July 2, 2022

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देहरादून में अपने अलग रंग में था स्वाधीनता का आंदोलन, पढ़िए पूरी खबर

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लेखक-देवकी नंदन पांडे

स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान यों तो कई प्रदेशों, जिलों तथा क्षेत्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, लेकिन इसमें देहरादून का अपना एक रंग अलग था। कुछ तो अपनी स्थिति के कारण तथा कुछ अपनी स्थानीय समस्याओं तथा रहन-सहन के तौर-तरीकों के कारण। देहरादून शहर और जिले में आन्दोलन कुछ विशिष्ट तरीके से बढ़ा और विकसित हुआ। पंजाब और उत्तर प्रदेश के मध्य में पड़ने के कारण देहरादून में पेशावर और कश्मीर तक के कार्यकर्ताओं और क्रान्तिकारियों का आना-जाना होता था।

वहीं उत्तराखण्ड के रास्ते भी चूंकि देहरादून और ऋषिकेश से ही गुजरते थे, इसलिए गढ़वाल और टिहरी-गढ़वाल के स्वतंत्रता-आन्दोलनों का संचालन भी देहरादून से ही होता था। मसूरी, हरिद्वार और देहरादून जैसे तीन धार्मिक एवं नैसर्गिक सौन्दर्य से भरपूर नगरों के कारण पूर्वी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा तराई के लोगों का आवागमन भी बराबर इस क्षेत्र में होता रहा।
देहरादून जेल
देहरादून जेल का भी अपना महत्व था। देश के बड़े-बड़े नेता यहां समय-समय पर कैद किये गये। पंडित जवाहरलाल नेहरू की देहरादून जेल के सम्बन्ध में लिखी गयी आत्मकथा के अंश देहरादून के प्रति बड़ा अच्छा भाव प्रकट करते हैं। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह जैसे अन्तराष्ट्रीय कोटि के क्रान्तिकारी ने देरादून को ही अपना निवास स्थान बनाया और प्रसिद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस ने एक जमाने में फारेस्ट रिसर्च इन्स्टीट्यूट में एक कर्मचारी की हैसियत से देहरादून में निवास किया।


फोटोः देहरादून जेल के इस वार्ड में पंडित नेहरूजी को रखा गया था, जिसे अब नेहरू वार्ड कहते हैं।

रासबिहारी बोस एफआइआइ में थे कर्मचारी
उसी समय उन्होंने क्रान्तिकारी आन्दोलनों का संगठन और संचालन भी किया। बंगभंग के आन्दोलन के बाद जब देश को राजधानी दिल्ली लायी गयी और वायसराय ने बड़े ही गौरव के साथ हाथी पर सवार होकर दिल्ली में प्रवेश किया तभी उनके ऊपर भीड़ में से आकर एक बम गिरा। जिसमें उनका अंगरक्षक मारा गया और वायसराय भी बेहोश होकर हौदे में गिर पड़े। इस काण्ड के आयोजक श्री रासबिहारी बोस ही थे। बाद में इस केस के सिलसिले में जिन चार लोगों को फांसी दी गयी उनमें देहरादून के श्री वसंतकुमार भी थे।
रूस से लौटने के बाद प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक और कम्युनिस्ट अन्तराष्ट्रीय के सदस्य एम.एन. राय ने भी देहरादून को ही अपना निवास स्थान बनाया। पंजाब से लगा होने के कारण वहां के आन्दोलनों का प्रभाव देहरादून पर बहुत गहरा पड़ता था इसलिए जब रौलेट एक्ट का विरोध हुआ तो देहरादून ने पूर्ण विश्वास के साथ उसमें भाग लिया।
देहरादून जिले की आबादी उस समय मुश्किल से ढाई-तीन लाख थी, लेकिन अंग्रेजों के लिए इस जिले के प्रति मन में मोह-भाव जरा ज्यादा था। जिले का अधिक हिस्सा जंगलों से भरा हुआ था तथा किसी न किसी प्रकार से अंग्रेजों ने इस जिले पर पूर्ण मालिकाना कायम कर रखा था। शराब का प्रचार यहां पहले से ही काफी अधिक था।
महकमा जंगलात की जबर्दस्ती के चलते साधारण जनता को आये दिन कष्ट भोगने पड़ते थे। कन्या-विक्रय की प्रथा भी यहां जोरों पर थी। पंजाब के प्रभाव से देहरादून में आर्य समाज का प्रचार बढ़ना अत्यन्त स्वाभाविक था। इसमें दो मत नहीं कि देहरादून में बाद में जो राजनीतिक चेतना विकसित हुई उसके मूल में काफी हद तक इस क्षेत्र में किये गये कार्यों का हाथ भी था।
मठ मंदिरों में भी पड़ा जागरण का प्रभाव
ज्वालापुर का महाविद्यालय तथा गुरुकुल कांगड़ी का विद्यापीठ इन दोनों संस्थाओं ने इस क्षेत्र
में बड़ी ही महत्वपूर्ण सेवाएं की। जागरण का प्रभाव धीरे धीरे मन्दिरों और मठों पर भी पड़ा और यहां के आन्दोलनों में मठाधीशों और साधुओं ने भी आगे बढ़कर हिस्सा लिया। ऋषिकेश के महन्त परशुराम का इस दिशा में बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान था। उनकी स्नेहशीलता और विनमता ने धीरे धीरे एक अच्छा वातावरण ऋषिकेश के आस-पास बनाया और भविष्य के आन्दोलनों के लिए रास्ता साफ किया। इसीलिए जब बाद में आवश्यकता पड़ी तो सैकड़ों साधु भी बिना हिचक के जेलों में गये और उन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए यातनाएं भोगी। इन्हीं प्रयत्नों का परिणाम था कि देहरादून स्वतन्त्रता आन्दोलनों के अग्रणी जिलों में माना जाने लगा।


नरदेव शास्त्री ने बनाया कार्यक्षेत्र
1920 में देहरादून में प्रथम राजनीतिक सम्मेलन से पूर्व प्रसिद्ध आर्यसमाजी तथा विद्वान नरदेव शास्त्री ने 1976 में महाराष्ट्र से आकर देहरादून को अपना कार्यक्षेत्र बनाया तथा शराब की दुकानों, कन्या विक्रय तथा धर्म परिवर्तन के विरूद्ध वातावरण बनाने में बड़ा भारी योगदान दिया। 1919 में वे राजनीति में भी आ गये और 1920 के राजनैतिक सम्मेलन के वे स्वागताध्यक्ष भी चुने गये। इस सम्मेलन के सभापति पंडित जवाहरलाल नेहरू थे।
नेहरू का पहला कार्यक्रम दून में हुआ
विलायत से लौटने के बाद राजनीति में प्रवेश करने पर जवाहर लाल जी का प्रथम कार्यक्रम देहरादून में ही हुआ था। इस सम्मेलन से देहरादून जिले में अद्भुत जागृति फैल गयी, क्योंकि इसे सफल बनाने के लिए कार्यकर्त्ता 1919 से ही गांव-गांव घूम रहे थे। इस सम्मेलन में लाला लाजपत राय, किचलू तथा अन्य कितने ही बड़े नेता सम्मिलित हुए थे।
जौनसार बाबर में भी नहीं चले हल
जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड 1919 में हो चुका था जिसमें इन लोगों ने अपनी जान पर खेल कर इसका विरोध कर एक आग भड़का दी। इसलिए देहरादून सम्मेलन में उनका सम्मिलित होना स्वाभाविक ही था। रौलेट एक्ट के विरोध में भी देहरादून में बड़ी भारी सभा हुई थी, गांव-गांव में इस जागरण का असर इसी बात से आंका जा सकता है कि कार्यताओं के कहने पर जौनसार बावर के शताब्दियों से पिछड़े और गरीब ग्रामवासियों ने भी उस दिन अपने-अपने हल नहीं चलाये।
सरकारी कर्मचारियों ने छोड़ी नौकरी
असहयोग आन्दोलन में भी लोगों का उत्साह प्रशंसनीय था। जिला बोर्ट के कितने ही अध्यापकों ने अपनी-अपने नौकरियां छोड़ दी। लगभग 80 सरकारी कर्मचारियों ने भी अपने कार्य इस आन्दोलन के दौरान बन्द कर दिये। गांव-गांव पंचायतें कायम हो गयीं और लोगों ने अपने उत्तरदायित्व स्वयं सम्भालने की प्रतिज्ञा ली। सेना के चकराता कैम्प का बहिष्कार भी इस जिले के लोगों ने कर दिया और सेना के सामान से लदी गाड़ियां जहाँ को तहाँ छोड़ दी और काफी लम्बे अर्से तक उन्हें चलाने से अपने को अलग रखा। तीन दिन तक मिलिट्री क्षेत्र में एक भी सामान नहीं पहुंचा। जिससे उन क्षेत्रों में बड़ी ही अव्यवस्था फैल गयी।
यह अव्यवस्था इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण थी कि देहरादून अंग्रेजों के लिए बड़ा ही महत्त्वपूर्ण जिला था। एक तरह से यह जिला शासन का गढ़ रहा है। फारेस्ट कालेज, मिलिट्री कालेज, सर्वे का मुख्य कार्यालय और सबसे ऊपर मसूरी, ऐसी हालत में इस क्षेत्र में अंग्रेजों की नीतियों एवं कार्यप्रणाली का विरोध एक महत्वपूर्ण बात थी।
दूसरी राजनीतिक कांफ्रेंस हुए देहरादून में
इसी वातावरण में देहरादून में 1922 में दूसरी राजनीतिक कांफ्रेंस हुई। जिसके सभापति पंडित जवाहरलाल नेहरू थे। इसमें वल्लभभाई पटेल तथा चितरंजनदास जैसे अखिल भारतीय स्तर के नेता पधारे थे। बाहर से आने वाले नेताओं का यह नगर बराबर अभूतपूर्व स्वागत करता रहा।
महात्मा गांधी जी ने रखी श्रद्धानंद अनाथालय की आधारशिला
महात्मा गांधी जब दक्षिणी अफ्रीका से पहली बार आये तब देहरादून भी पधारे थे। फिर जब दूसरी बार देहरादून आये तो उन्होंने श्रद्धानन्द अनाथालय की आधारशिला रखी और जिला कांफ्रेंस में भी वे सम्मिलित हुए। मसूरी में भी वह चौदह दिन रहे थे और जिले भर से उन्हें तिलक फन्ड के लिए 16,000 रूपये मिले थे। जवाहरलाल नेहरू जी के लिए तो देहरादून और देहरादून जेल लगभग घर जैसे ही थे।
नेहरू को इस कारण देहरादून छोड़ने की मिली आज्ञा
एक बार जब मसूरी में अफगान दूत मण्डल आया था तब सरकार ने जवाहरलाल जी को जिला छोड़ देने की आज्ञा दी थी। क्योंकि चार्लविले होटल में जवाहरलाल का अफगान मण्डली के साथ एक ही होटल में रहना शासन को पसन्द नहीं था इसीलिए इस अपमान का बदला देहरादून वालों ने जवाहरलाल जी को राजनीतिक कान्फ्रेंस में सभापति बनाकर चुकाया था। महामना मालवीय का भी सम्पर्क देहरादून से बराबर बना रहा। फिर बाद में तो देहरादून कितने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं को कर्मभूमि बन गया। बिजनौर से आकर श्री महावीर त्यागी ने इसे अपना कार्यक्षेत्र बनाया और यहां की गतिविधियों में नये अध्याय जोड़ दिये।
सरकारी ड्यूटी के दौरान गांधी टोपी पहने वाले एकमात्र व्यक्ति थे बिहारीलाल
स्वर्गीय चौधरी बिहारीलाल के उल्लेख के बिना देहरादून का एक पक्ष अधूरा ही रह जायेगा। वे यहां सर्वे विभाग में कर्मचारी थे लेकिन उस विभाग में गांधी टोपी पहन कर जाने वाले ये अकेले कर्मचारी थे। 1921 के अधिवेशन में भाग लेने के कारण उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा और वे विश्वास के साथ राजनीति में आ गये। बिहारी लाल आर्य समाज के स्तम्भ थे और बाद में स्वतन्त्रता संग्राम में भी उनका योगदान अभूतपूर्व रहा। वह सम्भवत: एकमात्र दलित थे जो चुनाव के समय सामान्य सीट से खड़े होकर विजयी होते थे।
‘दुःखी भारत’ नामक अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ में लाला लाजपतराय ने बिहारीलाल का बड़े ही सम्मानजनक शब्दों में वर्णन किया है। प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन पर जब अछूतों की भावना को उभारने का प्रयास किया गया तो श्री बिहारीलाल ने ही उनकी इस योजना को प्रभावहीन बनाया था। बिहारी लाल पर प्रसिद्ध क्रान्तिकारी रासबिहारी बोस का भी बड़ा असर था। वे बोस के दर्शन की पाठशाला के विद्यार्थी भी थे।
इंडिपेंडेंट पार्टी की नींव भी देहरादून में पड़ी
एक तरह से देखा जाये तो मोतीलाल की इंडिपेंडेंट पार्टी की नींव भी देहरादून में ही पड़ी थी। गया कांग्रेस में जाने के पहले इंडिपेंडेंट पार्टी के सभी प्रमुख नेता मोतीलाल की अध्यक्षता में देहरादून में एकत्र हुए थे और जो प्रस्ताव पारित किया गया था, उसकी गया कांग्रेस अधिवेशन में मात्र औपचारिक पुष्टि ही की गयी।
गोरखा लीग ने भी दिया महत्वपूर्ण योगदान
गोरखा-लीग ने भी देहरादून में काफी महत्वपूर्ण कार्य किये। गोरखा-लीग को प्रेरणा खड्गबहादुर सिंहक अपूर्ण साहस से प्राप्त हुई। कलकता में नेपाली राजघराने को लड़की ने किसी प्रकार से अपने कष्टों की कहानी पड़ोस में रहने वाले खड्ग बहादुर सिंह तक पहुंचायी। खड्ग बहादुर सिंह ने अपनी उस धर्म-बहन को अपने खून से चिट्ठी लिखी और उसको रक्षा का वचन दिया। प्रतिज्ञा के अनुसार उन्होंने खुखरी से अत्याचारी सेठ को मार दिया और लड़की को उनके पंजे से छुड़ा दिया। खड्ग बहादुर अन्त में पकड़े गये, लेकिन उनको मुक्त कराने के लिए एक विशाल जन आन्दोलन खड़ा हो गया।
खड्ग बहादुर सिंह को आठ वर्ष की सजा हुई । सजा काटकर छूटने के बाद वह महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में जाकर रहने लगे। तथा महात्माजी के साथ प्रसिद्ध डण्डी मार्च में भी शामिल हुए। नमक आन्दोलन के सिलसिले में देहरादून में भी डेढ़ सौ गोर्खालियों का जत्था सम्मिलित हुआ था।
नरदेव शास्त्री ने की दून की तारीफ
नरदेव शास्त्री के शब्दों में देहरादून जिला छोटा होते हुए भी काम बड़े जिलों जैसा ही करता रहा है। सदैव बराबर की टक्कर देता रहा है। क्या कांफ्रेंस में, क्या नेताओं के स्वागत सत्कार में, क्या चन्दा देने में, क्या सत्याग्रहों में, किसी भी बात में भी प्रांत के किसी भी बड़े जिले की सकर का काम करता रहा। देहरादून की कांग्रेस का बाहर बहुत बड़ा नाम था। क्योंकि उसने जितने भी काम किए सब एक से एक बढ़कर किए।
नहीं डरे अंग्रेजों के फरमान से
रौलेट एक्ट के विरोध से आन्दोलन की जो परंपरा देहरादून में प्रारम्भ हुई, वह निरन्तर विकसित होती रही। 1921 में अहमदाबाद कांग्रेस में शते की वैधरियां देहरादून में हो रही थी तभी अंग्रेज सरकार ने अचानक फरमान निकाला कि कांग्रेस वालंटियर तथा नेशनल वालंटियर संगठन गैर-कानूनी है। जो लोग इन संगठनों में सम्मिलित होंगे उन्हें क्रिमिनल लॉ अमेण्डमैट एक्ट 17(ए.) को धारा के अनुसार 6 माह का दण्ड दिया जायेगा। साथ ही वालिंटियर की भर्ती करने वालों को सत्रहवीं धारा के अनुसार तीन वर्ष का कारावास और 1000 रुपये का दंड भुगतान होगा।
यद्यपि ये धाराएं दूसरे प्रयोजन के लिए बनायी गयी थी, लेकिन अंग्रेज सरकार ने कांग्रेस आन्दोलनों को कुचलने के लिए उनका उपयोग किया। 27 नवम्बर, 1921 को भारतवर्ष की भूमि पर युवराज का पदार्पण होने वाला था। उसी के उपलक्ष्य में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने भारत भर में पूरी हड़ताल मनाने का संकल्प किया तथा देहरादून जिले भर में इस समय अभूतपूर्ण हड़ताल हुई।

तिलक भूमि पर आयोजित सभा भी महत्वपूर्ण थी, वहीं बारडोली सत्याग्रह के लिए स्वयं सेवक भर्ती किये गये और लाहौर में लगी लारैंस की मूर्ति को हटाने के लिए सत्याग्रहियों के नाम लिखे गए। म्युनिसिपल बोर्ड से कहा गया कि यह प्रिन्स ऑफ वेल्स के स्वागत में एक पाई भी खर्च न करे। बड़ी ही चहल-पहल के दिन थे। कार्यकर्ताओं ने उत्साह से अंग्रेज सरकार के कांग्रेस वालन्टियर के विरुद्ध हुकुमनामे की नकल नरदेव शास्त्री तथा बाबू बुलाकीराम को दिखायी। फिर हस्ताक्षर करते हुए उन्होंने हुकुमनामे की पीठ पर लिखा कि इस कार्यवाही से राजऔर प्रजा को बीच असन्तोष बढ़ेगा। इसलिए यह उचित नहीं है।
5 दिसम्बर को तिलक भूमि में जो बड़ी सभा स्वयंसेवकों की भर्ती के लिए होने वाली थी उसको वहां न करने का आदेश भी सरकार ने जारी कर दिया। इसलिए चारों ओर चर्चा होने लगी कि इस सभा में देखिए क्या होता है? एक नोटिस द्वारा लोगों को सूचित किया गया कि बिना किसी हिचक के उत्साहपूर्वक 5 दिसम्बर को सभा में उपस्थित हों। सभा को तैयारी हो ही रही थी कि 4 दिसम्बर की शाम को नरदेव शास्त्री, बाबू बुलाकीराम तथा फखरूददीन अहमद फारूकी पर धारा 144 लगा दी गयी।

यह नोटिस ऐसे समय में दिया गया था जिसमे पांच दिसम्बर को कुछ भी न किया जा सके, केवल रात भर का ही समय था। कार्यकर्ताओं ने उस चुनौती को स्वीकार किया। सरकारी नोटिस में लिखा गया था कि देहरादून के इर्दगिर्द 6 मील तक और राजपुर तथा उसके आसपास 5.5 मील तक पिकेटिंग, बायकॉट, कानून भंग तथा स्वयंसेवकों की भर्ती – इन चार बातों के लिए सभा करना मना है।
इस आर्डर की पुश्त पर फिर नेताओं ने लिखा कि यह 144 धारा का दुरूपयोग है। इस धारा के लगते ही शहर भर में सन्नाटा छा गया। दूसरी और कांग्रेस की इज्जत का सवाल था। सभी प्रमुख कार्यकर्ता बाबू बुलाकीराम की कोठी पर एकत्रित हुए और आधे घंटे के बाद विवाद के बाद यह तय हुआ कि हर्रावाला में सभा की जाये।


सख्ती के बावजूद हुई अद्भुत सभा
मास्टर हुलास वर्मा तथा अन्य कई कार्यकर्ताओं ने गली-गली घूम कर शहर भर में सभा सूचना फैला दी। जिन-जिन मार्गों से लोग आने वाले थे उन-उन मागों पर आदमी भेज दिये गये। दूसरे दिन आने वालों का तांता लग गया। श्री नरदेव शास्त्री एक बजे तक तिलक भूमि पर ही खड़े रहे और आने वालों को हर्रावाला की तरफ रवाना करते रहे। आन्दोलन में आने वाली पीढ़ी ने उस समय अद्भुत त्याग और उत्सर्ग की भावना का परिचय दिया। नतीजा यह हुआ कि हर्रावाला में जो सभा हुई वह अद्भुत थी। सभा क्या थी एक अच्छा खासा मेला ही हो गया था। वहां बाबू बुलाकीराम की अध्यक्षता में कार्यवाही प्रारम्भ हुई और उसमें आन्दोलन की पहली पंक्ति में आगे बढ़ने वाले लाला वानूमल, चौधरी हुलास वर्मा, ठाकुर मनजोत सिंह, मुहम्मद इसहाक हुसैन फारूकी तथा ठाकुर चन्दनसिंह के भाषण हुए।
यहां से शुरू हुई दून में जेल जाने की परंपरा
नरदेव शास्त्री ने स्वयंसेवकों को प्रतिज्ञा पत्र पढ़कर सुनाया और स्वयंसेवक अपने नाम लिखवाने लगे। सैकड़ों लोगों ने अपने नाम लिखवाये और प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किये। ठाकुर चन्दन सिंह जिले भर के स्वयंसेवकों के कमाण्डर चुने गये। सरकार ने खीझ उतारने के लिए गिरफ्तारियां शुरू की और नरदेव शास्त्री गिरफ्तार कर लिये गये । हजारों लोगों ने उन्हें जेल के फाटक तक विदा दी और इस प्रकार जेल जाने की परम्परा आरम्भ हुई।

नरदेव शास्त्री का मुकदमा चलने पर देहरादून में अपूर्व उत्साह देखा गया। देहरादून में जनता के बीच नरदेव शास्त्री का इतना सम्मान था कि अधिकारियों को भय लगने लगा। इसलिए उन्हें मुरादाबाद जेल में अलग रखा गया। बाद में वे बरेली, लखनऊ तथा रायबरेली जेलों में भी रखे गये। 1923 के म्युनिसिपल बोर्ड के चुनाव में पांच स्थानों में से चार कांग्रेस को मिले और इस प्रकार पिछले वर्षों में किये गये प्रयासों का फल देहरादून की जनता को विजय के रूप में प्राप्त हुई।
नमक आंदोलन में दून की भूमिका
1929-30 के नमक सत्याग्रह आन्दोलन में देहरादून ने बढ़चढ़ कर भाग लिया। गिरफ्तारियों की संख्या इस बार पहले के मुकाबले काफी बढ़ गयी। स्व. मास्टर रामस्वरूप के अनुसार लगभग 400 लोग उस समय जेल में गये। मुश्किल से 3 लाख की आबादी वाले जिले में इतने लोगों का जेल जाना कम महत्वपूर्ण नहीं था। इसमें शहर से जेल जाने वालों की संख्या 200 से ऊपर थी। कुछ लोग दिल्ली और शिमला में भी जाकर गिरफ्तार हुए थे। इस आन्दोलन के दौरान साधुओं ने भी बड़े विश्वास के साथ भाग लिया और 60-70 साधु जेल भी गये। इसके बाद भी सैकड़ों साधु जेल जाने के लिए तैयार थे, लेकिन आन्दोलन स्थगित हो जाने के कारण वे ऐसा नहीं कर सके।
महिलाओं की भूमिका
महिलाओं की भागीदारी भी इन आन्दोलनों में कम महत्वपूर्ण नहीं थी। श्रीमती शर्मदा त्यागी की सेवाओं को लोग सम्भवत: कभी नहीं भूलेंगे। उसी तरह श्रीमती सरस्वती देवी जैसी धुन की पक्की महिला को भी लोग भूल नहीं सकते। महात्मा गांधी का चर्खा उन्होंने ऐसा सम्भाला कि नगर तथा जिले में उनकी धूम मच गयी। 1930 के आन्दोलन में आगे आने वाले कार्यकर्ताओं की पंक्ति में श्री कृष्णचन्द्र सिंघल, श्री राम शर्मा ‘प्रेम’, जगदीश वैद्य, धर्मस्वरूप रतूड़ी वैद्य, गुरूदत्त वैद्य के नाम उल्लेखनीय हैं। यों तो देहरादून में स्वतन्त्रता आन्दोलन काफी पहले से प्रारम्भ हो गया था, लेकिन गिरतारियों का सिलसिला नमक आन्दोलन सत्याग्रह के दौरान ही देखा गया। जितने भी स्वतन्त्रता संग्राम सैनानी आज दिखायी पड़ते हैं उनमें से अधिकांश ने इसी समय आन्दोलन में भागीदारी सुनिश्चित की थी।
1947 के व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन में लगभग 150 लोग जेलों में गये। उसके बाद 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में पुन: लगभग 400 आदमी जेलों में गये। काफी उत्साह से लोगों ने जुलूस निकाले और सरकारी कार्य-व्यवस्था को काफी हद तक अव्यवस्थित करने का भी प्रयत्न किया।


लेखक का परिचय
लेखक देवकी नंदन पांडे जाने माने इतिहासकार हैं। वह देहरादून में टैगोर कालोनी में रहते हैं। उनकी इतिहास से संबंधित जानकारी की करीब 17 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। मूल रूप से कुमाऊं के निवासी पांडे लंबे समय से देहरादून में रह रहे हैं।

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