June 29, 2022

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जानिए देहरादून का इतिहास, पौराणिक महत्व और वर्तमान स्थिति, पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें

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लेखक-देवकी नंदन पांडे
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देहरादून का कुल भौगोलिक क्षेत्र 3000 वर्ग किलोमीटर और यहां की जनसंख्या 1696,694 है। देहरादून का प्राचीन नाम द्रोणाश्रम बताया जाता है। इसका संबंध द्वापर युग में आचार्य द्रोण के इस क्षेत्र में तपस्या के लिए आगमन से जोड़ा गया है। आधुनिक नाम देहरादून, गुरु राम राय के यहाँ पदार्पण से निकट संबंध रखा है। देहरादून दो शब्दों “देहरा”, “दून” से मिलकर बना है। “देहरा” शब्द को सामान्यतः ‘डेरा” का विकृत रूप माना गया है। देहरा का शाब्दिक अर्थ है शिविर। जब गुरु राम राय इस क्षेत्र में आये तो अपने व अनुयायियों के रहने के लिए उन्होंने यहाँ अपना “डेरा” स्थापित किया।
नाम की विशेषता
कालान्तर में नगर का विकास इसी डेरे के आस पास से आरम्भ हुआ। अतः डेरा का दून के साथ जुड़ जाने के पश्चाात यह स्थान देहरादून कहलाया जाने लगा। कुछ इतिहासविदों का यह भी मानना है कि “देहरा” शब्द स्वयं में सार्थकता लिए हुए है इसको “डेरा” का अपभ्रंश रूप नहीं माना जा सकता है। देहरा शब्द हिन्दी व पंजाबी भाषाओं में आज भी प्रयुक्त होता है। हिन्दी में देहरा का अर्थ है देवग्रह या देवालय, पंजाबी में देहरा का प्रयोग समाधि, मन्दिर, गुरुद्वारा के अर्थों में सुविधानुसार किया गया है। इसी तरह दून’ शब्द दूण से बना है। दूण शब्द संस्कृत के द्रोणि का विकृत रूप है। संस्कृत में द्रोणि का अर्थ दो पहाड़ों के बीच की घाटी है।


यह है भौगोलिक स्थिति
देहरादून उत्तर में हिमालय से और दक्षिण में शिवालिक से घिरा है। गंगा नदी पूर्व में और यमुना नदी पश्चिम में प्राकृतिक सोमा बनाती है। देहरादून जिले का क्षेत्रफल 3088 वर्ग किलोमीटर है। यह जिला दो प्रधान भागों में बंटा हुआ है। मुख्य शहर देहरादून एक खुली घाटी है। यह घाटी शिवालिक और हिमालय से घिरी हुई है। दूसरे भाग में जीनसार बाबर है जो हिमालय के पहाड़ी भाग में स्थित है।
देहरादून एक विषम चतुर्भुज के समान है। इसकी लम्बी भुजायें उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व की ओर हैं। शिवालिक का ढाल दून की ओर क्रमशः है, पर मैदान की और उसका ढाल एकदम सपाट है। शिवालिक की रुकावट के कारण हिमालय की पिसी हुई मिट्टी और कंकड़-पत्थर का अधिकतर भाग दून में ही रुक जाता है। इससे दून की घाटी गंगा के मैदान की अपेक्षा कहीं अधिक ऊंची हो गई है। इस ऊंची घाटी को कई पहाड़ी धाराओं ने गहरा काट दिया है, जिससे धरातल पर बहुत कम पानी मिलता है। घाटी के बीच का भाग अधिक ऊँचा है। पश्चिम में यमुना की ओर तथा पूर्व में गंगा की ओर प्रति किलोमीटर 32 फीट की चाल से ढाल हो गया है।


यमुना से लेकर गंगा तक फैला है शिवालिक पर्वत
शिवालिक पर्वत यमुना से लेकर गंगा तक चला गया है। हिमालय से दक्षिण की ओर 32 किलोमीटर पर शिवालिक स्थित है। इसकी अधिक से अधिक ऊंचाई तीन हजार फीट है। यह असंख्य पहाड़ियों का समूह है। कुछ का अनुमान है कि इसी से इसका नाम शिवालिक या सवालाख पड़ा। यह पर्वत हिमालय से अधिक पुराना है। इसके ढालों पर साल के वृक्ष तथा चोटियों पर देवदार के छोटे-छोटे पेड़ है। उत्तर दिशा में मसूरी की पहाड़ी है जो वास्तव में हिमालय का दक्षिणी निचला ढाल है। मसूरी में लंढौर की ऊंचाई 7456 फीट तथा लाल टिब्बा ऊंचाई 8545 फीट है।
दून क्षेत्र का प्राचीन केदारखंड में यमुना, टॉंस, बालखिल्य (सुसवा), सिद्धकूट (नागसिद्ध), ऋषिकेश और तपोवन के नामों से उल्लेख है। द्वापर युग में गुरु द्रोणाचार्य ने द्वारागांव के पास देहरादून शहर से उनीस किलोमीटर पूर्व में देवदारू पर्वत पर तप किया था। इसी से यह घाटी द्रोणाश्रम कहलाती है।
नदी की उत्पत्ति की है रोचक कथा
बालखिल्य या सुसवा नदी की उत्पत्ति की रोचक कथा है। एक बार देवताओं के राजा इंद्र ने बालखिल्य ऋषियों को गाय के खुर के समान पानी से भरे गड्ढे में क्रीड़ा करते देखा। वह उनके छोटे शरीर की हंसी करने लगा। तिस पर बालखिल्य ऋषियों ने दूसरे इंद्र की रचना के लिए तप किया। तपस्या मग्न ऋषियों के शरीर से इतना पसीना निकला कि बालखिल्य या शोभन नदी बन गयी, जिसे अब सुसया कहते हैं।
पुराण में वर्णित की गई सीमाएं
केदारखण्ड, जो स्कन्दपुराण का एक भाग माना आता है, में गढ़वाल की सीमायें इस प्रकार वर्णित की गयी हैं- गंगाद्वार (हरिद्वार) से लेकर श्वेतांत पर्वत तक एवं तमसा (टॉंस) नदी से बौद्धांचल (बधाण में नन्दादेवी) तक विस्तृत भू-खण्ड केदारमंडल अथया केदारखण्ड कहलाता है। देहरादून इसी केदारखण्ड का एक भाग है । इसके एक ओर गंगा और दूसरी ओर यमुना नदी बहती है। तमसा का प्रवाह भी देहरादून से होकर है।
रामायण काल से भी है संबंध
देहरादून के रामायण काल से सम्बन्ध के बारे में विवरण आता है कि रावण के साथ युद्ध के पश्चात राम और लक्ष्मण इस क्षेत्र में आये थे। अंग्रेज लेखक जी.आर.सी. विलियम्स ने ‘मेमोयर्स आफ दून’ में ब्राह्मण जनश्रुति का उल्लेख करते हुए लिखा है, कि लंका विजय के पश्चात् ब्राह्मण रावण को मारने का प्रायश्चित करने और प्रायश्चित स्वरूप तपस्या करने के लिए गुरु वशिष्ठ के परामर्श पर राम व उनके भाई लक्ष्मण यहाँ आये थे। राम ने अषिकेश में और
लक्ष्मण ने तपोवन में पाप से मुक्ति के लिए वर्षों तक तपस्या की।
स्कंदपुराण में है ऋषिकेश का जिक्र
देहरादून जिले के अन्तर्गत ऋषिकेश के बारे में भी स्कन्दपुराण में उल्लेख है। भगवान विष्णु ने दैत्यों से पीड़ित ऋषियों की प्रार्थना पर मधु-कैटम आदि दैत्यों का संहार किया था और यह भूमि ऋषियों को प्रदान की थी। पुराणों में इस क्षेत्र को लेकर एक विवरण इस प्रकार भी है कि राम के भाई भरत ने भी यहाँ तपस्या की थी। तपस्या वाले स्थान पर भरत मंदिर बनाया गया था। कालान्तर में इसी मंदिर के चारों ओर ऋषिकेश नगर का विकास हुआ। पुरातत्व को दृष्टि से भरत मंदिर की स्थापना सैकड़ों वर्ष पुरानी है।
तमसा तट पर आचार्य द्रोण को शिव ने दिए थे दर्शन
स्कन्दपुराण में तमसा के तट पर आचार्य द्रोण को भगवान शिव द्वारा दर्शन देकर शस्त्र विद्या का ज्ञान कराने का उल्लेख मिलता है। यह भी कहा जाता है कि आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा द्वारा दुग्धपान करने के आग्रह पर भगवान शिव ने तमसा नदी तट पर स्थित गुफा में प्रकट हुए शिवलिंग पर दुग्ध गिराकर बालक की इच्छा पूरी की। यह स्थान गढ़ी क्षेत्र में स्थित टपकेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर बताया जाता है।


फोटोः कालसी में शिलालेख

कालसी में था राजा विराट का शासन
महाभारत काल में देहरादून का पश्चिमी क्षेत्र जिसमें वर्तमान कालसी सम्मिलित है, का शासक राजा विराट था। उसकी राजधानी वैराटगढ़ थी। पाण्डव अज्ञातवास के दौरान वेश बदलकर राजा विराट के यहाँ रहे। इसी क्षेत्र में एक मंदिर है, जिसके बारे में कहा जाता है कि उसकी स्थापना पांडवों ने की। इसी क्षेत्र में एक पहाड़ी भी है जहां भीम ने दोपदी पर मोहित हुए कीचक को मारा था। जब कौरव व त्रिगर्ता के शासक ने राजा विराट पर हमला किया तो पाण्डवों ने राजा विराट को सहायता की। महाभारत युद्ध के पश्चात् भी पाण्डवों का इस क्षेत्र पर प्रभाव रहा और हस्तिनापुर के शासकों के अधीनस्थ शासकों के रूप में सुबाहू के वंशजों ने यहाँ राज्य किया।
पुराणों में देहरादून जनपद के जिन स्थानों का सम्बन्ध रामायण व महाभारत काल से जोड़ा गया है, उन स्थानों पर प्राचीन मंदिर व मूर्तियां अथवा उनके भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं। इन मंदिरों, मूर्तियों व भग्नावशेषों का काल प्राय: दो हजार वर्ष या उसके आस-पास का है। क्षेत्र की स्थिति और प्राचीन काल से चली आ रही सामाजिक परम्परायें, लोकश्रुतियाँ, गीत और इनकी पुष्टि से खड़ा समकालीन साहित्य दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र रामायण व महाभारत काल की अनेकों घटनाओं का साक्षी रहा है।
कलांतर में संपन्न रहा है यह क्षेत्र
यमुना के किनारे कालसी में अशोक के शिलालेख प्राप्त होने से इस बात की पुष्टि होती है कि कालांतर में यह क्षेत्र काफी सम्पन्न रहा होगा। सातवीं सदी में इस क्षेत्र को सुधनगर के रूप में प्रसिद्ध चीनी यात्री हवेनसांग ने भी देखा था। यह सुधनगर ही बाद में कालसी के नाम से पहचाना जाने लगा। कालसी के समीपस्थ हरिपुर में राजा रसाल के भग्नावशेष मिले हैं, जो इस क्षेत्र को सम्पन्नता को दर्शाते हैं। लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व दून क्षेत्र में बंजारे लोग आ बसे थे। उनके बस जाने पर यह क्षेत्र गढ़वाल के राजा को कर देने लगा।
तैमूर ने भी किया था हमला
कुछ समय बाद इस ओर इब्राहिम बिन महमूद गजनलो का हमला हुआ। इससे भी भयानक हमला तैमूर का था। सन् 1368 में तैमूर ने हरिद्वार के पास राजा ब्रह्मदत्त से लड़ाई की ब्रह्मदत्त का राज्य गंगा और यमुना के बीच में था। बिजनौर जिले से गंगा को पार कर के मोहन्ड दरें से तैमूर ने देहरादून में प्रवेश किया था। हार जाने पर तैमूर ने बड़ी निर्दयता से कत्ल करवाया। उसको लूट में बहुत सा धन भी मिला था। इसके बाद फिर कई सदियों तक इधर कोई लुटेरा नहीं आया। शाहजहाँ के समय में फिर एक मुगल सेना इधर आयी। उस समय गढ़वाल में पृथ्वी शाह का राज्य था। इस राजा के प्रपौत्र फतेह शाह ने अपने राज्य की सीमा बढ़ाने के उद्देश्य से तिब्बत और सहानपुर पर एक साथ चढ़ाई की थी, लेकिन इतिहास के दस्तावेजों के अनुसार उसको युद्ध में हार का मुंह देखना पड़ा।


गुरु राम राय ने रखी दरबार साहिब की नींव
सन् 1756 के आसपास श्री गुरु राम राय ने दून क्षेत्र में अपनी सेना व शिष्यों के साथ प्रवेश किया और दरबार साहिब की नींव रखकर स्थायी रूप से यहीं बस गये। गूजर और राजपूतों के आ जाने से धीर-धीरे दून की आबादी बढ़ने लगी। अबादी और अन्न की उपज बढ़ने से गढ़वाल राज्य की आमदनी भी बढ़ने लगी। देहरादून की बढ़ती सम्पन्नता को देखकर 1757 ईस्वी में रूहेला सरदार नजीबुद्दीला ने हमला किया। इस हमले को रोकने में गढ़वाल राज्य नाकाम रहा। फलत: देहरादून मुगलों के हाथ चला गया । देहरादून के तत्कालीन शासक नजब खाँ ने इसके परिक्षेत्र को बढ़ाने में भरपूर कोशिश की। आम के वृक्ष लगवाने, नहर खुदवाने और खेती का स्तर सुधारने में उसने स्थानीय निकायों को भरसक सहायता पहुँचाई । नजब खां के मरने पर कृषकों की दशा फिर दीन-हीन हो गयी।
गुरु राम राय दरबार के कारण यहां सिखों की आवाजाही भी बढ़ चुकी थी। अत: एक बार फिर से देहरादून का गौरव समृद्धशाली क्षेत्र के रूप में फैलने लगा। सन 1785 में गुलाम कादिर ने इस क्षेत्र पर हमला किया। इस बार बड़ी मारकाट मची। गुलाम कादिर ने लौटते समय उम्मेद सिंह को यहाँ का गवर्नर बनाया। गुलाम कादिर के जिन्दा रहते उम्मेद सिंह ने स्वामी भक्ति में कोई कमी न आने दी, परन्तु गुलाम कादिर के मरते ही सन 1796 में उसने गढ़वाल के राजा प्रद्युम्न शाह से संधि कर ली।
सन् 1801 तक देहरादून में अव्यवस्था बनी रही। प्रद्युम्न शाह का दामाद हरिसिंह गुलेरिया दून की प्रजा का उत्पीड़न करने वालों में सबसे आगे था। अराजकता के कारण दून की वार्षिक आय एक लाख से घटकर आठ हजार रुपये मात्र रह गयी थी। प्रद्युम्न शाह के मंत्री रामा और धरणी नामक बंधुओं ने दून की व्यवस्था सुधार में प्रयास आरम्भ किये ही थे कि प्रद्युम्न शाह के भाई पराक्रम शाह ने उनका वध करा दिया। अब देहरादून की सत्ता सहसपुर के पूर्णसिंह के हाथों में आ गई, किन्तु वह भी व्यवस्था में सुधार न ला सका। पराक्रम शाह ने अपने मंत्री शिवराम सकलानी को इस आशय से देहरादून भेजा कि वह उसके हितों की रक्षा कर सके।
शिवराम सकलानी के पूर्वज शीश राम को रोहिला युद्ध में वीरता दिखाने के कारण टिहरी रियासत ने सकलाना पट्टी में जागीर दी थी। इन सभी के शासन काल में देहरादून का गवर्नर उम्मेद सिंह ही बना रहा। वह एक चतुर राजनीतिज्ञ था। इसी कारण प्रद्युम्न शाह ने अपनी एक पुत्री का विवाह उसके साथ कर उसे अपना स्थायी शासक नियुक्त कर दिया था। कहा जाता है कि 1803 में गोरखा आक्रमण के समय उम्मेद सिंह ने अवसरवादिता का परिचय कुछ विशेष रूप में इस प्रकार दिया कि युद्ध के समय वह अपने ससुर प्रद्युम्न शाह के पक्ष में खड़ा देखा नहीं गया। देहरादून को उसकी सम्पन्नता के कारण ही समय समय पर लुटेरों की लूट एवं तानाशाहों की प्रवृत्ति का शिकार बनते रहना पड़ा।
सन् 1760 में गोरखों ने अल्मोड़ा जीतने के उपरांत गढ़वाल पर धावा बोला। गढ़वाल के राजा
ने गोरखों को पच्चीस सौ रुपया वार्षिक कर के देने शुरू किये, लेकिन इतना नजराना पाने के बावजूद भी 1803 में गोरखों ने गढ़वाली सेना से युद्ध छेड़ दिया। गोरखों की विजय हुई और उनका अधिकार क्षेत्र देहरादून तक बढ़ गया।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने देहरादून को गोरखों के प्रभाव से मुक्त कराने के लिए मोहन्ड और तिमली दरों से अंग्रेज सेना भेजी। अंग्रेजों ने बल का उपयोग कर गोरखों को खदेड़ बाहर किया और इस तरह उनका देहरादून में प्रभुत्व स्थापित हो गया। अब उन्होंने अपने आराम के लिए 1827-28 ई. में लंढौर और मसूरी शहर बसाया। कुछ समय के लिए देहरादून जिला कुमाऊँ कमिश्नरी में रहा, फिर इसको मेरठ में मिला दिया गया। आज यह गढ़वाल कमिश्नरी में है।
डाक व्यवस्था का प्रबंध
जिले में डाक व्यवस्था का सर्वप्रथम प्रबंध 1845 में हुआ था और उस समय हरकारों द्वारा जिले भर में डाक भेजी जाती थी। उन दिनों सरकारी डाक पुलिस के माध्यम से वितरित होती थी। जनता के लिए सार्वजनिक रूप से डाक का प्रारम्भ 1873 में दो पैसे के टिकट से हुआ था। सन् 1863 में इम्पीरियल डाक ने यहां की व्यवस्था अपने हाथों में ले ली थी। 1900 में जिला डाक व्यवस्था समाप्त कर व देहरादून को प्रधान कार्यालय बनाकर एक नयी डाक सेवा प्रारम्भ की गयी। इस सेवा के तहत रेल द्वारा आयी डाक को घोड़ा गाड़ियों तथा हरकारों से जिले भर में वितरित करने का ठेका दिया जाने लगा। धीरे-धीरे जिले के अन्य भागों में डाकघर खोलने का कार्य आरम्भ हुआ और 1906 तक सम्पूर्ण जिले में मात्र 31 डाकघर ही खुल पाये। आज सम्पूर्ण जिले की डाक को सुव्यवस्थित रूप में बांटने के लिए 435 डाकघर हैं।


शिक्षा के क्षेत्र में
आज देहरादून में एक हजार से ज्यादा प्राथमिक स्कूल हैं। साथ ही निजी स्कूलों की बाढ़ सी आ गई है। देश की भाषा को माध्यम बनाकर विद्यार्थियों को शिक्षित करने वाली कुछ अग्रणीय शिक्षण संस्थायें ये हैं- सी0एन0आई0 ब्वायज इंटर कालेज (मिशन स्कूल) की स्थापना सन् 1854 में हुई थी, यह 1941 में हाई स्कूल और 1951 में इंटर कालेज बना। महादेवी कन्या पाठशाला कालेज 1902 में श्रीमती महादेवी द्वारा स्थापित किया गया। तदुपरान्त 1914 में हाईस्कूल, 1938 में इन्टरमीडिएट, 1958 में डिग्री कालेज 1965 में पोस्ट ग्रेजुएट कक्षायें आरम्भ की गयी। इसी प्रकार हिन्दू नेशनल इंटर कालेज 1920, साधूराम इंटर कालेज 1925, गुरूनानक इंटर कालेज 1936, गोरखा इंटर कालेज 1925, कन्या कुरूकुल महाविद्यालय 1923, महावीर जैन कन्या पाठशाला 1927, नारी शिल्प मन्दिर इंटर कालेज 1930, रामप्यारी गर्ल्स इंटर कालेज 1944, घनानंद राजकीय कालेज (मसूरी) 1930, सनातन धर्म गर्ल्स कालेज (मसूरी) 1926, मानव भारती स्कूल (मसूरी) 1946, म्युनिसिपल पोस्ट ग्रेजुएट कालेज (मसूरी) 1963 तथा आर०एन०भागर्व इंटर कालेज मसूरी में 1943 में स्थापित किये गये।


देहरादून का वन क्षेत्र
देहरादून जनपद के 3088 वर्ग किलोमीटर भूभाग में कुल वन क्षेत्र 2116.91 वर्ग किलोमीटर है। देहरादून के भू भाग के 68.55 प्रतिशत भाग में वन हैं जो उत्तराखण्ड के औसत वन क्षेत्र से चार प्रतिशत अधिक हैं। देहरादून जनपद के निजी क्षेत्र में 56.72 वर्ग किलोमीटर, वन पंचायत के अधीन 76.59 वर्ग किलोमीटर तथा नगरपालिका एवं कैन्टोन्मेंट क्षेत्र मिलाकर 31.11 वर्ग किलोमीटर वन हैं। वन विभाग के अधीन 1512.94 वर्ग किलोमीटर वन हैं। जिले में चालीस प्रतिशत से अधिक क्षेत्र घनत्व वाला वन 1239 वर्ग किलोमीटर में और दस प्रतिशत से अधिक चालीस प्रतिशत तक क्षेत्र धनत्व वाला वन 331 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है।
राजधानी बनने के उपरान्त देहरादून का बदलता स्वरूप
कभी देहरादून अवकाश प्राप्त लोगों का स्वर्ग माना जाता था, जहां सेवा मुक्त अधिकारी अपनी बाकी जिंदगी बसर करते थे। यहां का अमन, चैन, धीमा ट्रैफिक व प्रदूषण मुक्त वातावरण लोगों को आकर्षित करता था। अपनी शांत वादियों, हरी-भरी नैसर्गिक छआओं, बाग-बगीचों के लिए इसका नाम भारत भर में प्रसिद्ध था, तब यह उत्तर प्रदेश के अनेक शहरों में एक हुआ करता था। पर उत्तराखण्ड बनने के बाद शहर का चेहरा तो बदला ही, चरित्र भी बदल गया है। नए राज्य की राजधानी बनने के बाद वह नए सत्ता केंद्र के रूप में उभरा है।
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्यालयों और शोध संस्थाओं से घिरी शांत घाटी से वह एक ऐसे बड़े शहर में परिवर्तित हो गया है, जिसमें आठ लेन तक की सड़कें, नए बाजार और नए कार्यालय उग आए हैं और ट्रैफिक में तेजी आ गई है। दूसरों से बेपरवाह लोग अपनी मंजिल की ओर भागते और बाजार युवाओं की भीड़ से भरे नजर आते हैं, लड़कियां हर क्षेत्र में लड़कों से टक्कर लेती दिखती हैं।


आधुनिकता की चकाचौंध में यह भी अन्य शहरों की तरह आगे बढ़ा है। शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स और मैकडॉनाल्ड की दुकानों की बाढ़ आ गई है। कभी गुरू राम राय का डेरा रहा देहरादून, कभी चावल ,चाय, चीनी, चूना और बेकरी की लिए प्रसिद्ध माना जाता था, पर धान के खेतों को अब बिल्डरों की नजर लग गई तो चीनी भी खुली अर्थव्यवस्था की भेंट चढ़ गई। चूने का उत्पादन अब लगभग समाप्त कर दिया गया है।
देहरादून की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 27,800 रू. प्रतिवर्ष है। दिल्ली से नजदीक होने से उसका प्रभाव देहरादून पर सबसे ज्यादा पड़ता है। कॉस्मोपोलिटन शहर होने के नाते यहां क्लब का प्रचलन बढ़ा है। देहरादून कई सौंदर्य प्रतियोगिताओं का भी आयोजक बना तो बॉलीवुड की फिल्म रिलीज करने का प्रीमियर का गवाह भी बना है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने को शहर के लिए भूमिगत तारों से जुड़ने वाली जहां विद्युत व्यवस्था की जा रही है, वहीं चौराहों को चौड़ा करने के लिए भी केन्द्र ने शहर की योजनाओं पर लगातार कार्य चल रहा है। देहरादून की आर्थिक स्थिति भी पर्यटन से जुड़ी है। शहर में भारी मात्रा में पर्यटकों की आवाजाही वर्ष भर रहती है। पर्यटकों की दिलचस्पी के चलते शहर में अनेक योजनाएं लागू की जा रही हैं। वायु सेवा को दुरूस्त किया गया है। शहर में सैनिक अफसरों के मकान हैं तो यह बॉलीवुड अभिनेताओं और अमीरजादों के बच्चों को पढ़ाई का पसंदीदा भी है। यहां के स्कूलों का भारत ही नहीं विदेशों में भी नाम है।
शहर के आसपास औद्योगिक समूहों की सक्रियता भी बढ़ी है। सेलाकुई क्षेत्र में फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री का ठिकाना बना है तो मोहकमपुर और रायपुर में भी उद्योगों का जाल बिछा है। शहर, प्रदेश की आर्थिक सिटी बन रहा है। यहां पलाईओवरों के निर्माण की योजनाओं पर भी लगातार काम चल रहा है।
शहर में कई इंजीनियरिंग और तकनीकी संस्थान अस्तित्व में आये हैं। डीआइटी और ग्रेफिक इरा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की तर्ज पर कई गली-मुहल्लों में तकनीकी इंस्टीट्यूट खुल गए हैं, सबमें छात्र-छात्राओं की खासी संख्या है। कुछ ने तो अपना कारोबार काफी बढ़ा लिया है। इसके अलावा पेट्रोलियम युनिवर्सिटी यहां देश में पहली बार विशेष कोर्स का पैकेज लेकर आई है। इसमें पढ़ाई करने अन्य महानगरों से भी छात्र छात्राओं का तांता लगा है। शिक्षा केंद्र के रूप में जाना जाने वाला दून अब इन संस्थाओं का केंद्र बनने का भी प्रयास करता दिख रहा है।


लेखक का परिचय
लेखक देवकी नंदन पांडे जाने माने इतिहासकार हैं। वह देहरादून में टैगोर कालोनी में रहते हैं। उनकी इतिहास से संबंधित जानकारी की करीब 17 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। मूल रूप से कुमाऊं के निवासी पांडे लंबे समय से देहरादून में रह रहे हैं।

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