June 30, 2022

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पढ़िए दीनदयाल बन्दूणी की गढ़वाली रचना- एक दिल हूंद

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” एक दिल हूंद “

दिल सब्यूं , भितर हूंद.
दिली त हूंद , जो रूंद.
दिल जड़द- पच्छ्यड़द-
भितनैं रूंद , भैनैं धूंद..

दिल , कन क्य चांद.
दिल क्य पांद – हत्यांद.
सब रैंद , येका भितर-
येम सौ-समोदर समांद..

दिल , खुट-खुट धड़कद.
दिल , क्वी बात पकड़द.
छोड़ि नि पांदु , वीं बात-
जीति जिंदगी , तड़फद..

दिल , कैकु न दुखावा.
दिल , समझी मिलावा.
मिलावा , त – न त्वाड़ा –
यांकु , ताउम्र रै पछतावा..

दिल , आत्मा पच्छ्यांण च.
दिल कि , कुंगऴि बांण च.
भुल़ण फरि , ह्वे बेचैन –
मिल़ण फरि , बुत्थ्याण च..

‘दीन’ दिला बात , जांणा.
दिल कु बोल्यूं , मांणा.
दिलम बसीं रैंद , आत्मा –
दुयूं , जांणा – पच्छ्याणा..

कवि का परिचय
नाम .. दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन
गाँव.. माला भैंसोड़ा, पट्टी सावली, जोगीमढ़ी, पौड़ी गढ़वाल।
वर्तमान निवास-शशिगार्डन, मयूर बिहार, दिल्ली।
दिल्ली सरकार की नौकरी से वर्ष 2016 में हुए सेवानिवृत।
साहित्य
सन् 1973 से कविता लेखन। कई कविता संग्रह प्रकाशित।

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