July 4, 2022

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आप की टोपी अब किस के सिर, उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र की नई चिंता

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कोरोना ने गरीबों के साथ अमीर नेताओं का सुख चैन भी लील लिया है। कहां इस त्यौहारी सीजन में देश विदेश में परिवार के साथ मौज मस्ती करते और कहां अब उत्तराखंड में ही एनिवर्सरी मनाने की मजबूरी हो गई है। ऐसे में अरविंद केजरीवाल की टोपी पहने युवाओं ने पहाड़ में दोनों बड़े दलों बीजेपी और कांग्रेस की नींद उड़ा दी है।
अरविंद केजरीवाल लगातार तीन चुनाव जीते हैं और कांग्रेस की दिग्गज स्वर्गीय शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद से डिगाने में कामयाब रहे। बीजेपी इस काम को 15 साल तक अंजाम नहीं दे सकी। केजरीवाल की आप ने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए दो बार बीजेपी को विधानसभा चुनाव में धूल चटायी है। इस बार तो मोदी के साथ गृहमंत्री अमित शाह भी बीजेपी उम्मीदवारों के पक्ष में गली -गली वोट मांगते देखे गए।
वोटिंग मशीन पर बीजेपी के पक्ष में बटन दबाकर शाहीन बाग में करंट दौड़ाने की मुहिम दूसरी बार भी परवान न चढ़ सकी। पिछले 2015 के चुनाव में केजरीवाल 70 में से 67 सीट जीतने में कामयाब रहे तो पांच साल बाद इस सफलता को बचाये रखना नामुमकिन चैलेंज बताया जा रहा था। बीजेपी के सभी बड़बोले नेता अपनी विधान सभाओं में खेत रहे थे। अरविंद केजरीवाल ने अर्बन नक्सल के नारे को बड़ी सहजता से हजम कर लिया।
8 फरवरी 2020 को हुए दिल्ली विधान सभा के चुनाव में आप पार्टी ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में 62 सीट जीतकर बीजेपी को मात्र 8 सीट पर रोक दिया। अरविंद केजरीवाल का विश्व की सबसे बड़ी पार्टी को हराना संयोग मात्र नहीं है। दिल्ली में आप को 54 प्रतिशत वोट मिले हैं और इस बार उसके सभी युवा रणनीतिकार चुनाव जीतने में सफल रहे हैं।
उत्तराखंड में आप की धमक बीजेपी पर भारी पड़ रही है, मित्र विपक्ष की भूमिका में नज़र आ रही कांग्रेस को ऊंघता छोड़ आप के युवा कार्यकर्ता बीजेपी विधायक के महिला शोषण पर सड़क पर उतर आये। फिर एक दिन के सत्र में आप का विधान सभा घेराव कांग्रेस के मुकाबिल इक्कीस साबित हुआ है। भले ही अभी बड़े नाम और लीडर के बिना आप पार्टी को कम आंका जा रहा है लेकिन सारी तैयारी तो पांचवी विधानसभा 2022 के लिए है।
करोड़ो के छात्रवृत्ति घोटाले में बीजेपी नेताओं के संस्थानों का जुड़ना, बेरोजगारी, स्कूल और अस्पताल के मुद्दे उठाकर आप ने त्रिवेंद्र सरकार को असहज कर दिया है। हरिद्वार हर की पैड़ी पर गंगा को स्क्रैप या नहर बताकर हरीश रावत ने त्रिवेंद्र सरकार के खिलाफ जो नूरा कुश्ती शुरू की वो मुद्दा भी आप ने छीनकर तिल का ताड़ बनाना शुरू कर दिया है।
मुख्यधारा की मीडिया में आप को जगह बनाने में संघर्ष करना पड़ रहा है लेकिन सोशल मीडिया में तो आप की टोपी सबको प्रमुखता से नज़र आने लगी है। दिल्ली में रह रहा बीजेपी और कांग्रेस समर्थक प्रवासी तबका केजरीवाल को मोदी की तुलना में नालायक बताते हैं तो दूसरा पक्ष दिल्ली के स्कूल, पानी, बिजली, पोली क्लीनिक और अस्पतालों की तुलना उत्तराखंड के हालातों से करके लाजवाब कर रहे हैं।
आप पार्टी की धमक सोशल मीडिया पर साफ नजर आती है। एक रणनीति के तहद आप कार्यकर्ता सभी न्यूज पोर्टलों और चैनलों पर जुड़ने में सक्रिय हो गए हैं। 70 विधान सभाओं में 140 प्रभारी और 10 हजार पोलिंग बूथ पर कार्यकर्ता खड़ने का दावा आप ने अभी से कर दिया है।
ऐसा नहीं कि आप ने उत्तराखंड में पहले घुसपैठ का प्रयास नहीं किया पिछले 2014 चुनाव में अनूप नौटियाल टिहरी लोकसभा से और भारत की पहली डीजीपी किरण भट्टाचार्य हरिद्वार लोकसभा से असफल रह चुके हैं। देहरादून मेयर सीट पर रजनी रावत ने पाला बदलकर आप पार्टी से चुनाव लड़ा और तीसरे स्थान पर रही।
अगस्त 2020 में अरविंद केजरीवाल ने उत्तराखंड की सभी 70 सीटों से चुनाव लड़ने की घोषणा कर पांचवी विधान सभा के समर को गरमा दिया है। उत्तराखंड में लगभग एक दर्जन सीट ऐसी हैं जहां पिछला चुनाव का नतीजा 148 मतों से लेकर 2 हजार से कम के अंतर में तय हुआ है। स्वाभाविक है कि लोहाघाट, जागेश्वर, सोमेश्वर, गंगोलीहाट, केदारनाथ और पुरोला आदि विधानसभाओं में तनाव बढ़ रहा है।
2022 के लिए चुनावी भविष्यवाणी करना कदापि उचित नहीं है। फिर भी राजनीतिक सरगर्मियां और चुनावी मुद्दे तो तय करने में आप आगे बढ़ रही है। उत्तराखंड में कमान तीन बार के विधायक दिनेश मोहनिया और एसएस कलेर के हाथों में दी गई है। चुनाव आते – आते इस में और भी फेरबदल देखने में आयेंगे।
आप के पक्ष में युवा और अधिकारी वर्ग रहता है – यह सभी राजनीति में परिवर्तन की बयार लाना चाहते हैं। 52 वर्षीय अरविंद केजरीवाल आईआईटी के टेक्नोक्रेट, आयकर कमिश्नर पद छोड़कर राजनीति में सक्रिय हैं। केजरीवाल की बेटी और बेटा दिल्ली आईआईटी के स्नातक और पत्नी सुनीता केजरीवाल भी भारत सरकार में आयकर कमिश्नर रही हैं।
आप की जीत फिलहाल भाजपा और कांग्रेस की नाक में दम निकालने तक सीमित है क्योंकि टिकट न पाने वाले विद्रोही आप पार्टी से भविष्य आजमाने में कोताही नहीं करेंगे। उत्तराखंड में भारी संख्या में करोड़पति जि़ला पंचायत और ब्लाक अध्यक्ष हैं जो अब विधायक बनने का सपना पाले हुए हैं। समृद्ध प्रवासी भी दिल्ली और मुंबई से चुनावी शौक पूरा करने आते रहे हैं।
आप पार्टी की राज्यसभा में तीन सीट दिल्ली विधानसभा बहुमत के दम पर हैं और लोकसभा में एक मात्र सीट पंजाब से कलाकार भगवंत मान ने दूसरी बार जीत दिलायी है। दिल्ली से बाहर अभी पंजाब को छोड़कर आप पार्टी अपना दमखम दिखाने में सफल नहीं हुई है। विगत विधानसभा चुनाव में आप पार्टी ने पंजाब में 117 में 22 सीट जीती है लेकिन गोवा में अपना खाता खोलने में असफल रही।
आप की टीम में देश विदेश से प्रोफेशनलों की युवा टीम जुट़ी है और ये परंपरागत पार्टी नेताओं को हर कदम पर चुनौती देते नज़र आते हैं। आप के पास खोने के लिए उत्तराखंड में कुछ नहीं है लेकिन कुछ सीट या 6 प्रतिशत वोट जीतने पर आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय दर्जा पाना आसान होगा।
लेखक का परिचय
भूपत सिंह बिष्ट,
स्वतंत्र पत्रकार, देहरादून।

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