रीड़ा के लिए पहुंचते हैं।
संतला देवी, पहुंचने के लिए एक घंटे की खड़ी चढ़ाई
नगर से बीस किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा में संतला देवी मन्दिर स्थित है। यह मन्दिर एक ऊंचे टीले पर निर्मित है। मोटर मार्ग से मन्दिर तक का पैदल मार्ग, सीधी चढ़ाई के कारण एक घंटे से अधिक का समय मन्दिर पहुंचने में लगता है।
मंदिर को लेकर कथा
इस मन्दिर के विषय में एक सत्य कथा इस प्रकार है। संतला देवी एक ठकुराई राजघराने को सुन्दर कन्या थी। जो अपने भाई संतोर सिंह के साथ पहाड़ी टीले पर बने किले में रहती थी। दोनों भाई-बहिन में ईश्वर के प्रति भक्ति भावना व मानव कल्याण के लिए श्रद्धा कूट-कूट कर भरी हुई थी। संतला देवी बाल्यावस्था से ही देवी का सारस्वत स्वरूप लिए हुए थी। जब औरंगजेब बादशाह ने दिल्ली की सल्तनत संभाली तो बादशाह के भाई ने भागकर गढ़वाल राज्य में शरण ले ली थी। उसको ढूंढने के लिए औरंगजेब ने सेना भेजी। मुगल सेना ने सहारनपुर बेहट मार्ग से दून क्षेत्र में प्रवेश किया तथा बादशाही बाग में डेरा डाला। फिर बादशाह के भाई को खोजने निकले। अनायास सेना की दृष्टि संतला देवी पर पड़ी, जो उनके लिए किसी रूप की सम्राज्ञी से कम न थी।


मुगल सेना ने संतला देवी को पकड़ने के लिए पीछा किया, लेकिन तब तक वह किले में प्रवेश कर चुकी थी। किला अधिक ऊंचाई पर होने के कारण मुगल सेना ने तोप के गोलों से किले को ध्वस्त कर दिया तथा संतला देवी के भाई संतोर सिंह को गिरतार कर लिया। संतला देवी समझ चुकी थी कि मुगल सेना से वह बच न पायेगी। अत: उसने वहीं वृक्ष के नीचे ईश्वर का ध्यान लगाया। जैसे ही मुगल सैनिकों ने उसे पकड़ना चाहा। आकाश से इतना भयानक वज्रपात हुआ कि मुगल सेना के कुछ सिपहसलार तो अपनी आंखें खो बैठे तथा शेष भाग खड़े हुए। उसी ब्रजपात के समय दोनो भाई-बहिन भी शिला के रूप में परिवर्तित हो गये। अन्ततः मुगल सेना को खाली हाथ वापिस लौटना पड़ा। संतला देवी को दुर्गा का प्रतीक मानकर ग्रामवासियों ने उसकी प्रतिमा उसके भाई की मूर्ति के साथ प्रतिष्ठित कर दी। तब से ही इस मन्दिर की मान्यता इतनी बढ़ गई है कि दूसरे जिलों से भी लोग अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु यहां पहुंचने लगे हैं।
भवन श्री कालिका मन्दिर
कालिका भवन अपने आंचल में अनेक ऐतिहासिक तथ्यों को समेटे हुए है। देहरादून के लोकप्रिय उत्सव-मेलों में कालिका भवन में होने वाला ध्वजारोहण पर्व भी एक है। प्रतिवर्ष रामनवमी के दिन यहां ध्वजारोहण होता है। संस्था के परमाध्यक्ष बालयोगी सर्वदास जी महाराज (दिवंगत) की गिनती देश के उपस्थित विद्वान साधु-संतों में की जाती रही है। ध्वज स्तम्भ की परम्परा के बारे में कथन है कि वैदिक काल में आर्य जाति यहां प्रधान धर्म का पालन करती थी। यज्ञ के समय एक स्तम्भ स्थापित किया जाता था। संस्कृति के बदलते परिवेश के साथ वैदिक कालीन अन्य स्थापत्य के साथ-साथ यज्ञ स्तम्भ ने भी स्थायी ध्वज स्तम्भ का स्वरूप ले लिया।


पर्यावरण संरक्षण को किया अष्ट धातु का स्तंभ स्थापित
कालिका मन्दिर, श्रद्धालुओं की श्रद्धा एवं भक्ति से आज यह मात्र आध्यात्म केन्द्र ही नहीं अपितु मानव समाज की सेवा एवं कल्याण का केन्द्र भी बन चुका है। प्रत्येक वर्ष वृक्ष को काटने तथा उसे ध्वज स्तम्भ के रूप में स्थापित करने को सर्वदास जी महाराज ने इसे वृक्ष के प्रति मानव का अपराध माना। परिणामत: अष्ट धातु के कई टन वजनी कीर्ति स्तम्भ की स्थापना की गई। लगभग 70 फुट ऊंचे और चार टन वजनी यह अष्ट धातु का कीर्ति स्तम्भ प्लेटिनिम, सोना, चांदी, तांबा, सीसा, पारा, जस्ता व लोहे के मिश्रण से बना है। अष्ट धातु का इतना विशाल कीर्ति
स्तम्भ समूचे देश में पहला है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यह कीर्ति स्तम्भ साधारण नहीं है, अपितु ऊर्जा का प्रतीक है। इस स्तम्भ से परिवर्तित होने वाली किरणों का प्रभाव समूचे वातावरण को सुरक्षा का कवच प्रदान करता है।
डाटवाली देवी
नगर से लगभग 13 किलोमीटर देहरादून-सहारनपुर मोटर मार्ग पर स्थित डाटवाली
के नाम से प्रसिद्ध मन्दिर एक धार्मिक आस्था का प्रतीक है। यह मन्दिर शिवालिक पर्वत श्रृंखला की पहाड़ी पर स्थित है। स्थानीय व पर्यटकगण सभी अपनी सकुशलता एवं कार्यसिद्धि हेतु इस मन्दिर में बड़ी ही भक्ति भाव से आते हैं। प्रारम्भ में इस मन्दिर को घाटावाली माता
के नाम से जाना जाता था। बाद में सुरंग निर्माण के बाद डाटवाली के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हुई है। घाटा स्थानीय भाषा में जंगलों में छिपने हेतु बनाये गये स्थान को कहते हैं। मन्दिर के चर्चित होने के बारे में रोचक विवरण है।


नेपाल सरकार के सेनापति बलभद्र थापा ने की थी स्थापना
जब यह सम्पूर्ण क्षेत्र सघन वनाच्छादित था तथा कोई मोटर मार्ग देहरादून-सहारनपुर के मध्य नहीं था, तब सन् 1804 में नेपाल सरकार के सेनापति बलभद्र थापा ने देहरादून प्रवेश करने से पूर्व यहां देवी की प्रतिमा स्थापित कर पूजा अर्चना की तथा प्राण प्रतिष्ठा के बाद उस मन्दिर की देखरेख का दायित्व नेपाल सेना में सेवारत शूरवीर सिंह गोस्वामी को सौंप दिया। सन 1815 में जब अंग्रेज अधिकारी कौटले. ब्रिटिश सेना के आवागमन हेतु इस स्थान पर सुरंग का निर्माण करवा रहा था तो उसमें व्यवधान पड़ने लगा। जितनी सुरंग बनायी जाती थी उतनी ही अगले दिन मिट्टी से भर जाती थी। कौटले ने हताश होकर हिन्दू पण्डित से कार्य के अवरोध आने का कारण बताने को कहा। पंडित ने अपने अनुष्ठान से देवी माँ का आहवान कर बताया कि जंगल में अमुक स्थान पर एक मूर्ति दबी पड़ी है, उसको निकालकर प्राण प्रतिष्ठा करने पर ही सुरंग का निर्माण सम्भव पायेगा। कौटले ने बताई गयी विधि अनुसार मूर्ति स्थापित करवाई, तभी सुरंग का निर्माण सम्भव हो पाया। यही मन्दिर कालान्तर में भद्रकाली के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
चण्डी देवी
देहरादून-मसूरी के पुराने मोटर मार्ग राजपुर में चण्डी देवी का मन्दिर स्थित है। यहां प्रतिवर्ष मेले का आयोजन किया जाता है। यह स्थान नगर से 11 किलोमीटर की दूरी पर है।


मालसी डीयर पार्क
देहरादून-मसूरी मोटर मार्ग पर डायवर्जन रोड के किनारे वन विभाग द्वारा संचालित वन्य प्राणी विहार है। यहां सभी प्रकार के वन्य पशु-पक्षी विद्यमान हैं। शिवालिक पर्वत श्रृंखला के ऊपर तथा मसूरी की तलहटी में स्थित यह एक सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर स्थली है। पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र होने के कारण यहां जलपान व बालवाटिका भी निर्मित की गयी है।


माल देवता
मसूरी पर्वत श्रृखंला की तलहटी में पहाड़ी पर स्थित यह स्थान प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है। रायपुर से चार किलोमीटर तथा नगर से मोटर मार्ग द्वारा दस किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। प्राकृतिक जल स्त्रोत होने के कारण यह पर्यटकों के लिये दर्शनीय स्थल है।


लक्ष्मण सिद्ध मंदिर
देहरादून-ऋषिकेश मोटर मार्ग पर नगर से ग्यारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सघन वन के मध्य या स्वामी लक्ष्मण की समाधि है। इस स्थल की मान्यता इतनी है कि प्रत्येक रविवार को यहां एकत्रित मानव समूह एक विशाल मेले का स्वरूप देते हैं।
कालू सिद्ध मंदिर
सौंग नदी के तट पर प्राकृतिक वन सम्पदा के मध्य स्थित मन्दिर, लच्छीवाला पर्यटन स्थल से मात्र दो किलोमीटर दूर नदी के दूसरे छोर पर है। पुराणों में उल्लेखित दत्तात्रेय पि के 84 शिष्यों में से चार शिष्य (सिद्ध) इन घाटी में आकर बस गये। इनमें से ही एक कालू सिद्ध, श्रद्धालुओं की सर्व मनोकामना पूर्ण करने के कारण देहरादून में प्रसिद्ध है। शिव रूप प्रसिद्ध कालूसिद्ध बाबा का प्राचीन मन्दिर, देहरादून-ऋषिकेश मार्ग के मध्य स्थित भानियावाला से चार किलोमीटर उत्तर दिशा में कालूवाला ग्राम में स्थित है। अन्य तीन सिद्ध- दून घाटी में ही लक्ष्मण सिद्ध, मानक सिद्ध, मांडू सिद्ध के नाम से प्रसिद्ध है, जो क्रमश: हर्रावाला, हुड़ी गांव (माजरा-शिमला रोड) तथा नन्दा की चौकी के पास स्थित है।
सिद्ध मंदिरों की मान्यता
सघन वन के एक छोर पर दस-पन्द्रह फीट ऊंचे टीले पर स्थित बाबा के मन्दिर में अधिकांश श्रद्धालु, पुत्र प्राप्ति एवं व्यसन की लत से छुटकारा पाने की मनोकामना लेकर सिद्धों के प्रसिद्ध दिन रविवार को आते हैं और गुड़, बताशे, दूध, बेलपत्र, पुष्पादि चढ़ाकर बाबा की पूजा अर्चना करते हैं। मन्दिर में स्थित लिंग को स्थापना पन्द्रहवीं सदी के आसपास मानी जाती है। यह लिंग खुले आकाश के नीचे है, अर्थात ऊपर कोई छत नही है।

स्थानीय लोगों का मानना है कि बाबा, इस स्थान पर छत तथा धर्मशाला नहीं बनने देते। जब कभी किसी श्रद्धालु ने मन्दिर के लिए भवन निर्माण सामग्री यहां पहुंचाने की इच्छा संजोई तो वह अकस्मात ही किसी आपदा के कारण सामग्री मन्दिर तक नहीं पहुंचा सके। किसी तरह सामग्री पहुंचा भी दी गयी और निर्माण कार्य आरम्भ कर भी दिया गया तो अगले ही दिन निर्माण धराशायी हो जाता है। ऐसा एक बार नहीं कई बार हो चुका है। मन्दिर के पुजारी का कहना है कि मोतीचूर तथा डूंगाबाड़ा (हल्द्वानी) के समीप भी बाबा के मन्दिर हैं, परन्तु बाबा का पूर्ण स्वरूप यही है। इसी स्थान पर बाबा ने सिद्धि प्राप्त की थी।
देवधार पर्वत
नगर से 15 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में द्वारा ग्राम के सन्निकट देवधार पर्वत पर कौरव-पाण्डव के गुरू द्रोणाचार्य ने द्वापर युग में तपस्या की थी, यह ऐतिहासिक एवं पौराणिक सत्य है। यहां पर नवनिर्मित द्रोणाचार्य आश्रम है।


लच्छीवाला
देहरादून से 19 किलोमीटर दूर देहरादून-डोईवाला मार्ग के लगभग समाप्ति पर लच्छीवाला स्थित है। यहां वन विभाग द्वारा निर्मित रमणीक पिकनिक स्थल, पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है। वन विभाग की देखरेख में यह स्थल हरे-भरे सागौन के वृक्षों के मध्य शीतल स्वच्छ बहते जल के लिए ख्याति प्राप्त है। यहां वर्ष भर पर्यटक व स्थानीय लोगों का आवागमन बना रहता है। मौसम की उष्णता से राहत दिलाने के साथ-साथ बच्चों के लिए हाथी की सवारी व मनोरंजन पार्क भी है।
आसन बैराज, पक्षियों का कलरव मोह लेता है मन
देहरादून मुख्यालय से 40 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित आसन बैराज मानव निर्मित झील है। यह झील, दालीपुर पावर हाउस के लिए जल का भण्डारण क्षेत्र है। शीत ऋतु के आगमन के साथ ही आसन बैराज में प्रवासी पक्षियों का आना-जाना शुरू हो जाता है। जनवरी माह तक यहां प्रवासी पक्षियों की बड़ी संख्या पहुंच जाती है। यहां पहुंचने वाले रंग-बिरंगे पक्षियों के साथ ही विदेशी पर्यटक व पक्षी विशेषज्ञों की आवाजाही भी बढ़ जाती है।

मध्य एशिया और साइबेरिया से यहां पहुंचने वाले पक्षियों की प्रजातियां दो सौ से अधिक होती हैं। प्रवासी पक्षियों में सबसे अधिक संख्या में यहां आने वाली रेडी सेलडेक है, इसे सुर्खाब के नाम से भी जाना जाता है। रोचक तथ्य है कि इसके पंख यहां आकर सुनहरे हो जाते हैं। यहां सर्दियों में ही नहीं गर्मियों में भी पक्षियों का आना जारी रहता है। जहां सर्दियों में चार से पांच हजार पक्षी आते हैं, वहीं गर्मियों में एक से डेढ़ हजार पक्षी पहुंचते हैं। गढ़वाल मण्डल विकास निगम द्वारा यहां पानी में खेले जाने वाले खेल – वाटर स्कीइंग, बोटिंग आदि को विकसित किये जाने के कारण यह क्षेत्र पर्यटकों की अभिरूचि का केन्द्र बिन्दु बन चुका है।
टपकेश्वर महादेव
प्रकृति के मनोरम दृश्यों, स्वच्छन्द वातावरण के अतिरिक्त अन्य कई आकर्षण हैं इस दून घाटी में। इनमें श्रेष्ठतम है भगवान शिव के उपासकों व पयर्टकों के लिए रमणीक स्थली है टपकेश्वर। देहरादून नगर से छ: किलोमीटर दूर गढ़ी छावनी के समीप टौंस नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक ख्याति लिए प्रसिद्ध शिवमन्दिर। यह प्राकृतिक शिल्प का एक अद्भुत उदाहरण है।
ये है मान्यता
टपकेश्वर को स्वतः निर्मित सिद्ध मन्दिर कहा जाता है। इसके बारे में विभिन्न किवदन्तियाँ प्रचलित हैं। इस सिद्ध मन्दिर में कौरव-पाण्डवों के गुरू द्रोणाचार्य ने तपस्या की थी। शिवजी की कृपा से ही उन्हें पुत्ररत्न के रूप में अश्वत्थामा की प्राप्ति हुई थी। पर्वत की गुफा के अन्दर अपने आप बने इस शिव मन्दिर के ऊपर गाय के थन जैसी आकृति से अविराम दूध की धारा गिरती रहती थी। इसी दूध से द्रोणाचार्य ने पुत्र अश्वत्थामा का पालन-पोषण किया था।
शिवलिंग पर दूध गिरना बन्द होने के बारे में मंदिर के पुजारी का कहना है कि बहुत समय पूर्व मंदिर में रहने वाले पुजारी ने एक बार खीर खाने की इच्छा से शिवलिंग पर गिरने वाले दूध का इस्तेमाल कर लिया था, बस तब से ही दूध के स्थान पर पानी टपकना प्रारम्भ हो गया है। मन्दिर के महन्त के अनुसार जब-जब भी संसार में कोई विपत्ति आयी है तब-तब शिवलिंग पर टपकने वाली धारा स्वत: ही बन्द हो गई। उनके अनुसार 1914 के प्रथम विश्व युद्ध में एक माह, द्वितीय विश्व युद्ध में दो माह, 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय 3 माह तक जल का टपकना बन्द रहा।

पुराणों में भी वर्णन
पुराणों में भी इस टपकेश्वर मन्दिर की महिमा का वर्णन है। केदारखण्ड के 125वें अध्याय के अनुसार गुरू द्रोणाचार्य ने देवधाराचल’ में कई वर्षों तक तपस्या की। यह देवधाराचल टपकेश्वर गुफा का ही नाम है। गुरू रामराय जी ने भी दरबार स्थापना के वर्ष पर इस स्थली में आकर पूजा अर्चना की थी।

लेखक का परिचय
लेखक देवकी नंदन पांडे जाने माने इतिहासकार हैं। वह देहरादून में टैगोर कालोनी में रहते हैं। उनकी इतिहास से संबंधित जानकारी की करीब 17 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। मूल रूप से कुमाऊं के निवासी पांडे लंबे समय से देहरादून में रह रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

You cannot copy content of this page