July 1, 2022

Lok Saakshya

Jan Jan Ki Awaj

लेखक महेशा नंद की गढवाली कथा डडवार का हिन्दी रूपांतरण

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(उत्तराखंड के सभी शिल्पकारों का प्रतिनिधित्व करती हुई यह कथा पूर्णतया काल्पनिक है। किसी से संयोग होने पर उसे मात्र संयोग समझा जाए।)

डडवार
पाल गाँव अनेकों जातियों का गाँव। यहाँ के थे सौंणू और जीणू दो भाई। ढोल सागर के जानकार ढोलिया। सैकड़ों क्षेत्रों में इनकी प्रसिद्धि थी। लोग इनको विवाह-शादियों में तो बुलाते ही थे, साथ ही अनेक शुभ अवसरों, पूजा अनुष्ठानों में आमंत्रित करते थे। सौंणू के गले में तामा बिजैसारी ढोल (दो ताँबे की मेखलाओं, जिसे पीतल की पट्टी से जोड़ा गया है तथा जो पूजनीय है।) खिलौना बना रहता था। सौंणू ने कोई जागर (गेय देव गाथा) गायी नहीं कि द्यब्ता (वे व्यक्ति जिन पर देवता अवतरित होता है) एक कोस से नाचते-नाचते आते थे। लय-ताल कर्णप्रिय और मीठी।
वह रामायण-महाभारत की गाथाएं जड़-सोधना (गम्भीर चिंतन के पश्चात) से गाता था। ढोल बजाने के उन्हें रुपये-पैसे नहीं मिलते थे। नाळ-पाथी (जमींदारों की सेवा करने के बदले में मिलने वाला अनाज जो किलो-दो किलो की मात्रा में होता है।) पर उलझाए हुए थे। किसी समय कोई शराबी ढोल के ऊपर रुपया, दो रुपया रख लेता था। डड्वार (राजपूत जमींदार द्वारा फसल के समय अपने भूमिहीन सेवकों को दिया जाने वाला अनाज, जिसके एवज में वह शिल्पकारों से अपनी मनचाही सेवा करवाता था। यह डडवार इतना होता था, जिसको खा कर जिंदा रहा जा सकता था।) पर उनका परिवार जीवित था।
दर्जी का काम भी करते थे। तब भी उनके खाने-पीने के बुरे दिन रहते थे। ईश्वर का न जाने कैसा अभिषाप दिया हुआ था। भूख से उनकी खाल सूखती ही रहती थी। ह्रास था किन्तु बरकत नहीं होती थी। कोदो के पिंड और सवां के भात के लाले पड़ जाते थे। शराबी भी सौंणू नहीं था। आज से तीस-चालीस साल पहले टिंचरी बिकती थी। टिंचरी वही पीते थे जो अमीर लोग होते थे। विवाह में कोई फौजी एकआध पैग चखा देता था- ढोल की ताल के साथ मस्त होकर नाचने के निमित्त।
सौंणू के थे तीन बेटे और तीन बेटियां। परिवार बड़ा और सहारा गैख (जमींदार) पर। चैत्र माह में माँगे गए पसरु (औजी शिल्पकारों को जमींदारों के घरों में सारे चैत्र माह की चिलचिलाती धूप में अनाज माँगने के लिए ढोल बजाना पड़ता था। उनकी प्रशंसा के गीत गाने होते थे। देवी-देवताओं का आह्वान करना होता था।) से समय कटता था। श्रावन-भाद्रपद के आते-आते चैत्र में माँगे गए अनाज की चुटकी निकाल-निकाल कर खा ली जाती थी। बरसात में खाने-पीने के लाले पड़ जाते थे।
विवाह के दौरान कंटळम् (राजपूतों की शादियों में शिल्पकारों को खुश रखने के लिए चावल, गुड़, दाल आदि दिया जाता है। इसकी मात्रा लगभग दो से पाँच किलो होती है।) जो अनाज मिलता था, वह दो दिन के लिए भी नहीं होता था। अपनी गैखि (पहाड़ी शिल्पकारों औजी, मिस्त्री, लोहार, ठठेरा, हलिया के अपने-अपने जमींदार ग्राहक होते हैं।) में जब वे सिले हुए कपड़े देने जाते, तब जमींदारिन बहुत भेद-भाव करती थी। आंगन के नीचे सग्वड़म्, (घर से लगा खेत, जिसमें सब्जियां बोयी जाती हैं) खुबानी के पेड़़ के नीचे खाने के कौर खिलाती थी।
औजी, मिस्त्री और लोहार के लिए कुत्ते की तरह एक थाली सीढ़ियों पर बने आले में रखी रहती थी। जो भी आता, उस थाली में जमींदार के घर में खाना खाता था। भूख भले-बुरे कर्म करा देती है। चाय भी जानबूझ कर पिलाते थे। अपने घर में जूठे बर्तन धुलवाने में जो आत्माभिमान होता था, वह संसार के किसी काम में नहीं होता था। हृदय में ठंडक पड़ती थी। लाचार जो होते हैं, वे अपनी टोपी दूसरे के पैरों तले हाथ जोड़कर चुपचाप रख देते हैं। डर और भूख के मारे, मुख मुलाहिजा करना सौंणू की आदत में सुमार हो गया था। लोकोक्ति बना दी समझदार ने- मुलाहिजा जो करना सीख गया, उसका परिवार बर्बाद हो गया।
पूजा अनुष्ठानों में ढोल बजाते समय मार अलग खानी पड़ती थी। अपशब्द, माँ-बहन की गालियां जमींदार देता ही रहता था। जमींदार अपमानित करे, यह उसका अधिकार था और तिरस्कृत होना इसका जन्मजात धर्म हो गया। जहाँ पर भी रहा, हाथ जोड़े खड़ा रहा। जमींदार को और क्या चाहिए था। एक बार डर हृदय में बैठी थी, वह बैठी ही रह गयी। डडवार की खातिर वह दग्ध होता रहा। फिर भी सौंणू ने ढोल बजाना नहीं छोड़ा। बिर्ति (जीविकोपार्जन के लिए जमींदार के कार्य करना) को सीने से लगाए रहा। जिस प्रकार मछलियों को चाहे कितना ही क्यों न धो लो, उनकी गंध नहीं जाती, उसी तरह जमींदार के हृदय का मैल नहीं बहा। न ही सौंणू की डर भागी। जात बड़ी है तो दुष्कर्मी भी पूजनीय होता है। सौंणू भला आदमी था, किन्तु जात का छोटा। सिर के ऊपर जमींदारों का पैर सदा ही रहा।
ईश्वर ने बुद्धि तो अच्छी दी थी। किन्तु जन्म के पश्चात उस पर भूसा भर दिया। चतुर लोगों ने अक्षर बांचे और इसके लिए कहा- तू पढ़कर क्या करेगा ? अमर रहें वे पित्र जिन्होंने मौखिक रूप से रामायण, महाभारत की कथाएं, ढोल सागर, अड़दास, तंत्रमंत्रादि, जागर, देवस्तुति, मंगलगीत, (थड़िया, चौंफला, झुमैला द्यूड़ा- उत्तराखंडी लोकगीत) जैसे गीत समझा दिये थे। अनपढ़ रह कर भी इन्होंने पढ़ा। यदि पढ़ाये जाते तो ढोल सागर और अन्य शिल्पों के यहाँ ग्रंथ होते। संसार में जितने भी वाद्य यंत्र हैं, उनका जन्म इसी ढोल से हुआ। उन्होंने (जमींदारों ने) इसे नाचए जाने की वस्तु माना। ढोल बजाने वाले को ‘दास’- जो भूख के आगे लाचार है। उसके लिए जो जी में आए बखो- जोड़े-जूते। जमींदार अपनी जाति की पताकाएं लहराता रहा, सौंणू अपनी जात छुपाता रहा। इस जाति के पीछे उसे किसने नहीं दुत्कार। जातियों की चोटियां बटे, भूसा बुद्धि के पत्थर बने रहे।
बचनसिंह की बेटी की शादी में सौंणू और जींणू ने उदयसिंह की बेहद मार खायी। उद्दी ने इन्हें चोटिल होने तक मारा। बात मट्टू जमींदार ने बिगाड़ी। मट्टू ने जींणू को जी भरकर कच्ची शराब पिला दी। मेहमानों की आवा-भगत के दिन सारे पाहुने आंगन में नाचने के लिए एकत्रित हुए थे और जींणू गली में लम्बा लेटा हुआ था। सभी इनको कुचलने के लिए उध्दत थे। जूते खाए जाएंगे, पहले इज्जत बचाओ की स्थिति थी। सौंणू जींणू को पकड़-पकड़कर लाया तो सही, किन्तु वह दमाऊँ (ढोल के साथ बजाया जाने वाला छोटा नगाड़ा) बजा ही नहीं पाया।
पाहुनों ने सौंणू की आफत निकाल दी। बचनसिंह उसे अपमानित करते हुए बोला- ‘सुअर का बच्चा साला! अबे, डडवार माँगते समय तेरी घरवाली आंगने में चादर फैला देती है। जब ढोल बजाने की नौबत आती है, तब तुम्हारे ये हाल हैं। सौंणू! तू स्वर्ग जा चाहे पाताल, तू दमायाँ (छोटा नगाड़ा बजाने वाला) ला। नहीं तो तेरी खैर नहीं। मेरे पाहुनों ने फिर कब नाचना है ?’
खुशहाल सिंह की पत्नी ईर्ष्यालु थी। कहती है- ‘अरे, इनके दिमाग चढ़ गए हैं। अकाल पड़ेंगे। (ऐसा जमींदार तब कहते हैं जब कोई शिल्पकार कोई ऐसा कार्य कर दे जो उनके लिए स्वीकार्य नहीं।) शराब पीने की कितनी बड़पनायी आ गयी इनमें!’
सौंणू ने ढोल छौंदंणम् (जूठे वर्तन धोने के स्थान में) रखा और जींणू को घसीटते हुए घर लाया। उसका मन बेचैन हो गया। आधी रात में दमायाँ कहाँ से लाए ? गाँव में ये चार ही परिवार थे। बिन्नादास और छवंणूदास बारात में ढोल बजाने दूसरे गाँव गए थे। सौंणू का बड़ा लड़का मनसाराम सयाना था। मनसाराम को विवाह-शादियों में जाने का कटु अनुभव हो गया था। उसका साफ इन्कार किया हुआ था कि वह कभी भी गले में ढोल नहीं डालेगा। एक बार वह अपने पिता के साथ दमाऊँ बजाने ब्राह्मणकोट गया था।
वहाँ शराबियों ने दोनों पिता-पुत्र की ऐसी बेइजत्ती की थी कि मनसाराम को अपने जीवन से ही घृणा हो गयी थी। उसने अब इतिहास पढ़ लिया था। उसकी आँखें खुल चुकी थी। उसने कितनी ही बार ढोल को फोड़कर कचरे के पहाड़ से नीचे गिरा दिया था। सौंणू उतनी ही बार उसे उठाकर घर लाया। उसका इस ढोल के परताप खाया हुआ था। ढोल का ऐसा अपमान नहीं सह पाता था। चाहे उसको कोई कितना ही मार क्यों न ले। कोई शराबी जब ढोल पर हाथ लगाता, उसका खून खौल जाता था। यदि उसमें शारीरिक क्षमता होती, वह उस आदमी को चीर-फाड़ देता। वह जब बारात से लौटता, ढोल को निरंकार (पहाड़ी शिल्पकारों का देवता) के देवस्थान में रख देता था।
सौंणू का छोटा लड़का था जयराम। आज्ञाकारी पुत्र था। एक-दो बार वह संक्रांति बजाने (गढ़वाल क्षेत्र में इन वादकों को महीने की समाप्ति की सूचना देने प्रत्येक जमींदार के घर में दमाऊँ बजाने जाना पड़ता था।) गाँव में जा चुका था। जिसका पिता करीगर होगा, उसका बेटा अपने पैतृक व्यवसाय को पेट से ही सीख कर आता है। जयराम को कह दिया सौंणू ने। मन तो उसका भी नहीं कर रहा था कि जयराम उसके साथ दमाऊँ बजाने जाए किन्तु इस समय मौका ही ऐसा आ गया था। गाँव में रहने-खाने की बात थी। डाल दिया गया जयराम के गले में दमाऊँ।
बचन सिंह के आंगन में पांडव नृत्य करने के लिए बिकराल हो, आंगन में बिछाए गये पत्थरों को पैरों से तोड़ने को उद्धत थे। सभी गर्व में चूर नाच रहे थे। कोई नए जमाने के भाभी, शाली और छोकरी टाइप के गीत लगाने की माँग करता तो कोई पांडवों के आह्वान के गीत की फरमाइश करता। महिलाएं भगवती के देवीगीतों की माँग करती।
एक ने कहा- सौंणू, म्यरि बौऊ सुरीला…. (भाभी के संदर्भ में गाया जाने वाला एक सस्ता गीत) का गीत लगा। भाभी के संदर्भ में गाये जाने वाले ऐसे गीत की लय जयराम अपने पिता के साथ गाए त गाए कैसे ? जिसका मरता है, वह क्या नहीं करता। सौंणू के साथ जयराम ने सारी रात दमाऊँ बजाया। दमाऊँ बजाने में उसे कोई परेशानी नहीं हुई, उसे जो काँटे की तरह चुभ रहा था तो वह उन लोगों का स्वभाव था। वे उसके पिता को जो ही मन में आती कहते। पिता बिना बात के जलते हुए अँगारों के दग्ध सह रहा था।
सौंणू और जींणू को ढोल बजाते-बजाते अरुचि तो हो गयी थी किन्तु पेट की खातिर सब सहा जा रहा था। अठवाड़ (एक धार्मिक अनुष्ठान जिसमें भैंसे की बलि दी जाती है।), अष्ठबली (एक धार्मिक अनुष्ठान जिसमें आठ पशुओं की बलि दी जाती है।), विवाह या अन्य पूजादि कार्यों में ढोल के पीछे सभी जगह मार ही खायी। इस ढोल के तहत न जाने क्यों कलह हो जाता था। नाच रहे हो, नाचो। तुम्हें नचाया जा रहा है। भूसा बुद्धि के आदमी। नाचते-नाचते घूम-फिर कर आते ढोल के समीप। एक ढोल को अपनी तरफ खींचे, दूसरा ढोलिया को उसका गिरेवां पकड़कर झकझोरे। कभी वे सौंणू और जींणू को कंधे में उठाकर नचाते तो कभी उनसे घृणा करते। इस प्रकार की विचित्र बातों का जिक्र सौंणू अपने मौहल्ले में करता।
उसके कुटुम्ब-परिवार के लोग हंस-हंस कर लोट-पोट होते थे। महिलाओं पर जब कभी कोई देवी अवतरित होती, वे सौंणू के गले में दोनों हाथ डालकर थरथराते हुए काँपती थी। वे ढोल की ताल के साथ लय मिलाकर गाती- ‘‘लगौ म्यारा भगता वीं नंदा की जाता…..’’(मेरे भक्त नंदा की यात्रा के गान गा…..) किल्ल-किल्ल की किलकारियां मारती हुई उसकी सांसे इतनी तेज चलती, मानों मीलों दौड़कर आयी हो।
उस देवी ने (जो अवतरित हुई है) इस देवी को नहीं बताया कि कभी तो तू इस सौंणू को देखते ही कहती है कि सौंणू मै आ रही हूँ। तू चौड़ी जगह में जा। मुझे स्पर्श मत करना। इस समय उसके गले में हाथ डालकर क्यों झूली हुई है ? जींणू जब दमाऊँ बजाते-बजाते थक जाता, देवियाँ-देवता नाचते ही रहते, तब वह गालियां बखने लगता- नाचा-नाचा बैंण्यूं, अपड़ा बुबै सैंण्यूं…..(नाचो-नाचो बहिनों, तुम तुम्हारे बाप की पत्नियां हो।) ढोल की गर्जना में कुछ नहीं सुनाई देता था।
जातियों ने कितने काँटे बाऐ थे! विवाह-शादियों में जमींदार के घरों में सोने के लिए गौशालाओं में और खाने के लिए भोजन खेतों या मकानां के पिछवाड़ों में दिया जाता था। बहतेरी वेसी (जातिवादी मानसिकता की) महिलाएं। पीठ पीछे जो भी अनैतिक हो रहा है मान्य, किन्तु समाज के सामने धोती को थोड़ा ऊपर उठाती हुई ताकि इन पर भूल से भी धोती न लग जाए; उनके पत्तलों में भात ऐसे फेंक जाती मानों कोढ़ियों को भोजन दे रही हो। अपने-आप जैसे ये दूध की धुली हों। भात के डले कभी-कभी जमीन पर लुड़कर मिट्टी में मिल जाते थे।
सौंणू मुँह सामने तो कहता- ‘चाची! कोई बात नहीं। धरती में गिरा अन्न पवित्र है।’ जैसे ही चाची दूर जाती तो कहता- ‘चाची, तेरे कितने चरित्र हैं। पति को मार कर सती हो जाती है। शादियों में हम तुम्हारी गौशालाओं में सोते हैं। इन भीतरों में जो अनैतिक होता है, उसे भली-भांति जानते हैं।’
सौंणू को तिरस्कार खाने की आदत सी हो गयी थी। जमींदारों की गालियां उसके लिए फूल हो गयी थीं। अपना समय व्यतीत किया। एक दिन सौंणू की पत्नी राजी डडवार माँगने दौलत सिंह के घर की गली में खड़ी हो गयी। गली से ही उसने चिल्ला-चिल्ला कर आवाजें दी। दौलत सिंह की पत्नी सम्पती देवी ने उसे आंगन में भी नहीं आने दिया। रास्ते से ही उसे दुत्कारते हुए कहा- ‘अरी वो सौणूं की घरवाली! तू कितनी जिद्दी है। जब तुझे कह दिया कि मै इस समय तुझे डडवार नहीं दूंगी तो तू बार-बार क्यों आ जाती है। चैत्र माह में भी तू माँगने आती है। बुरा हो उसका जिसने तुम जैसे तीन कौड़ी के बुरी जात वालों को इस गाँव में बसाया। मै इस समय और कामों में व्यस्त हूँ, दूसरे दिन आना।’
राजी अपना सा मुँह लेकर घर लौटी। उसने मन में सोचा- मेरे बेटे हैं। पति के पीछे दुत्कार ही खायी है। बच्चे कामयाब हो जाएंगे तो जमींदारों की दाब-धौंस धरी-की-धरी रह जाएगी। मनसाराम ने बीए, जयराम ने इंटर कर लिया था। बेटियों की शादियां कर ली थी। जो भी मेहमान उनके घर आता, उसे ही सम्बंधी बना लेते थे। गाँठ में यदि धेला होता, धूमधाम से शादियां होती। एक उबरि-पांडि (ऐसी झोपड़ी जिस पर एक नीचे, एक ऊपर का कमरा बना हों) में समय के घाव सहते रहे।
घर में आकर राजी ने मनसाराम से जमींदारिन के कहे शब्द शिकायती लहजे में कहे- ‘‘मन्सा! बेटा, तून नौकरी कब लगना है ? जमींदारिन घुड़की-धमकी देती रहती है। कहती है कि मरेगा उनका जिन्होंने हम जैसे तीन कौड़ी के कुजातों को इस गाँव में बसाया।
‘माँ, तू नहीं जानती है। ऐसी गालियां तो उनको हमने देनी थी कि मरेगा इनका जो ये हमारी थाती-भूमि में जगह-जगह से आये। जिन्होंने हमसे हमारी जमीन छीन ली। हमें नाकारा और बंधवा मजदूर बनाया। ये धरती हमारी है। हम हैं सच्चे गढ़वाली। इन सुरम्य पहाड़ों पर हमारे पूर्वज रहते थे।’
‘तू न जाने क्या-क्या बोले जा रहा है। मुझे डर लग रही है। कीरत सिंह के लड़के की शादी है। तेरे पिता नहीं मानते। इस ढोल को बजा कर दुत्कार ही मिली। कहते हैं कि इस असवाल ठाकुर का न लेना एक, न देना दो, बिना बात के दोनों आँखें दिखा कर डराता रहता है।’
कीरत सिंह के लड़के के विवाह की तैयारियां जोरों पर थी। गैख्यू (सौंणू कीरत की सेवा करता और कीरत सौंणू को अनाज देता। इस प्रकार के व्यवहार को गैखी कहते हैं।) कारिज जो था। मना नहीं किया जा सकता था। सौंणू के लिए बेचैनी हो गयी। दमायाँ किसे करे ? जींणू भंयकर बीमार पड़ा था। लाख कोशिशों के बाद उसने जयराम को तैयार किया। बारात ने डाबर गाँव जाना था। बारात के प्रस्थान के समय पाहुनों ने घड़ी भर में ही सौंणू और जयराम का खाया खाना निकाल दिया। सारे पहाड़ी रास्तों पर ढोल-दमाऊँ बजाते-बजाते इन पिता-पुत्र के कंधे छिल गये थे। बारात खड़ी चढ़ाई चढ़ रही थी।
नाचने वाले सौंणू को चढ़ाई नहीं चढ़ने दे रहे थे। पसीने की नदियां बह रही थी। ढोल का वजन सहा नहीं जा रहा था, उधर नाचने वाले चढ़ाई पर घुंड्या ताल (ढोल को घुटने के बल से बजाने की एक कला जिसमें नाचने वाले को अद्भुत आनन्द आता है।) की माँग कर रहे थे। जयराम अभी बच्चा ही था। थक जाने के कारण उसने दमाऊँ नहीं बजाया। बल्लू उजड्ड व्यक्ति। उसके पेट में नाचते रहने की एक ही रट। उसने चटाम-चटाम जयराम की गालें बजा दी। ‘उल्लु का पट्ठा साला! अरे, भात खाने को आया है बारात में ? चल, बजा दमाऊँ। नाचने की सारी मजा को किरकिरा कर रहा है।’ कहते हैं कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस। नहीं लगा पाया सौंणू किसी के मुँह। जयराम दमाऊँ भी बजाता और रोता भी रहता।
बरात दोपहर में ही प्रस्थान कर चुकी थी। कहाँ रह गया पाल गाँव! और कहाँ डाबर। भारत से श्रीलंका जाना जैसा। बारात आधे रास्ते में ही थी कि ऊपरी पहाड़ी भागों में जोरों की बर्षा होने लगी, जिससे हिंसरिया गधेरा पानी से लबालब हो गया। गधेरा पानी के तीव्र वेग से बहने लगा। गधेरे का मटमैला पानी छम्म-छम्म की बौछारें गधेरे के गोल पत्थरों पर मारने लगा। अब गले लगी कि बारात गधेरे को पार कैसे करे ? उस समय गधेरों पर पुल नहीं बने थे। न आज जैसी फोन की सुविधाएं थीं।
डाबर गाँव इस गधेरे से पूरे दो मील ऊपर चढ़ाई पर था। सभी गधेरे के किनारे-किनारे बैठ गये। किसी को नहीं सूझ रहा था कि क्या करें। कैसे गधेरे को तैरकर पल्ली पार जाया जाए। सभी मंथन कर रहे थे। किन्तु किसी के मस्तिष्क में कोई सही विचार नहीं आ रहा था। इस गधेरे के आस-पास कोई गाँव भी नहीं थे। सौंणू-जयराम ने ढोल-दमाऊँ में तान छेड़ दी। चैत सिंह फौजी आदमी, उसे सांस्कृतिक जानकारियां कम थीं। ढोलियों को उसने जी भर कर गालियां दी। उन पर खीजता हुआ बोला- अबे, बारात मुसीबत में है और तुम ढोल बजा रहे हो ? बंद करो ये ढम-ढम-ढम-ढम।’
‘हवलदार जी, कुपित मत होइए। डाबर गाँव से बुजुर्ग-सयाने लोग अभी आएंगे। वे गधेरा पार करने का कोई उपाय अवश्य सुझाएंगे। हमें ढोल बजाने दो।’ सौंणूदास ने तीन बार ढोल में अद्भुत ताल बजायी- तौड़…तौड़….द्गिन्नतौड़..द्गिन्न…. द्गिन्न…. द्गिन्न….. द्गिन्न…. द्गिन्नतौड़…. (ढोल के बोल) पाँच बार बजाये उसने ये शब्द। ढोल बजाना बंद कर सौंणू ने सभी से चुप रहने का आग्रह किया- ‘सभी कुछ देर के लिए चुप रहें।’ वह ध्यान से कुछ सुनने का प्रयत्न करने लगा। गधेरे के शोर में कुछ नहीं सुनायी दे रहा था। ‘जय! चल बेटा ऊपर वाली पहाड़ी चोटी पर चलते हैं। गहरी घाटी से ढोल की गर्जना नहीं हो पा रही है।’
सौंणू और जयराम ढोल-दमाऊँ लेकर ऊँची पहाड़ी पर गये। उन्होंने ढोल पर पहले जैसे शब्द बजाये। इनके ढोल की गर्जना डाबर गाँव पहुँच गयी। डाबर गाँव से भी वहाँ के ढोलियों ने वे ही शब्द तीन बार बजाये। फिर इधर से सौंणू ने शब्द बजाया- द्ग्न्न… द्ग्न्न…. द्ग्न्न… द्ग्न्न… काफी देर तक सौंणू इन्हीं शब्दों बजाता रहा। डाबर गाँव से ढोल के शब्द सुनायी दिये- गिनगिनतौड़… गिनगिनतौड़… गिनगिनतौड़… डाबर गाँव संदेश पहुँच गया कि बारात विपत्ति में है। डाबर गाँव के लोगों को आभास हो गया कि हिंसरिया गधेरे में पानी का बहाव तेज हो गया है। संदेश देकर ये अद्भुत किस्म के ढोलिया नीचे बारात के पास आये।
सौंणू ने कीरत सिंह से कहा- उदास मत होइये ठाकुर साहब। डाबर गाँव से पुरुष लोग चल पड़े हैं। तब तलक बारातियों को विश्राम करने दो। अंधेरा हो गया था। आसमान में बादल घिरने लगे थे। बारिश होने की संभावना थी। सभी गधेरे के किनारे बैठे डर रहे थे। धुप्प अंधेरा हो चुका था।
डाबर गाँव के बीस-पच्चीस लोग दल बनाकर मशालें, चीड़ की जलती लकड़ियां हाथ में लिए उतराई में आ रहे थे। उनके पास लकड़ी की लम्बी कड़ियाँ, बल्लियाँ, तख्ते आदि थे। डाबर गाँव के लोगों को पता था कि गधेरा कहाँ पर संकरा है। दूसरी ओर से उन्होंने आवाजें दी कि सभी बाराती ऊपर की ओर आयें।
कीरत सिंह ने भी चीड़ की लकड़ियां ले जा रखी थी। कुछ लोगों ने वे लकड़ियां जलायी और ऊपर की ओर चल पड़े। डाबर गाँव के लोगों ने संकरी जगह में गधेरे के आर-पार बल्लियां और तख्ते रखे जिन पर चलकर बारातियों ने गधेरा पार कर लिया। गधेरा पार करके किसी भी अभागी बराती ने इन बुद्धिमान ढोलियों की प्रशंसा में उनकी पीठ नहीं थपथपायी।
आसमान में बादलों की दो-तीन भयंकर गड़गडाहट हुयी और आसमान साफ हो गया। डाबर गाँव में बारात आंगन में बैठ गयी। आंगन में डाबर गाँव के पुरुष सौंणू को ढोल बजाने के लिए उकसाने लगे। बाराती रसोई में खाना खा रहे थे, सौंणू और जयराम इनको नचाने पर लगे हुए थे। बारातियों और डाबर गाँव के लोगों ने पेट भरकर दावत उड़ायी।
फिर पाल गाँव के पुरुष नाचने को उद्धत हो गये। मंडाण (देवी-देवताओं के गीतों के साथ सामुहिक नृत्य) लगाया गया। रात व्यतीत करनी थी। दुल्हन पक्ष के घर पर इतनी सुविधाएं नहीं थी कि सभी को सुलाया जा सके। जिसको सोने की जगह मिली, वह सो गया। जिसे कहीं कोई ठौर नहीं मिला वह पांडव नृत्य करने लगा। किसी ने भी सौंणू और जयराम को विश्राम नहीं दिया। एक दल नाच कर थक जाता, वह सोने चला जाता। जो सोकर जाग जाते, वे नाचने आ जाते। कुछ शहरों से आये हुये थे। वे नाचने के लिए बेचैन थे। बरसों से ऐसे ढोलिया मिले थे।
सौंणूदास का महाभारत का किस्सा छेड़ा हुआ था। कथा पांडवों के वनवास तक पहुँच चुकी थी। पंडौं तुम चला भारता…. पंडौं वु पापी दुर्यौधन…. पंडौं तुम चला भारता…. पंडौं तुम पैटा ब्वंणबास….. पंडौं तुम चला भारता… ढोल के बोल ऐसे कि नाचने वाले जोश में आनन्द विभोर हो घुंड्य रांसू (घुटने मोड़कर नाचने का एक ढंग) में नाचते।
संग्राम सिंह दुल्हन का चाचा था। उसे न जाने क्या चिड़ हुई। उसने ढोल की रस्सियां पकड़ ली। सौंणू को आँखें दिखाता हुआ बोला- ‘रामायण नहीं महाभारत की कथा लगा। मुझको पांडव नृत्य करना है।’
‘साहब, महाभारत की ही कथा लगा रहा हूँ। आप प्रसन्नचित होकर नाचो।’‘सुअर की औलाद साला, अबे बता, वनवास किसे हुआ था ? रामचन्द्र जी को। तू पांडवों के लिए वनवास क्यों कह रहा है ? अबे, रामायण-महाभारत मैने भी पढ़ी है। कोई सुन नहीं रहा है तो इसका मतलब यह नहीं कि जो तेरे मन में आये वह कहता रहेगा।’
‘वनवास रामचन्द्रजी ने भी झेला और पांडवों ने भी। छोड़ो जाने दो, आप कहो। कैसी ताल छेड़ूँ ?’‘म्यरु बाजु रंगा रंग बिचरी रंग दे दे मोला….(एक लोकगीत जो प्रेमी-प्रेमिका पर गाया गया है।) संग्राम सिंह ने नटखटी नखरे करते हुए पूरा मुँह खोल कर यह गीत गाया। सौंणू और जयराम हँसे तो हँसे कैसे। मूर्ख व्यक्ति समझकर उन्होंने चुप्पी साध ली। दुल्हे के पक्ष से बेवड़ा था बल्लू। उसने ढोल की एक रस्सी पकड़ ली। दूसरी संग्राम सिंह ने पकड़ ली। बल्लू पांडवों की ताल तो संग्राम ‘बाजू रंगा’ गीत लगाने को कहता। सौंणू को दुविधा हो गयी। किसका कहा माने।
बाद में उसने पांडवों की कथा लगाना ही उचित समझा। आधी कथा छोड़ना उसे भला नहीं लगा। जैसे ही उसने पांडवों की कथा शुरू की कि संग्राम सिंह ने उसकी गाल पर उलटे हाथों की चोटें मार दी। ढोल बजना बंद हो गया। सौंणू हाथ जोड़े खड़ा रहा। इधर बल्लू ने सौंणू का गिरेबां झकझोरा। ‘सौंणू, तूने ढोल बजाना बंद क्यों किया ? चल बजा!’
जयराम रोते-रोते कहता- ‘मेरे पिता को मत मारो। पहले तुम फैसला करो कि गीत लगाना है या पांडवों की कथा।’‘बाजू रंगा वाला गीत लगेगा, सिर्फ। मैने कह दिया है। नहीं तो मै उलट-पुलट कर दूँगा।’ संगाम सिंह ने जिस समय उलट-पुलट शब्द कहे, उसी समय उसने ढोल की रस्सी पकड़कर एक झटके से खींच ली। सौंणू ढोल सहित धड़ाम से नीचे गिर गया। संग्राम ने जब बहुत वाद-विवाद कर दिया, तब दुल्हन के पिता को गुस्सा आ गया। सबको सचेत करते बोला- ‘ध्यान रहे! मेरी बेटी की शादी में कोई झगड़ा नहीं करना। मै बुरे स्वभाव का हूँ। ढोल बजाना बंद करो। रात की तीन बज चुकी हैं। हमने और भी बहुत सारे काम करने हैं।’
सौंणू ने जैसे ही सुना कि ढोल बजाना बंद करो, तुरन्त वह गौशाला खोजने लगा। जयराम को नींद के झोंकें आने लगे। वह चुपचाप एक गौशाला में छुप गया। किसी भी निर्दय ने इन्हें खाना नहीं खिलाया। न ही जाँच-पूछ करने की चेष्टा की कि इन्होंने भोज किया कि नहीं। जाँच-पूछ धन-दौलत और जात की होती है। जोकि इनके पास नहीं थी। जयराम को भूख भी लगी थी। थककर शरीर चूर हो चुका था। पिता को बहुत दया आयी। भात माँगने में इस समय कोई हर्ज नहीं था। उसने एक महिला से कहा- ‘किसी ने भी दावत नहीं खिलायी। नाचने वालों ने अवकाश ही नहीं दिया। बेटा भूखा-प्यासा है। यदि भात बचा है तो दे दो।’
उस महिला को भी दया आ गयी। उसने रसोई में जाकर वर्तन हिला-डुलाकर देखे किन्तु बुरे कसम कि जो वर्तनों में भात का एक दाना भी दिखा हो। परोसा ले जाने वालों ने भात ऐसे उड़ाया मानों उन्होंने कभी भात खाया ही नहीं हो। जयराम भूखा ही गहरी नींद में सो गया। कहते हैं कि भूखा न देखे बासी भात, नींद ने देखे टूटी खाट। जयराम गौशाला में नंग्गे फर्श पर पत्थरों में सोया हुआ था। पढ़े-लिखे बच्चे की ऐसी दुरगति देख पिता की आँखों से गंगा-जमुना बह गयी। ‘हे निराकार! प्रभो! हमारी कब सुनेगा ?’ हृदय से पुकार लिया उसने अपने ईश को।
डाबर गाँव की महिलाएं नहीं सो पायी थी। उन्होंने अगले दिन के लिए दाल गलाने चूल्हे पर रख ली थी। उसके पश्चात् जूठे वर्तन धोए। बल्लू को चैन नहीं थी। वह रात भर इधर-उधर टहलने पर लगा था। उसने रसोई में महिलाओं को देख लिया। वह सीधे उनके बीच घुस गया। सिर पर लाल रुमाल बंधा था। जुल्फें लम्बी-लम्बी थीं। किसी महिला ने उससे कह दिया कि वे भी नाचना चाहती हैं। बल्लु ने इतना क्या सुना कि उसने उस समय स्वयं को किसी महान क्रांतिकारी से कम नहीं समझा।
गर्व में छाती चौड़ी कर सौंणू को खोजने निकल पड़ा। महिलाएं नाचना चाहती हैं और सौंणू सोया हुआ है ? यह सबसे बड़ा अन्याय है। न जाने किसने यह कह दिया कि ढोलिया यहां गौशाला में सोए हुए हैं। बल्लू ने धम्म से दरवाजों पर लात मारी। भीतर सौंणू का हृदय काँप गया। सौंणू तो जाग गया किन्तु जयराम नहीं जागा। बल्लू ने ढोल उठाया और सौंणू के लिए कहा कि जल्दी बाहर ढोल बजाने आ। सौंणू बाहर कैसे आये ? जयराम गहरी नींद में सोया था।
बल्लू ढोल को डंग्ग-डंग्ग पीटता हुआ आंगन में आया। ढोल को आंगन में रख रसोई में गया। उसने महिलाओं को नाचने के लिए आमंत्रित किया। दो-चार हुडदंगी महिलाएं बल्लू के साथ नाचने को उद्धत हुयी। बल्लू मन-ही-मन खुश हो रहा था। अब आयेगा मजा। वह आंगन में आया।
सौंणू नहीं आ पाया था। बल्लू फिर कुपित हो गया। उसने गौशाला में जाकर सौंणू के पेट पर एक ऐसा घूंसा मारा कि सौंणू दर्द से दोहरा हो जमीन पर लोटने लगा। मारी एक लात जयराम के पिछवाड़े पर। जयराम बिलबिला उठा। ‘पिताजी! मै मर गया। मुझे बचाओ पिताजी!’ इस पत्थर दिल इंसान को दया नहीं आयी। सौंणू जमीन पर लोट रहा था। बल्लू ने उसका गिरेबान पकड़ा और घसीटता हुआ बाहर लाया। जयराम बिलखता हुआ बाहर आया। जिद करके बल्लू ने ढोल-दमाऊँ उनके गलों में डाल दिये। बजाना पड़ा सौंणू को ढोल। पुनः पांडवों के गान गाये। महिलाएं नाचने लगी।
जयराम बल्लू को देख दाँत पीसता। वह मन में मंथन करता-बेटा बल्लू, यदि मुझमें ताकत होती तो तुझे ऐसे कूटता कि तुझे पता चल जाता, किन्तु क्या करें। इधर सौंणू अपने मन में पुकार लगाता- होगा, इसका हिसाब होगा। आदमी नहीं, मेरा निराकार करेगा। सौंणू ने जयराम को गीत का मुखड़ा सुझाया- पंडों तुम चला भारता… । ईर्ष्याजनित क्रोध में जयराम महिलाओं को गाली देता लय मिलाता। ढोल की गर्जना में गाली नहीं सुनायी देती थी। सभी ठुमके लगाकर नाचते।
डाबर गौं के एक खतरनाक व्यक्ति ने बल्लू की हरकतें भांप ली। उसका नाम था देबू। बल्लू एक महिला को नाचते-नाचते छेड़ रहा था। महिला प्रतिवाद नहीं कर रही थी। देबू भन्ना गया। उसने लठ उठाया और आँखें बंद करके बल्लू को कूट दिया। मारामारी होते देख सौंणू और जयराम वहां से हिरन होकर गौशाला में छुप गये। उन्होंने दरवाजे भीतर से बंद कर दिये। महिलाएं वहां से रफुचक्कर हो गयी। बल्लू की चीखें सुनायी दी। सिर से लहू की धारा बह रही थी।
देबू ने बल्लू का घायल कर दिया। सभी पाहुने, डाबर गाँव के महिला-पुरुष भय और विस्मित से खड़े थे। बल्लू को बचाने पाल गाँव के चार-पांच पाहुने बीच-बचाव करने आये। डाबर गाँव के लोगों ने समझा कि अब देबू मार खाता है। उन्होंने भी डंडे उठाए और जो भी सामने आया कूटा। पाल गाँव के पाहुने डाबर गाँव के लोगों की मार खा रहे थे। देबू के साथियों ने सुना कि देबू मारा जा रहा है। वे भी लाठी-बल्ली लेकर आ धमके। उन्होंने नहीं देखा कि मार कौन खा रहा है। सभी पाहुनों को उन्होंने बेहद मारा।
सुबह के पांच बज रहे थे। दुल्हा के पिता, दुल्हा और उसके मामा ने नहीं खायी मार। बाकी पाल गाँव के सभी पाहुने मारे गए। सभी पाहुनों की भागम-भाग हुयी। जब सभी पाहुने भाग चुके थे, तब थम पाया हंगामा। कीरत सिंह नहीं समझ पाया कि मामला क्या था। देबू ने सारी कथा उसे सुनायी। सुनकर उसका मुँह तमतमा गया। मूर्ख, उजड्ड आदमी। किसकी जूती किसके सिर। वह सौंणू के लिये अनाप-सनाप बखने लगा। दो चांटे उसने सौंणू की गाल पर जड़े और उसके पुरखों को गालियों से पूजने लगा- ‘सुअर की आलाद, साला। अबे जब तेरे लिए ढोल बजाने मो मना कर दिया था तो तून ढोल क्यों उठाया।’ सौंणू क्या बोले ? पापी का आरोप उसके सिर मढ़ा गया। सौंणू ने जयराम से कहा- ‘उठा बेटा दमाऊँ। चल, इनकी बारात आये चाहे न आये। भाग यहां से।’
डाबर गाँव में गहमा-गहमी मची थी। इन्हें मौका मिला और चुपके से खिसक लिए। सौंणू जयराम उतरायी में दौड़ने लगे। जयराम पिता को समझाने लगा- ‘पिताजी, बड़े भाई ठीक कहते हैं। इस ढोल को बजाकर हमें दुत्कारा ही गया है। कभी हमने ईज्जत नहीं पायी। जहाँ पर देखो मूर्ख हमें कुचलते ही रहते हैं। क्यों ढो रहे हो इस ढोल को ? मै यह दमाऊँ आपका मान रखने के लिए बजाता हूँ। अन्यथा जिस प्रकार बड़े भाई ने कई बार इस ढोल को फोड़ा, मै भी इसे उसी तरह फोड़ सकता हूँ। जिस काम को करके मान-मर्यादा पर घाव होते हों, उन कामों पर थूक देना चाहिए। हमारी कोई प्रतिष्ठा नहीं है। बड़ी जाति का आदमी शराब पीता है, माँ-बहनों को बुरी नियत से देखता है, कई तरह के कुकर्म करता है, उसके पास धन है, बाहुबल है, उसकी सभी ईज्जत करते हैं।
हम गरीब हैं, कमजोर, लाचार हैं। हम चाहे कितने ही ईमानदार, मेहनती, शिल्पी, जानकार और कार्यकुशल क्यों न हों; हमारी जात छोटी है, हमने छोटा ही रहना है। पिता जी! हम तीनों भाई नौकरियों पर लगेंगे। अन्यथा दिल्ली जाकर जूठे वर्तन माँजेंगे, तुम्हें सहारा देंगे। किन्तु पहले इन ढोल-दमाऊँ की इतिश्री यहीं कर दो। कोई प्रशंसा नहीं इस ढोल बजाने की। पिताजी, तनिक रुको। सुनो- हम इनके भले-बुरे कार्यों में सबसे आगे रहते हैं। हम इनके हर्ष-उल्लास को चौगुना कर देते हैं और खाना खाते समय पीछे धकेले जाते हैं कुत्ते की तरह। जैसी वृत्ति औजी, लोहार मिस्त्री की है, वेसी ही ब्राह्मण की भी है।
कंटळू, अनाज, डडवार ब्राह्मणों को भी दिया जाता है। गैखी उनकी भी है। किन्तु उनके साथ कोई भेद-भाव नहीं होता। वे ऊँची जाति के हैं। वे चाहे कितने ही घिनौने कार्य कर लें, संसार उनको सिर पर बैठा कर रखता है। हम शिल्पकार हैं, जानकार हैं, हमारी बेइजत्ती? एक सूप भर डडवार के निमित्त हमारी खाल खींची जा रही है। कुल्ली काम करके मर जायेगा क्या हमारा ?’
सौंणू क्रोध में चार कदमों का एक कदम कर चल रहा था। चलते-चलते बच्चे की सीख मस्तिष्क में रखता जा रहा था। ‘बाबा, हम इस मुल्क के सच्चे वासिंदे हैं। ये जो हमारे ठाकुर बने हैं, वे मैदानी भागों से मुगलों और अंग्रेजों के भगाए लोग हैं। इन्होंने हमसे हमारे रमणीक पहाड़ छीन दिये। हमें बंधवा-मजदूर बना दिया। हमें छोटा बना दिया। जिस दिन से ये इस मुल्क में आये, यहां के औजी, मिस्त्री, लोहार, ठठेरों और रुड़िया (बांस की टोकरियां बनाने वाले) शक्तिहीन हो गये। ढोल बजाना कोई बुरा कार्य नहीं है। ढोल तो शिव का उत्पन्न किया हुआ है। हमको यदि सम्मानित करते, हमने ढोल उत्साह से बजाना था।
विशाल संस्कृति समायी है इस ढोल में। जानबर काटकर किसने नहीं खाये ? आदिमानवों ने क्या सीधे दाल-भात खायी ? उसी आदि मानव से जन्में हैं सभी। गोबर बुद्धि के लोगों की बातें हैं जिन्होंने जातियों का अहम हृदयों में ठूंस-ठूंस कर भरा। जिससे देश जगह-जगह नष्ट होता गया। हमारे देश ने गुलाम नहीं होना था। जातियों में बंटे रहे हम। एक ने दूसरे का छुआ नहीं खाया। विदेशियों ने कमजोरी पकड़ ली थी। पाँचों उँगलियां बिखरी हैं, तोड़ो इन्हें। उन्होंने उँगलियां तोड़कर मरोड़ दी। अपंग बन गये। ये इन पहाड़ों में आये। यहां भी इन्होंने भेद-भाव किया, और तब निकम्मे गोरखाओं और कत्यूरियों ने यहां मारकाट मचायी। हम बाहरी लुटेरों गुंड्डों से लड़ सकते थे। हमें तो मलेच्छ जगह फेंक दिया गया था।
हमारे पुरखों ने समझा होगा कि मारे जा रहे हैं साले, मरो। हमारी बिना बात बुरी गत बना रखी है। उन्होंने तमाशे देखे, ये पिटते रहे। ब्राह्मण ने कहा कि वह हत्या नहीं कर सकता। उधर वह छुपकर पूजा का माँस खाता रहा। एक राजपूत कितनों के साथ लड़ता। अतः वह जगह-जगह मार खाता रहा। इस धरती के वासिंदे हैं हम, हमारी इतनी बुरी स्थिति हो चुकी है। आप ढोल सागर के पंडित हो। कोई नहीं कहता आपको पंडित। पंडित ज्ञान का होता है, जाति का नहीं। जो पंडित हैं, उनको ज्ञान नहीं है।’
हिंसरिया गधेरे तक आते-आते सौंणू के हृदय में दुःख और क्रोध का गुब्बारा भर चुका था। दाँत भींच दिये उसने। नथुना फूल चुका था। आँखें क्रोध से घूमने लगी। फेफड़ा गहरे-गहरे फुंकारे लेने लगा था। हाथों की मुट्ठियां कड़कड़ाते हुऐ जकड़ने लगी। दाहिने हाथ में खैर की ढोल बजाने की लाकुड़ (ढोल बजाने की लकड़ी) थी। लाकुड़ मुट्ठी के अन्दर कड़क टूट गयी। जयराम को उम्मीद नहीं थी कि ऐसा होगा। सौंणू ने पहले ढोल फेंका हिंसरिया गधेरे में। फिर जयराम के गले से दमाऊँ को लगभग झंझोड़ते हुए निकाला और बहा दिया तेज पानी की धारा में।
ढोल-दमाऊँ तीव्र बहती जलधारा में फूलों की तरह बह गये। सौंणू गहरी-गहरी साँसें लेता हुआ बिलख रहा था। क्यों नहीं बिलखना था उसने ? उसका ईश्वर हिंसरिया गधेरे में बह चुका था। सभी बारातियों को इसी गधेरे से पार करवाकर डाबर गाँव पहुँचाया था उसने। ढोल को नहीं बचा पाया था।‘पिताजी, आप उदास मत होवें। आज आपका दूसरा जन्म हुआ है।’‘जया, मेरे बच्चे, तूने मेरी आँखें खोल दी हैं। मैला खायेगा वह, जो अब कभी भी ढोल पर हाथ लगायेगा।’
आज एक महान ढोल सागर का ज्ञाता उस परम्परा से बिलग हो गया था। सौंणू को लोग सम्मान देते, उसकी कला का उसे ईनाम देते तो उसने ढोल आज अपने हाथों गधेरे में नहीं बहाना था। आज वह हलका हो गया था। कंधे ढोल का बोझ ढोकर टूट चुके थे। आत्मा घाव खा-खाकर दुखी हो चुकी थी। ढोल को बहाकर जैसे उसका नया जन्म सा हो गया था। जयराम प्रसन्नता से गदगद हो गया। ‘पिताजी, ढोल कहता है- बुढापे में मै क्या करूँगा ? दमाऊँ कहता है- जो कुछ करना है, मैने करना है। आप मुझ पर भरोसा रखो। फूलों की टोकरी में रखूँगा आपको। मै हूँ ना!’
पित्रों का आशीर्वाद मिला। जिस दिन से सौंणू ने ढोल बहाया, उसी दिन से बच्चे प्रोत्साहित हुए। उन्होंने अध्ययन किया। पहले मनसाराम बना तहसीलदार। फिर जयराम को उसने लेक्चरार बनाने की ठानी। सबसे छोटे भाई को उन्होंने इंजीनियर बना दिया। उस दिन उन्होंने पाल गाँव से पलायन कर दिया। फिर वे लौटकर यहाँ कभी नहीं आये। सांणू और राजी अपनी पित्रभूमि को नहीं भूल पाये। वे पाल गाँव आये। अब सौंणू ‘दास’ नहीं तहसीलदार, इंजीनियर और लेक्चरार का पिता था। गाँव के लोग न चाहकर भी उसे प्रणाम कर रहे थे।


लेखक का परिचय
महेशा नन्द, गाँव केवर्स, पोऔ. केवर्स, जिला पौड़ी गढ़वाल
कहानी- औगार, डड्वार, उलार तथा पराज कथा संग्रह।
-लकार लघु कथा संग्रह।
-स्वीलु घाम निबंध संग्रह।
-गीतांजलि का गढ़वाली अनुवाद।
-शैलेष मटियानी पुरस्कार 2014।

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