June 30, 2022

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जानिए हरिद्वार का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व, क्या है वर्तमान स्थिति

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हरिद्वार जिले पर एक नजरः लेखक-देवकी नंदन पांडे
हरिद्वार जिले का कुल भौगोलिक क्षेत्र 2360 वर्ग मीटर है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार इस जिले की जनसंख्या 1890422 है। यह प्राचीन नगर गंगा के दाहिने किनारे पर उस सुन्दर स्थान पर स्थित है, जहाँ गंगा ने शिवालिक पर्वत को काटकर मैदान में प्रवेश करने के लिए बनाया है। विश्व प्रसिद्ध हरिद्वार अपने आप में एक अनोखा मनोहारी पावन मुक्तिधाम है।
इसलिए है मोक्ष धाम
यहाँ हिमालय की पर्वतमालाओं से कल-कल निनाद करती हुई पतित पावनी माँ गंगा की निर्मल शीतल अमृतमयी जलधारा प्रवाहित होती रहती है। इसी गंगा ने कपिल मुनि के श्राप से भस्म हुए इतिहास के सूर्यवंशी महाराज सगर के साठ हजार वीर सूपतों को मोक्ष दिया था। शायद इसीलिए आज भी देश के अधिकांश मृतक के भस्मीभूत शरीर की अस्थियाँ माँ गंगा की मुक्तिदायिनी जलधारा में प्रवाहित की जाती हैं। इस अस्थि विसर्जन परम्परा का उल्लेख चीनी यात्री ह्वेनसाँग ने भी अपनी यात्रा विवरण में किया था।
उत्तराखंड राज्य का महत्वपूर्ण जिला है हरिद्वार
हिमालय के बाद के प्रदेश में सिन्धुतट से 1630 फीट की ऊँचाई पर प्राचीन पावन हरिद्वार नगर अवस्थित है। जो 1988 तक उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में था, तदुपरान्त स्वतन्त्र जिले के रूप में इसने अपना अस्तित्व बनाया। आज यह उत्तराखण्ड राज्य का एक महत्त्वपूर्ण जिला है। हिमाद्री की शिवालिक पर्वत श्रृंखलायें इस मायापुरी को तीनों ओर से घेरे हुए हैं। देश के सभी राज्यों से यह पावन धाम रेल, मोटर एवं वायुयान मार्गों से जुड़ा हुआ है। उत्तरी भारत में वर्ष पर्यन्त प्रायः सबसे अधिक भीड़ इसी तीर्थ में रहती है।


हर पर्व पर यहां स्नान की महत्ता
यहाँ हर छोटे-बड़े पर्व, त्यौहार पर तीर्थयात्रियों का स्नानार्थ मेला लगा रहता है। प्रति बारह वर्ष में महाकुम्भ और छ: वर्ष में अर्ध कुम्भ का विशाल मेला यहीं जुटता है। पावन धाम बदरी-केदार और गंगोत्री-यमुनोत्री यात्रा मार्ग यहीं से आरम्भ होते हैं। रायवाला, डोईवाला, देहरादून, मसूरी,
धरासू से यमुनोत्री-गंगोत्री को मार्ग जाता है।
दर्शीनीय मंदिर हैं हरिद्वार में
गंगाधारा के समक्ष हिमालय की हरी-भरी विविध वनस्पतियों से सघन वन लुभावना नीलपर्वत भी पर्यटकों का मन मोह लेता है। इसके शिखर पर माँ चण्डी देवी का दर्शनीय मन्दिर है। साथ ही वीर हनुमानजी की माता अंजनी देवी का मन्दिर अलग से निर्मित भी कम दिव्य आभा लिए हुए नहीं है। इसी पर्वत पर नीचे की ओर एक प्राचीन शिव मन्दिर नीलेश्वर महादेव के नाम से भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाला है।
पुराणों में वर्णित दक्ष प्रजापति के विशाल यज्ञ में सती जब कनखल आयीं थी तो भगवान शिव ने सती के साथ सुरक्षा के लिए नील नामक गण को भेजा था। उस नील गण ने इस नील पर्वत पर नीलेश्वर महादेव शिवलिंग की स्थापना कर शिव अर्चना की थी। शिव मन्दिर के साथ ही नीचे की और हरिद्वार-नजीबाबाद सड़क पर गौरीशंकर मन्दिर भी प्राचीन शिवालय के रूप में है। कहा जाता है कि भगवान शिव की बारात सती विवाह के समय इसी स्थान पर ठहराई गयी थी।
हरि की पौड़ी का गंगा-स्नान घाट जिसे भक्त व श्रद्धालुजन सीधा मुक्तिधाम मनाते हैं, कुम्भ अर्धकुम्भव पों पर स्नान का मुख्य स्थल है। हर की पौड़ी के दक्षिण की ओर कुछ अन्तर पर कुशावर्तघाट-पितृकर्म तर्पणादि के लिए बना है। जहाँ प्राचीन काल में भगवान दत्तात्रेय जी महाराज ने घोर तपस्या की थी। इनकी तपस्या के समय ही माँ गंगा की जलधारा ने इनके कुश आसन आदि बहाकर भंवर जैसे जलरूप में दर्शन दिए थे। इसी कारण इस गंगा घाट का पौराणिक नाम कुशावर्तघाट लोक प्रसिद्ध हो गया। आज भी यहाँ देश का धर्म परायण तीर्थ यात्री अस्थि विसर्जन के बाद अपने पितरों के श्राद्ध तर्पणादि के लिए श्रद्धाभाव से गंगा स्नान करता है।
महाराज भर्तृहरि ने लगभग दो हजार वर्ष पूर्व गंगातट पर घोर जप-तप करते हुए स्वयं को जीवन मुक्त बनाया था। इस विद्वान धर्मात्मा प्रजावत्सल न्यायकारी महाराजा ने अपने लम्बे सांसारिक जीवन के अनुभव साथ लिये हुए देववाणी संस्कृत का एक लोकप्रिय महान ग्रंथरत्न’ भर्तृहरी नीतिशतकत्रय’ नाम से लिखा जिसमें सौ श्लोक श्रृंगार रस के ओर सौ श्लोक लोकनीति के तथा सौ श्लोक ही वैराग्य भाव में बैठकर लिखे गये हैं। इन्हीं भर्तृहरि का छोटा भाई महाराजा विक्रमादित्य हुआ, जिसने अपने इस बड़े भाई भर्तृहरि की पुण्य स्मृति में ही हरिद्वार के इस ब्रह्मकुंड पर हरकी पैड़ी बनावयी। हर की पौड़ी, कुशावर्त, विल्वकेश्वर, नील पर्वत और कनखल पाँच हरिद्वार के प्रधान तीर्थ हैं।


इस मोक्ष धाम के कुछ प्रमुख एवं पावन क्षेत्र मनसा देवी का मन्दिर जो विल्लव पर्वत पर है, गोरखनाथ का गुफा मन्दिर, विल्वकेश्वर मन्दिर, श्री अयप्पा मन्दिर, काल भैरव का मन्दिर, गीता भवन, मायादेवी का मन्दिर, श्री श्रवणनाथ मन्दिर, मनोकामना सिद्ध हनुमान मन्दिर, नारायणी शिला, दक्ष प्रजापति मन्दिर एवं सती कुण्ड, आर्यवान प्रस्थाश्रम ज्वालापुर, रामकृष्ण मिशन, गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय कनखल, सप्त ऋषि आश्रम एवं सप्त सरोवर, भीमगोडा तालाब, परमार्थ आश्रम, साधुबेला, मानव कल्याणाश्रम कनखल, विष्णु भवन, मनोकामना सिद्ध मन्दिर मायापुरी आदि दर्शनीय स्थल हैं।
धर्मशाला, मठ और आश्रम
हरिद्वार का कुल क्षेत्रफल 12.47 वर्ग किलोमीटर है। इसी में गंगा नदी, गंग नहर, दो-दो पहाड़, बीएचईएल कारखाना, सिडकुल औद्योगिक क्षेत्र के अतिरिक्त 197 धर्मशाला, 108 होटल और गेस्ट हाउस तथा 625 मठ आश्रम हैं। इसी क्षेत्रफल में मुख्य स्नान स्थान हरकी पैड़ी, जो सन् 2004 के अपने पिछले विस्तार के बाद कुल 7200 वर्गमीटर क्षेत्र में सिमटा है।
सांस्कृतिक मिलन का अवसर है कुंभ मेला
हरिद्वार का कुम्भ मेला, भारतवासियों के सांस्कृतिक मिलन का विराट अवसर लेकर आता है। यह पर्व पूर्व दिशा की विराटता का द्योतक भी है। विश्व धरातल पर जब सभ्यता का नामो-निशान भी न था, तब भारत की धरती पर समुद्र मन्थन जैसे कृत्यों की अपूर्व क्षमता थी। समुद्र किसी नदी से मिले, यह सुखद संयोग कुम्भ और अर्द्ध-कुम्भ जैसे मेलों पर हरिद्वार में ही देखा जा सकता है।कम्भ पर्व आयोजित होने का ज्योतिषीय आधार भी है। आकाश को सही पहचान देते हुए इसे पौराणिक उल्लेखों में 27 नक्षत्र एवं 12 राशियों में विभक्त को खगोल शास्त्र से जोड़ते हुए अनेक अवस्थाओं में कम्भ पर्व की घोषणा की है। अपनी कक्षा में भ्रमण करता वृहस्पति जब सिंह राशि पर होता है। और सूर्य मेष राशि पर, तब सर्य की किरणें जल पर विशेष प्रभाव डालती हैं।

इसी तरह जब वृहस्पति, वृषभ राशि पर और सूर्य मकर में प्रवेश करता है। उस समय नदियों में विशेषकर गंगा में जीवनदायिनी ऊर्जा जन्मती है। भूचक्र जो कि 360 अंशों का है उसे पूरा करने में वहस्पति 11.78 वर्ष लगाता है इसलिए कम्भ पर्व हर बारहवें वर्ष मनाया जाता है। 6 वर्षों में बृहस्पति और सूर्य के बीच के चक्र को अर्धकुम्भ कहते हैं।
शिक्षा की दृष्टि से हरिद्वार
हरिद्वार जिले में शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी उत्तराखण्ड के अन्य जिलों की अपेक्षाकृत कहीं अधिक है। यही एक इन्जीनियरिंग कॉलेज, दो मेडिकल कॉलेज, तेरह संस्कृत महाविद्यालय, दो विश्वविद्यालय, तीन पोलिटैक्निकल कॉलेज, सात आई.टी.आई. व सात डिग्री कॉलेज हैं। इनके अतिरिक्त भारत हैवी इलैक्ट्रिकल्स लिमिटेड, केन्द्रीय भवन अनुसंधान केन्द्र रूड़की, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, सिंचाई अनुसंधान रूड़की व तीन चीनी मिलें भी हैं।
गुरूकुल कांगड़ी संग्रहालय
शिक्षित वर्ग एवं विद्यार्थियों की जिज्ञासा की पूर्ति के लिए इतिहास, पुरातत्व, अभिलेख शास्त्र, मूर्तियाँ तथा मुद्रशास्त्र आदि विविध सामग्री संग्रहालय उपलब्ध कराते हैं। इन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर गुरूकुल कांगड़ी के संस्थापक कुलपिता स्वामी श्रद्धानंद जी ने 1907-08 में हरिद्वार में गंगा नदी के किनारे एक पुरातत्व संग्रहालय की स्थापना की। इस पुनीत कार्य में उन्होंने देश-विदेश के भारतवासियों का सहयोग लिया। सन् 1924 तक संग्रहालय पूर्ण रूप ले चुका था, लेकिन इसी वर्ष गंगा में आयी भीषण बाढ़ में संग्रहालय की धरोहरों को नुकसान पहुँचा।
सन 1945 में इस संग्रहालय का पुनर्गठन किया गया। 1950 में गुरूकुल कांगड़ी के स्वर्ण जयन्ती वर्ष में वेद मन्दिर परिसर में इसके कार्यालय की स्थापना की गई। 1972 में संग्रहालय को विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास, संस्कृति तथा पुरातत्व विभाग के अधीन कर दिया गया। 31 अगस्त 1958 को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने भ्रमण के दौरान संग्रहालय व इसके योगदान की भरपूर सराहना की।
इस समृद्ध संग्रहालय में प्रागैतिहासिक अवशेष, विभिन्न कालों में निर्मित पाषाण तथा धातु प्रतिमायें, कांगड़ा व नाथद्वारा शैली के चित्र, गुप्तकाल से लेकर रियासतों तक के सिक्के, अस्त्र-शस्त्र तथा विभिन्न धर्मों से सम्बन्धित विविध प्रकार की सामग्री भी यहाँ विद्यमान हैं। प्रागैतिहासिक सामग्री में मोहनजोदड़ो, हड़प्पा एवं कालीबंगा से संग्रहित वस्तुएँ भी यहाँ प्रदर्शित हैं। इसी काल के ताँबे के हथियार, जो जनपद हरिद्वार के मंगलौर कस्बे के ग्राम नसीरपुर में उत्खनन के दौरान प्राप्त हुए हैं। ईसा से कई सौ वर्ष पूर्व के इन हथियारों में कांटेदार बी, हार्पून्स व कुल्हाड़ी आदि नौ प्रकार के हथियार शामिल हैं।
सिन्धुघाटी सभ्यता मिट्टी की मूर्तियाँ, मृत्तिका पात्र, खिलौने आदि उल्लेखनीय है। मिट्टी की मूर्तियों में मातृदेवी की मूर्तियाँ अपना विशेष स्थान रखती हैं। काली बंगा (राजस्थान) से प्राप्त सामग्री में मृत्तिका पात्रों के टुकड़े, खिलौने व हाथी दाँत से बनाई गयी वस्तुएं सम्मिलित हैं। संग्रहालय की तक्षण दीर्घा में लगभग 350 प्रस्तर एवं धातु निर्मित प्रतिमायें संग्रहित हैं। इनमें कुषाणकाल से लेकर मध्यकाल तक की हिन्दू, बौद्ध तथा जैन मूर्तियाँ शामिल हैं। ये मूर्तियां सुन्दरता के अतिरिक्त भाव-भंगिमा तथा शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट कला की परिचायक है।
गुप्तकालीन मूर्तियों में विष्णु व दुर्गा की दर्शनीय मूर्तियाँ है। यह सभी मूर्तियाँ हरिद्वार के निकटवर्ती क्षेत्रों से संग्रहित की गयी है। संग्रहालय में पुरातन काल के सिक्कों से लेकर रियासतों तक के सिक्कों का संग्रह है। सिक्कों में उत्तर मौर्यकाल के डाले गये सिक्के, इण्डोग्रीक राजाओं की मुद्रा, पश्चिमी क्षत्रपों, कुषाण राजाओं, गुप्तवंशीय राजाओं, कन्नौज के गुर्जर राजाओं, मुगलों, ब्रिटिशकालीन तथा स्वतंत्रता से पूर्व देशी रियासतों के सिक्के शामिल हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास के निर्माण में इन सिक्कों का विशेष महत्त्व रहा है, इनसे तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक दशा का बोध होता है।
गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के इस संग्रहालय में सभी धर्मों के प्रतिवादन करने वाले हस्तलिखित ग्रन्थों के संग्रह का भी प्रयास किया गया है। हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथों में बाल्मीकि कृत रामायण, महाभारत के संस्करण, कश्मीरी लिपि में लिखित प्रार्थना पुस्तक’, बांग्लाभाषा में लिखित ‘देवी स्रोत’ के अतिरिक्त गुरूग्रंथ साहिब व कुरान शरीफ की पाण्डुलिपि को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। संग्रहालय का एक अन्य आकर्षण केन्द्र हैं श्रद्धानन्द कक्ष’। गुरूकुल के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद जी के त्यागमय जीवन तथा राष्ट्रीय आन्दोलन में उनकी सक्रिय भूमिका से परिचय कराने के उद्देश्य से इस कक्ष की स्थापना की गयी है। कक्ष में स्वामी जी के जीवन से सम्बन्धित चित्र तथा महात्मा गाँधी व अन्य राष्ट्रीय नेताओं के साथ प्रकाशित लेख प्रदर्शित किये गये हैं। इस प्रकार यह संग्रहालय उत्तराखण्ड व देश की भावी संतति के लिए लुप्त होती प्राचीन कला व संस्कृति को सुरक्षित रखने का समुचित केन्द्र हैं।
प्राचीन नगरी कनखल
दक्ष प्रजापति की नगरी कनखल। सती की होमस्थली कनखल। प्राचीन समय से ही हिन्दी मतावलम्बियों को आकर्षित करने वाली धर्मस्थली – कनखल। इस प्राचीन नगरी का एक अन्य रूप और है, वह है ऐतिहासिक स्वरूप। राजाओं को विश्रामस्थली के रूप में गढ़ो-सरायों ओर हवेलियों के साथ कभी यह नगरी अपने पूर्ण वैभव के साथ दमकती थी। इसकी गवाही आज भी वे इमारतें व भवन देते हैं जो कि अब प्राय: जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। सन् 1399 में जब तैमूर लंग लूटपाट करने के उद्देश्य से इस ओर आया तो सर्वप्रथम उसने अपने साथियों के साथ कनखल पर ही धावा बोला। यहाँ से सम्पति लूटने के साथ-साथ यहाँ के मन्दिरों, हवेलियों और धर्मशालाओं का विध्वंस भी किया।


कनखल में कभी हवेलियों की थी भरमार
कनखल में कभी हवेलियों और धर्मशालाओं की भरमार थी। विभिन्न रियासतों के राजा-महाराजों ने यहाँ अपने विश्राम के लिए स्थाई रूप से हवेलियों का निर्माण करवाया था। ये हवेलियाँ भी साधारण नहीं थी, बल्कि तत्कालीन स्थापत्य शैली और उनमें स्थाई रूप से हवेलियों का निर्माण करवाया था। उनमें स्थान-स्थान पर उत्कीर्ण कनखल शैली की चित्रकला ने इन हवेलियाँ को एक आकर्षक रंग-रूप प्रदान कर दिया था। ऐसी ही हवेलियों में से एक है – दरभंगा भवन। यह हवेली दरभंगा के महाराजा ने बनवाई थी। इस भवन में चित्रकला के उत्कृष्ट नमूने प्राकृतिक रंगों से उत्कीर्ण किये गये थे। इनमें से कुछ आज भी विद्यमान है।
इसी हवेली के छत पर एक मन्दिर भी है, जिसके स्थापत्य में राजस्थानी शैली का प्रभाव देखने को मिलता है। लेकिन इस मन्दिर की भीतरी दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से जो चित्रकला उकेरी गयी है वह कनखल की मौलिक चित्रकला का नमूना है। जबकि मन्दिर की बाहरी दीवारों पर बनी चित्रकला में बिहार की मधुबनी शैली का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है, जो सम्भवतः महाराज दरभंगा की व्यक्तिगत रूचि को दर्शाती है।
अकबर की टकसाल
सन् 1799 में एक अन्य लंदीरावाली रानी की भी हवेली इस क्षेत्र में निर्मित की गयी थी, जो अब लगभग समाप्त हो ही चुकी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस हवेली के नीचे कभी दो सुरंगे थी। जिनमें से एक कनखल के प्रसिद्ध दक्ष प्रजापति मन्दिर तक जाती थी तथा दूसरी कनखल परिक्षेत्र की सीमा से बाहर तक। इस सुरंग का सम्बन्ध अकबर को टकसाल से भी जोड़ा जाता है। कहते हैं कि अकबर ने इसी क्षेत्र में अपनी टकसाल स्थापित करवाई थी, जहाँ से सिक्के डालकर दिल्ली भेजे जाते थे। इतिहास और कला की दृष्टि से कनखल की भारामल बाग नाम से प्रसिद्ध इमारत विशेष महत्वपूर्ण है।
कनखल के पहाड़ी बाजार में स्थित इस इमारत में दरवाजेनुमा दो हवेलियाँ हैं, जो सड़क के दोनों ओर आमने-सामने स्थित है। इनमें एक हवेली के द्वार पर अंग्रेजों की रूपाकृतियाँ बनी हुई है तो दूसरी हवेली के द्वार पर मुगलों की आकृतियां चित्रित है। इससे स्पष्ट होता है कि इन हवेलियों का निर्माण मुगल व अंग्रेजों के सन्धिकाल में हुआ होगा।
महाराजा रणजीतसिंह के वजीर खुशहाल चंद ने भी यहाँ एक हवेली बनवाई थी। इसे सिरसा वालों की हवेली तथा सिरसा धर्मशाला के नाम से जाना जाता है। इस हवेली में महाराजा रणजीत सिंह अपनी रानियों व दास-दासियों के साथ हरिद्वार भ्रमण के दौरान आकर ठहरते थे। इस हवेली का एक भाग हाथीखाना कहलाता है, जिसमें राजा के हाथी रखे जाते थे। सन् 1809 में इस हवेली की नीलामी हुई और रामसुख दास ने इसे खरीद लिया, तब से इसे धर्मशाला का रूप प्रदान कर दिया गया है।
कनखल में कलसिया हाउस, बड़वाली हवेली और रानी की हवेली आदि भी हैं। परन्तु रख-रखाव के अभाव में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। सिखों के तीसरे गुरू अमरनाथ दास की याद में बनवाया गया गुरूद्वारा अपनी ऐतिहासिक गाथाओं के साथ आज भी शान से सिर उठाए खड़ा है।
अब जानते हैं रुड़की के बारे में
यह हरिद्वार से 30 किलोमीटर की दूरी पर सोलानी नदी के दक्षिणी तथा गंग नहर के दोनों किनारे पर बसा है। गंग नहर के ऊपर निर्मित पुल से मेरठ, मुजफ्फरनगर और देहरादून की ओर मोटर मार्ग है। नहर के पूर्व की ओर सिविल लाइन तथा दक्षिण में छावनी है। गंग नहर के किनारे उत्तर दिशा की ओर की सड़क ज्वालापुर और हरिद्वार को जाती है। रूड़की के पास ही सोलानी नदी पर एक विचित्र पुल निर्मित है जिस पर होकर गंग नहर बहती है। रुड़की नगर प्राचीन है। कहा जाता है कि एक राजपूत सरदार की धर्मपत्नी रूरी की स्मृति में इस नगर का नाम पड़ा।
ब्रिटिश काल में यह एक छोटा सा गाँव था। नहर निर्माण के समय यहाँ लोहे की दलाई और दूसरे व्यवसाय के कार्य आरम्भ हुए। नहर बन जाने पर उस बचे हुए सामान से रूड़की इन्जीनियरिंग कॉलेज की स्थापना हुई। छावनी का आरम्भ 1852 में हुआ तथा 1860 में अंग्रेजी फौज यहाँ रहने लगी।
गंगनहर
अठारवीं एवं उन्नसीं शताब्दी में भारत देश को कई बार अकाल का सामना करना पड़ा। अकाल के कारण कच्चा माल न मिलने से ब्रिटिश उद्योगों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया। अत: अंग्रेजों ने कृषि, सिंचाई तथा परिवहन के साधनों के विकास के लिए अपने अधिकारियों को प्रोत्साहित किया। इसी योजना के तहत अंग्रेजी सरकार ने अपने एक अधिकारी प्रौबी कौटले को पश्चिमी एवं केन्द्रीय उत्तर प्रदेश के सिंचाई के इन्स्पेक्टर जनरल के रूप में भेजा।
प्रौवी कौटले के मस्तिष्क में 1836 में यह विचार उभरने लगा कि हरिद्वार के पास से गंगा नदी से नहर निकालकर प्रदेश के बहुत बड़े भाग को सींचा जा सकता है। उसने हरिद्वार से गंगा नहर निकालने का एक प्रस्ताव सरकार के पास भेजा, अड़चनों के बावजूद प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।
परिणामत: 1842 में गंग नहर की खुदाई का काम आरम्भ हुआ। गंग नहर का जो प्रारम्भिक
डिजाइन बनाया गया उसके अनुसार मुख्य नहर एवं इसकी शाखाओं की कुल लम्बाई 912
किलोमीटर तथा इसके रजवाहों की कुल लम्बाई 5840 किलोमीटर थी। मुख्य गंग नहर की प्रवाह क्षमता 6750 घनफुट प्रति सेकण्ड थी। इसके तल की चौड़ाई 140 फुट तथा प्रवाह की गहराई 10 फुट रखी गयी थी। नहर के तल की ढलान डेढ़ फुट प्रति मील थी।
नहर का कुल कमांड 14 लाख 75 हजार एकड़ था, किन्तु सिंचाई कुल क्षेत्र के 45 प्रतिशत क्षेत्र के लिए ही सीमित की गई थी। इस प्रस्तावित योजना के मात्र डिजायन में परिवर्तन कर नहर की प्रवाह क्षमता दस हजार पाँच सौ घनफुट प्रति सेकण्ड कर दी गयी। हरिद्वार के मायापुर से रूड़की तक 30 किलोमीटर का क्षेत्र बड़ा विकट था। इसके मध्य रानीपुर राव तथा पथरी राव नामक दो पहाड़ी नाले तथा सोलानी व रतमऊ नामक दो नदियों को पार करके ही नहर को आगे ले जाया जा सकता था। कोटले ने इस बाधा पर विजय प्राप्त करने की ठानी और अपने अथक प्रयासों से विजय भी प्राप्त की।


कोटले ने रानीपुर और पथरी नालों के नीचे से नहर निकाली, रतमऊ नदी पर लेबल-क्रासिंग बनाया तथा रूड़की के पास सोलानी नदी के ऊपर कृत्रिम जलमार्ग निर्मित करके तत्कालीन सिविल इन्जीनियरी का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। गंग नहर के आठ किलोमीटर पर पड़ने वला रानीपुर राव लगभग दो सौ फुट चौड़ा है। इसमें वर्षा ऋतु में अधिकतम जल प्रवाह 28 हजार घनफुट प्रति सेकण्ड है। कौटले ने सुपर पैसेज बनाकर नीचे से नहर और ऊपर से नाले को निकालने की व्यवस्था की।
गंग नहर के चौदहवें किलोमीटर पर पथरी राव पड़ता है। कौटले ने 296 फुट चौड़ा सुपर पैसेज बनाकर इससे नहर और ऊपर से राव को निकालकर जाने दिया। नहर के बीस किलोमीटर पर धनौरी गांव के पास रतमक नदी बहती है। यहाँ नदी और नहर की सतह एक ही है। कौटले ने धनौरी में रतमऊ पर 766 फुट का लेवल क्रासिंग बनवाया, जिसमें से 80 हजार घनफुट प्रति सेकण्ड पानी बह सकता है।
साढ़े दस फुट के अन्तराल पर 57 महराबदार स्तम्भों वाले इस लेवल क्रांसिग का कुछ हिस्सा 1924 की बाढ़ में बह गया था, जिसकी मरम्मत कर दी गयी थी। गंग नहर के 29वें किलोमीटर पर इसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थल आता है। यहाँ नहर सोलानी नदी के ऊपर से ले जायी गयी है। कौटले ने सोलानी पर 890 फुट लम्बा और 175 फुट चौड़ा कृत्रिम जलमार्ग निर्मित करके नहर को इसके ऊपर से गुजारा।
कृत्रिम जलमार्ग का अद्भुत उदाहरण
सोलानी कृत्रिम जल मार्ग तत्कालीन अभियांत्रिकी का अद्भुत उदाहरण है। यह जल मार्ग 175 फुट चौड़ा नाद, पचास फुट वाले पन्द्रह महराबों पर टिका हुआ है। इस कृत्रिम जल मार्ग से गंग नहर में पानी सन् 1854 के आठ अप्रैल को प्रात: आठ बजे प्रवाहित हुआ। रूड़की के लिए यह एक ऐतिहासिक दिन था। धनौरी के नीचे कलियर के समीप से नहर निम्न धरातल-क्षेत्र से गुजरती है। कौटले ने मेहवड़ से लेकर रूड़की तक लगभग पाँच किलोमीटर नहर-मार्ग के दोनों और ऊँचे तटबन्ध बनवाये। नहर में उतरने के लिए इसके दोनों और सीढ़ियाँ बनवाई।

यह सीढ़ियाँ कृत्रिम जलमार्ग के पास नहर के तलहटी के पास तक बनाई गयी है। मेहवड़ से रूड़की तक के लगभग पाँच किलोमीटर तक गंग नहर के निर्माण में कौटले ने अभियांत्रिकी ज्ञान लगा दिया। मेहवड़ पुल के समीप से लेकर रूड़की तक जहाँ से नहर के दोनों ओर सीढ़ियाँ बनाई गईं, दोनों स्थानों पर नहर के दोनों ओर विशालकाय सिंह मूर्तियों का निर्माण कराया गया। मेहवड़ में दोनों सिंह मूर्तियों का मुख नहर के प्रवाह की विपरीत दिशा में और रूड़की में दोनों सिंह मूर्तियों का मुख प्रवाह की ओर है। इसी प्रकार की पाँचवी सिंह मूर्ति कौटले के निवास के पास बनाई गयी, जो वास्तव में उक्त चारों मूर्तियों के मूलरूप के तौर पर बनाई गयी थी।
चारों सिंह मूर्तियाँ सोलानी जलमार्ग के रक्षा प्रतीक के रूप में बनाई गयी थी। ये मूर्तियाँ स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण है। इनके गौरवपूर्ण विशाल आकार, सावधान मुद्रा में बैठना तने हुए पंजे, उठा हुआ सिर, भय और क्रूरता से मुक्त विश्वासपूर्ण आँखें हर देखने वाले का मन मोह लेती है। वास्तव में प्रौबी कौटले आधुनिक भागीरथ थे, उन्होंने गंग नहर का निर्माण करके लाखों करोड़ों धरती-पुत्रों का उद्धार किया है। रूड़की उनकी कर्मस्थली व प्रेरणा का स्रोत रहा है।
रूड़की विश्वविद्यालय
हिमालय पर्वत श्रृंखला की तलहटी और गंग के पावन तट पर बसा रूड़की विश्वविद्यालय सन् 1847 से राष्ट्र के उत्थान के लिए अपनी सेवायें समर्पित कर रहा है। सरस्वती के इस मंदिर की पूर्ववर्ती संस्था थामसन कॉलेज ऑफ इन्जीनियरिंग की स्थापना गंग नहर के निर्माण और रख-रखाव के लिए हुई थी। रूड़की का नगर के रूप में भाग्योदय गंग नहर के निर्माण के बाद हुआ। शीघ्र ही यह नगर अभियांत्रिकी गतिविधियों का केन्द्र बन गया। उसी काल में जेम्स थामसन ने रूड़की में देश के जन निर्माण हेतु सैनिक अभियन्ताओं के लिए सिविल अभियांत्रिकी कॉलेज बनाने का प्रस्ताव रखा। इस कार्य में गंगा-यमुना प्रक्षेत्र के सिंचाई प्रखण्ड के प्रमुख अभियन्ता कर्नल कौटले ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।
9 जनवरी 1847 को इन्जीनियरिंग कॉलेज की आधारशिला रूड़की कॉलेज के रूप में रखी गयी। इसमें सिविल इंजीनियरों के पाठयक्रम तीन स्तर पर निर्धारित किये गये – इंजीनियर्स, ओवरसीयर्स तथा जन निर्माण के लिए अवर सर्वेक्षणकर्ता। वर्ष 1853 में भारतीय दृष्टा, परिश्रमी तथा इस कॉलेज के संस्थापक जेम्स थामसन के निधन के बाद इसका नाम थामसन कॉलेज ऑफ इन्जीनियरिंग’ रख दिया गया। वर्ष 1910 तक इस कॉलेज का भारतीयकरण
सम्भव हो पाया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1948 के पूर्वार्ध में रूड़की विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया गया तथा संस्तुतियों के आधार पर इसे विश्वविद्यालय का स्तर प्रदान किया गया व पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विश्वविद्यालय को चार्टर प्रदान किया। तब से यह संस्था राष्ट्र उत्थान के कार्यों में तल्लीन है।
विश्वविद्यालय के शैक्षिक पाठयक्रमों में इन्जीनियरी और आर्किटेक्चर के दस स्नातकीय पाठ्यक्रम, कागज प्रौद्योगिकी संस्थान के पल्प व पेपर तथा प्रोसेस इन्स्ट्रमेन्टेशन में दो विश्वविद्यालय डिप्लोमा, इंजीनियरी, विज्ञान एवं आर्किटेक्चर में 55 स्नातकोत्तर स्तर के 36 कार्यक्रम व 6 स्नातकोत्तर डिप्लोमा सम्मिलित है। इसके अतिरिक्त इन्जीनियरिंग व विज्ञान मानविकी एवं समाज विज्ञान में पी.एच.डी. उपाधि हेतु शोध कार्य जारी है।
देश में उच्च तकनीकी शिक्षा प्रदान करने वाले 120 विश्वविद्यालय एवं संस्थानों पर किये गये अध्ययन में रूड़की विश्वविद्यालय को विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के सैक्टर सेवायोजन में श्रेष्ठ निष्पादक का स्थान दिया गया है। इस विश्वविद्यालय में 17 शैक्षिक विभागों की इकाइयाँ, 23 शोध केन्द्र तथा 7 अन्य इकाइयाँ संचालित की जा रही है, जो आई.आई.टी. दिल्ली व कानपुर के अपेक्षाकृत डेढ़ गुनी अधिक है। इसी प्रकार विद्यार्थियों की संख्या व वर्ष में प्रदान की जानी वाली डिग्रियों के आधार पर रूड़की विश्वविद्यालय देश के अन्य आई.आई.टी. के समकक्ष है। विश्वविद्यालय अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कई अंतर्सहयोगी शोध कार्यक्रमों पर भी कार्यरत है।
विश्वविद्यालय में विज्ञान व इन्जीनियरिंग के विभिन्न विभागों में एशिया व अफ्रीका के 27 देशों के दो सौ से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत रहते हैं। विश्वविद्यालय के छात्र व प्राध्यापकों ने अनेक गौरवशाली कीर्तिमान स्थापित किये हैं। इस विश्वविद्यालय में 1958 में सिविल इन्जीनियरी डिग्री प्राप्त करने वाले डॉ. लोनी के. सेठ ने त्रिनिडाड व टोबेगो के राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी का निर्वहन करते हुए देश के उप-प्रधानमंत्री पद को सुशोभित किया।

विश्वविद्यालय के डॉ.ए.एन. खोसला, डॉ. घनानन्द पाण्डे, डॉ. एम.आर.चोपड़ा, डॉ. जयकृष्णा, डॉ. एच सी. विश्वेश्वरैया व डॉ. एस.के. जोशी को पद्म विभूषण, पद्म भूषण व पद्मश्री आदि सम्मानों से भारत सरकार ने सम्मानित किया है। इनमें डॉ. डी.एन. खोसला उड़ीसा के गर्वनर, डॉ.एस. के खन्ना वाइस चेयरमैन यू.जी.सी. व चेयरमैन ए.आई.सी.टी.ई. आदि महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन रहे हैं।
उद्यमिता विकासको नये आयाम प्रदान करता स्टेप’
रूड़की विश्वविद्यालय शिक्षा के साथ-साथ उद्यमिता विकास की दिशा में भी सार्थक प्रयास कर रहा है। विश्वविद्यालय की संस्था ‘स्टेप’ उद्योगों व विश्वविद्यालय के बीच की एक कड़ी है। भारतीय उद्योग महासंघ (सी.आई.आई.) व विश्वविद्यालय के मध्य हुए समझौते के बाद उद्यमिता विकास उत्तरोत्तर वृद्धि पर अग्रसर है। ‘स्टेप’, की स्थापना भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से रूड़की विश्वविद्यालय में 1987 में स्थापित की गयी।
यह संस्था औद्योगिकी क्षेत्र में शोध तथा विकास गतिविधियों में सक्रिय है। स्टेप नई औद्योगिकी इकाइयों को पुनर्जीवित करने, उनको संचालित करने के लिए उद्यमियों को बुनियादी सुविधायें भी उपलब्ध कराती है। ‘स्टेप’ वी.एच.ई.एल. हरिद्वार सहित अनेक स्वदेशी उद्योगों की परामर्शदात्री के रूप में कार्य कर रही है। यह संस्था आई.एस.ओ. 9000 क्वालिटी सिस्टम बिल्डिंग की आधुनिक तकनीक, आटोमेशन ऑफ आर्गनाइजेशन एण्ड इण्डस्ट्रीज तथा अवशेष पदार्थों से बहुमूल्य तत्वों की प्राप्ति पर आधारित प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन भी संचालित कर रही है।
बंगाल इन्जीनियरिंग ग्रुप एण्ड सेण्टर (बी.ई.जी.) सड़की
भारतीय सेना की परम्परा के गौरवशाली प्रतीक बंगाल सैपर्स की स्थापना 1808 में कैप्टन थामस ने कानपुर में ‘बंगाल पायनियर्स’ के नाम से की थी। सन् 1819 में बंगाल पायनियर्स का संगम हुआ और दोनों को मिलाकर बंगाल इंजीनियरिंग ग्रुप एण्ड सेण्टर अस्तित्व में आया। तभी से यह इन्जीनियरिंग केन्द्र रूड़की में ही कार्यरत है।
स्वाधीनता के पूर्व तक बंगाल सैपर्स का कमान्डेन्ट अंग्रेज अधिकारी ही होता था लेकिन स्वाधीनता के बाद पहले भारतीय कमान्डेन्ट कर्नल जे.एस.ढिल्लों बने, जिन्होंने 26 जनवरी 1950 को प्रथम गणतंत्र परेड का नेतृत्व किया। बी.ई.जी. के जवानों व अधिकारियों ने वीरता के अनेक कीर्तिमान स्थापित किये हैं। सन् 1953 में लम्बी पदयात्रा के बाद बंगाल सैपर्स लुधियाना से रूड़की आया और उसके अग्रिम दस्ते ने एक पीपल वृक्ष के नीचे पड़ाव डाला।
बाद में इस स्थान पर सेना के जवानों ने एक अनूठा मन्दिर ‘फौजेश्वर मन्दिर’ का निर्माण किया। यह एक उदाहरणीय मन्दिर है, जो हिन्दी, सिख, मुस्लिम, ईसाई सभी जवानों का अराधना स्थल है। स्वतंत्रता के बाद 1948 के जम्मू कश्मीर युद्ध अभियान से लेकर श्रीलंका में शांति सेना अभियान में बी.ई.जी. ने अहम भूमिका निभाई है। 1971 में भारत-पाक युद्ध में पाकिस्तानी सेना के एक लाख सैनिकों को भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कराने का श्रेय बी.ई.जी. को ही जाता है। रक्षा मामलों में ही नहीं, अपितु देश की प्राकृतिक आपदाओं के दोरान राहत कार्यों में भी थी.ई.जी. की भूमिका सदैव सराहनीय रही है।
बी.ई.जी. संगठन की सम्मान तथा पदक प्राप्त करने की एक शानदार परम्परा रही है। इस संगठन ने अबतक ‘राष्ट्रपति प्यार’ के अतिरिक्त 80 युद्ध पुरस्कार, 11 विगेटर पुरस्कार, 1 पदभूषण, 13 परम विशिष्ट सेवा पदक, । कीर्ति चक्र, 2 वीर चक्र एक पदमश्री, 3 अतिविशिष्ट सेवा पदक, शौर्य चक्र, सेना पदक, 65 विशिष्ट सेवा पदक, 4 जीवन रक्षा पदक, 4 युद्ध सेवा मेटल य: अर्जुन पुरस्कार प्राप्त किये है। आजादी के पूर्व भी 11 विक्टोरिया क्रास, 63 मिलिट्री कास, इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट प्राप्त किये है। युद्ध एवं शांति के समय राष्ट्र की एकता, प्रभुसत्ता और अखण्डता की रक्षा में सदैव तत्पर रहने वाले सौर्यशाली बंगाल सैपर्स को आज भी अपने वीर सेनानी स्वेदार सिंह को वीरता पर गर्व है, जिसने स्वाधीनता से पूर्व
अपने अपूर्व साहस तथा शौर्य के लिए पूरे भारत में प्रथम इण्डियन आर्डर ऑफ मेरिट’ नाम का वीरता सम्मान प्राप्त किया था। भारत के राष्ट्रपति आर. बैंकटरमन ने 12 जनवरी 1989 को बी.ई.जी. को ध्वज प्रदान कर उस वीर की गरिमा को बढ़ाया था। बी. जी. के मुख्यालय के ठीक सामने विशाल परेड मैदान है, इसी के समक्ष स्थित है युद्ध स्मारक संगठन के गौरवपूर्ण, शौर्यपूर्ण इतिहास का परिचायक । इस युद्ध स्मारक का निर्माण 1839 में अफगानिस्तान के गजनी किले को ध्वस्त करने के पश्चात् स्मृति स्वरूप किया गया था।

इस अभियान सहित विभिन्न मोचों पर हुए शहीद सैपर्स की स्मृति में निर्मित इस युद्ध स्मारक में गजनी युद्ध के अलावा द्वितीय विश्व युद्ध एवं इसके बाद 1962, 1966 एवं 1971 की लदायों में देश सेवा में शहीद हुए बी.ई.जी. के सेनिकों व अधिकारियों के नाम अंकित है। बी.ई.जी., सैनिकों व अधिकारियों का प्रशिक्षण संस्थान है। सेना की तीन बटालियनों को एक साथ प्रशिक्षण दिया जाता है। यहाँ का प्रशिक्षित सैनिक, इंजीनियर तथा जवान दोनों को भूमिका निर्वहन करने में सक्षम होता है।


आई.आई.टी. सड़की
21 दिसम्बर 2001 को संसद में एक विधेयक पारित कर केन्द्र सरकार ने रूड़की विश्वविद्यालय को भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) में परिवर्तित कर दिया। इस समय संस्थान के दो परिसर है। 256 एका में कीले रूड़को परिसर के अतिरिका उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जनपद में संस्थान का पेपर तकनीक विभाग स्थित है।
देश का यह एक मात्र ऐसा संस्थान है, जहाँ भूकम्प इंजीनियरिंग का अलग भाग है। इसके अर्थ साईम विधान में सैटेलाइट अर्थ स्टेशन भी देशका केवल ऐसा केन्द्र है,जहाँ प्रतिदिन सैटेलाइट से आंकड़े प्राप्त करने के उपरान्त उनका उपयोग भूकम्य अध्ययन में किया जाता है।
कलियर
रुड़की से लगभग आठ किलोमीटर उत्तर में गंग नहर के बायें किनारे पर स्थित गाँव कलियर है। गांव के उत्तर-पूर्वी सिरे पर एक बड़ी मजार औचे टीले पर निर्मित है। टोले के उत्तर एवं पूर्व की और कुछ दूरी पर खेत है। टीले के समीपस्थ खेतों में विभिन्न आकार प्रकार के नाकाशीदार मिट्टी के बरतनों के टुकड़े यदा कदा मिलते रहते हैं।
वे अवशेष इस क्षेत्र की प्राचीनता को दर्शाते हैं । टोले के नीचे प्राचीन काल की इंटं दबी हुई दिखती है। स्थानीय लोगों का मत है कि यहाँ कपाल का किला था। राजा कर्णाल महाराजा विक्रमादित्य का परवी माना जाता है। कलियर गाँव के पश्चिम में एक अन्य मजार सूफी हजरत अलाउद्दीन अली अहमद ‘साविर’ की है। हजरत साबिर और इमामुद्दीन की मजार के अतिरिक्त वालों के लिए यह कलियर बाबा की मजार है। इन मजारों में सर्वाधिक मान्यता साबिर की मज़ार को मिली हुई है। यहाँ प्रतिवर्ष उर्म का मेला लगता है।
कलियर के बारे में इतिहास के पृष्ठों में कोई वृत्तान्त पढ़ने में नहीं आता। इसके बारे में अहमद खाँ शोला बदायूंनी द्वारा लिखी गयी पुस्तिका ‘तजकिरह साबरी’ कुछ प्रकाश डालती है। शोला बदायूंनी की पुस्तिका के अनुसार सन् 283 में राजा कर्णपाल ने यहाँ एक शहर बसाया था, यह
उस समय हरिद्वार क्षेत्र की राजधानी था। इस नगर में एक विशाल मन्दिर था, जिसमें तीन हजार सोने-चाँदी की मूर्तियों के अतिरिक्त एक हजार पत्थर की भी मूर्तियां थी।
राजा कर्णपाल के वंशज विक्रमपाल ने मंदिर की सुरक्षा हेतु पाँच हजार सैनिक भी नियुक्त किये थे। सन् 1106 में कल्यणपाल यहाँ का राजा बना, जिसने शहर का नाम कल्याण रख दिया। आचार्य शंकर ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘सौदर्य लहरी’ में कल्याणी नामक नगरी का उल्लेख मायापुर (हरिद्वार) के निकट किया है। कल्याणी ही शायद कालानार में कलियर कहलाया होगा।


शोला बंदायूनी की कृति ‘तजकिरह साबरी’ के अनुसार पहली बार कलियर का विनाश कयामुद्दीन ने हिजरी सन् 604 में किया। उसके छियालिस वर्ष बाद साबिर की क्रोधग्नि कलियर के विनाश का कारण बनी। जब कलियर आध्यात्मिक सम्पन्नता के चरमोत्कर्ष पर था, तो इसकी खबर बाबा फरीदुद्दीन अली अहमद साबिर तक भी पहुंची, उन्होने अपने तपस्वी शिष्य अलाउद्दीन अली अहमद साबिर जो कि पहुँचे हुए फकीर थे, को कलियर के
तत्कालीन काजी तबरक और कयामुद्दीन के नाम पत्र लिखकर भेजा। पत्र की इबारत के अनुसार साबिर को कलियर की इमामत सौंपने का आदेश था, परन्तु काजी ने साबिर को कलियर की इमामत सौपना तो दूर, पत्र भी फाड़ दिया। साबिर ने इसे गुरू का अपमान समझ अपनी आध्यात्मिक शक्ति के बल पर क्रोधाग्नि के वशीभूत कलियर को राख कर दिया तथा स्वयं गूलर के वृक्ष के नीचे खुदा की इबादत में लीन हो गये। उनको मृत्यु पश्चात् दो सौ वर्षों तक कलियर वीरान रहा।
दौ सौ वर्ष के पश्चात् कलियर में हिजरी सन् 907 में हजरत अब्दुल कादिर अब्दुल कुदुस गंगोही ने जियारत के लिए यहाँ आने का साहस जुटाया। उन्होंने साबिर की रूह की इजाजत लेकर उनका रोजा तैयार किया और प्रत्येक वर्ष यहाँ आते रहे। तभी से प्रत्येक वर्ष माह रबीउल अब्बल की ग्यारहवीं तिथि से चौदहवी तिथि (अगस्त माह का अंतिम सप्ताह) तक साबिर का उर्स मनाया जाता है। साबिर के उस के दौरान एक विशाल मेला लगता है। उसमें भाग लेने के लिए विदेशों से भी श्रद्धालु पहुँचते हैं।


लेखक का परिचय
लेखक देवकी नंदन पांडे जाने माने इतिहासकार हैं। वह देहरादून में टैगोर कालोनी में रहते हैं। उनकी इतिहास से संबंधित जानकारी की करीब 17 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। मूल रूप से कुमाऊं के निवासी पांडे लंबे समय से देहरादून में रह रहे हैं।

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